ऊर्जा कूटनीति में चीन से क्यों पिछड़ा भारत?

- Author, नरेन्द्र तनेजा
- पदनाम, ऊर्जा विशेषज्ञ
भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अभी रूस और फिर चीन में थे. अगर आप इस यात्रा के आर्थिक एजेंडे को देखें तो इसके केंद्र में ऊर्जा है. आज अगर भारत को नौ या दस प्रतिशत की दर से विकास करना है तो उसके लिए उसे ऊर्जा चाहिए.
रूस के अंदर तेल और गैस के सबसे अधिक भंडार हैं. दूसरी ओर चीन भी अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए काफ़ी हद तक आयात पर निर्भर है. ऐसे में इस तरह की योजना बनाई जा रही है कि रूस के गैस और तेल को पाइप लाइन के जरिए भारत लाया जा सके. इस बारे में बीते दिनों चर्चा भी हुई है.
भारतीय कंपनियों और खासतौर से ओएनजीसी विदेश ने रूस में जाकर काफ़ी निवेश किया है. लेकिन अब इस बात का प्रयास किया जा रहा है कि एक पाइपलाइन नेटवर्क बनाया जाए. इसे एनर्जी एक्सप्रेसवे कहा जा रहा है. ये एनर्जी एक्सप्रेसवे रूस से शुरू होगा और उसके बाद तिब्बत और लद्दाख होते हुए दिल्ली पहुंचेगा.
रूस के साथ गठजोड़ के फायदे
इससे दो तरह के फ़ायदे होंगे. एक तो हमारी ऊर्जा की ज़रूरत पूरी हो पाएगी. यह पाइप लाइन तिब्बत यानी चीन से होकर आ रही है यानी चीन की तेल और गैस संबंधी ज़रूरतों को भी पूरा किया जा सकेगा.
इससे एक तरफ तो रूस से हमारे संबंध और मधुर होंगे, दूसरी तरफ इतिहास में पहली बार चीन ऊर्जा के क्षेत्र में भारत के लिए एक कड़ी बनेगा.
ऐसे में पाइप लाइन के माध्यम से तेल और गैस पाने के लिए भारत और चीन एक दूसरे पर निर्भर होंगे. इस तरह आज की तारीख में ऊर्जा बेहद अहम भूमिका निभा रही है.
आज अगर कोई चीज है जो भारत और पाकिस्तान के संबंधों को सुधार सकती है, भारत और चीन के संबंधों को सुधार सकती है तो वो आज की तारीख में तेज और गैस है.
एशियन ग्रिड की तैयारी
इसके साथ ही बिजली का महत्व भी काफ़ी अधिक है. भारत ने अपनी पहल पर अफ़ग़ानिस्तान और मध्य एशिया को एक ग्रिड से जोड़ दिया है. अब इस बात का प्रयास हो रहा है कि भारत को उसी ग्रिड के ज़रिए अफ़ग़ानिस्तान से जोड़ा जा सके और कलकत्ता को बांग्लादेश और म्यांमार से जोड़ा जा सके.
इस तरह एक एशियन ग्रिड बन जाएगी. यानी बिजली का एक जाल बन जाएगा जहां सभी देश एक दूसरे पर निर्भर होंगे. इस कवायद से किसी को बिजली मिलेगी तो किसी को पैसा मिलेगा.
इस तरह के प्रयासों से एक नए एशिया का निर्माण हो रहा है और इसके केन्द्र में ऊर्जा है. आप आने वाले समय में देखेंगे कि दक्षिण एशियाई देशों के साथ संबंधों में जो परिवर्तन आने वाला है उसकी प्रमुख वजह आर्थिक और उनका केन्द्र बिंदु ऊर्जा होगी.
ऊर्जा कूटनीति के लिहाज से चीन काफ़ी कामयाब है, लेकिन हमारे प्रयास भी जारी हैं. हमारे प्रयास कभी सफल भी हो रहे हैं और कभी-कभी हमको चुनौतियों का सामना भी करना पड़ रहा है.
भारत की ऊर्जा कूटनीति

भूटान के साथ हमारे प्रयास सफल हैं. दूसरी ओर पाकिस्तान के साथ संघर्ष चल रहा है. अफ़ग़ानिस्तान में भी चुनौती है. तुर्कमेनिस्तान के साथ हमारा समझौता तो हुआ है, लेकिन चुनौतियाँ खत्म नहीं हुईं हैं.
ईरान के साथ भारत सहयोग चाहता है. ईरान और पाकिस्तान भी सहयोग के लिए तैयार हैं, लेकिन अमरीका का दबाव है. अब हमें ये भी देखना है कि अमरीका भी हमारे लिए ज़रूरी है.
म्यांमार में भारत ने निवेश तो किया, लेकिन जो गैस निकल रही है वो चीन जा रही है. हम चाहते थे कि वो गैस हमारे पास आ सके.
कुल मिलाकर भारत की ऊर्जा कूटनीति की सफलता मिली-जुली है. अभी हमको बहुत प्रयास करने की ज़रूरत है. हमको जी-जान लगाकर प्रयास करने की ज़रूरत है. इसके लिए इन सभी देशों के साथ और अधिक घने संबंध बनाने होंगे.
निजी क्षेत्र की भागीदारी
इसके साथ ही भारतीय कंपनियों को और अधिक आज़ादी देनी होगी और भारत के निजी क्षेत्र को इसमें शामिल करना होगा. कुल मिलाकर हमें एक अलग नज़रिए के साथ इस दिशा में आगे बढ़ना होगा.
इसके लिए हमें जो तैयारी करनी है, उस तैयारी की दिशा में हमें थोड़ी तेज़ी दिखानी होगी क्योंकि आज की तारीख में हमारी जो तैयारी होनी चाहिए उसकी 30 प्रतिशत तैयारी भी नहीं है.
हमें चीन और मलेशिया से सीखना होगा, ताकि हम इस दिशा में आगे बढ़ सकें.
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