जहां साहित्य और इतिहास को कोई नहीं पूछता

- Author, अमरेश द्विवेदी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारत में निजी विश्वविद्यालयों की संख्या तेज़ी से बढ़ रही है. आज़ादी के पहले 50 सालों में देश में सिर्फ़ 44 निजी संस्थाओं को डीम्ड विश्वविद्यालय का दर्जा मिला था जबकि पिछले 16 सालों में ही 69 नए निजी विश्वविद्यालय खुल गए हैं.
इन विश्वविद्यालयों में आमतौर पर पेशेवर कहे जाने वाले प्रबंधन, इंजीनियरिंग, मेडिकल जैसे विषय पढ़ाए जाते हैं ताकि छात्र वहां से डिग्री लेकर बाज़ार में नौकरी तलाश सकें.
कहने को तो इन विश्वविद्यालयों में ह्यूमैनिटी यानी मानविकी और सोशल साइंस यानी समाज विज्ञान के विषय भी पढ़ाए जाते हैं लेकिन उन विषयों में छात्रों की संख्या देख कर अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि इन शिक्षण संस्थानों के लिए ऐसे विषयों की क्या अहमियत है.
खुद को भारत का सबसे बड़ा निजी विश्वविद्यालय बताने वाली पंजाब की लवली प्रोफ़ेशनल यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाले 30 हज़ार छात्रों में से केवल 350 छात्र मानविकी के विषयों की पढ़ाई करते हैं.
वहीं ग्रेटर नोएडा में मौजूद शारदा यूनिवर्सिटी में मानविकी और समाज विज्ञान के विषय पढ़ाए ही नहीं जाते.
हाशिए पर मानविकी
स्वाभाविक है कि मोटी फीस के दम पर चलने वाले इन निजी विश्वविद्यालयों में भाषा, साहित्य, दर्शन जैसे मानविकी के विषयों और इतिहास, समाज शास्त्र, राजनीति शास्त्र जैसे समाज विज्ञान के विषयों पर ज़ोर नहीं रहता क्योंकि इन्हें बाज़ार की ज़रूरतों के अनुकूल विषय नहीं माना जाता. इसलिए ज़्यादा पैसे देकर मजबूरी में ही छात्र वहां पढ़ने जाते हैं.
निजी क्षेत्र में छात्रों की संख्या के आधार पर बड़ा शिक्षण समूह माने जाने वाले एमिटी ग्रुप के नोएडा कैंपस में सोशल साइंस के छात्रों ने बताया कि दिल्ली विश्वविद्यालय और जेएनयू जैसे विश्वविद्यालयों में दाखिला नहीं मिलने की वजह से ही उन्हें वहां एडमिशन लेना पड़ा.

इन छात्रों का मानना है कि डीयू और जेएनयू जैसे सरकारी विश्वविद्यालयों में पढ़ाई को लेकर जितना खुलापन है और जितना कुछ सीखने को मिलता है, उतना निजी विश्वविद्यालयों के बंद से माहौल में नहीं मिलता.
हालांकि एमिटी समूह के चेयरमैन अशोक चौहान का कहना है कि उनके विश्वविद्यालय का शैक्षणिक स्तर विश्व स्तर का है और वहां मानविकी और समाज विज्ञान के विषय ऑफ़र किए जाते हैं और पढ़ने वाले छात्रों की संख्या अच्छी खासी है.
लेकिन एमिटी के नोएडा कैंपस की वस्तुस्थिति कुछ और ही है. वहां समाज विज्ञान के सभी विषयों में कुल छात्रों की संख्या मात्र 209 है और इतिहास जैसा महत्वपूर्ण विषय वहां पढ़ाया ही नहीं जाता. हां मानविकी के फ़ाइन आर्ट, म्यूज़िक, विदेशी भाषाएं, अंग्रेज़ी जैसे विषय वहां काफ़ी डिमांड में नज़र आए.
लवली प्रोफ़ेशनल यूनिवर्सिटी में मानविकी की पढ़ाई साल 2010 में शुरू हुई जबकि समाज विज्ञान के विषय वहां अब भी नहीं पढ़ाए जाते.
यूनिवर्सिटी के ब्रैंड डेवलपमेंट अधिकारी अमन मित्तल कहते हैं, "मानविकी और समाज विज्ञान के विषयों की लोकप्रियता घट रही है, यही वजह है कि एलपीयू में मानविकी के छात्रों की संख्या काफ़ी कम है."
मानविकी की ज़रूरत

सवाल उठता है कि क्या वाकई मानविकी के विषय वाकई अलोकप्रिय होते जा रहे हैं और इनकी ज़रूरत नहीं रह गई है.
दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी के प्रोफ़ेसर अपूर्वानंद कहते हैं कि मानविकी पर संकट की चर्चा पिछले दो दशक से की जा रही है लेकिन हक़ीकत ये है कि इसकी ज़रूरत हमेशा बनी रहेगी.
उनका कहना है, "मानविकी के विषयों की पढ़ाई सकल घरेलू उत्पाद में बढ़ोतरी नहीं करती, अगर एक साल तक कोई कविता न लिखी जाए तो देश की अर्थव्यवस्था पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा लेकिन हिटलर के बनने की प्रक्रिया को अगर समझना हो तो ये मानविकी के बिना संभव नहीं है और इस रूप में इसकी उपयोगिता विज्ञान से कतई कम नहीं है."
शायद इसी वजह से प्रसिद्ध शिक्षाशास्त्री प्रोफ़ेसर यशपाल कहते हैं कि मानविकी की पढ़ाई विज्ञान के विषयों के साथ होनी चाहिए ताकि ज्ञान के क्षेत्र का समग्र विकास हो सके और ये निजी हाथों में संभव नहीं जिनका मुख्य मक़सद ही मुनाफ़ा कमाना है.
भारत सरकार के उच्च शिक्षा सचिव अशोक ठाकुर भी मानते हैं कि निजी विश्वविद्यालय मान्यता तो लेते हैं सभी विषयों को पढ़ाने के नाम पर, लेकिन उनका फ़ोकस केवल पेशेवर विषयों तक सीमित रहता है.
सरकार की चिंता

उन्होंने टंडन कमेटी की रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया कि ए ग्रेड यूनिवर्सिटी के लिए ये बेहद ज़रूरी है कि वहां सभी विषयों की पढ़ाई हो ख़ासतौर से मानविकी के विषयों की.
उन्होंने कहा, "निजी विश्वविद्यालयों को लेकर यूजीसी जो एक नया रेगुलेशन बना रहा है उसमें इस चिंता को बहुत अहमियत दी गई है और निजी विश्वविद्यालयों से ये उम्मीद रखी गई है कि वो केवल पेशेवर कोर्स ऑफ़र न करें बल्कि मानविकी और समाज विज्ञान के विषय भी पढ़ाएं जिनसे व्यक्तित्व का पूर्ण विकास होता है."
देश के नीति निर्माता सिद्धांत रूप से ये स्वीकार तो करते हैं कि निजी विश्वविद्यालयों में मानविकी के विषयों की स्थिति चिंताजनक है लेकिन हक़ीक़त ये है कि निजी स्कूलों की तरह निजी विश्वविद्यालयों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है.
जेएनयू के पूर्व कुलपति बीबी भट्टाचार्य चिंता जताते हुए कहते हैं, "एक समय था कि अपने बच्चों को लोग सरकारी स्कूलों में भेजते थे क्योंकि वहां ईमानदारी से शिक्षा दी जाती थी, लेकिन अब इन सरकारी स्कूलों में वही लोग अपने बच्चों को भेजते हैं जो प्राइवेट स्कूलों की भारी फीस नहीं भर सकते."
प्रोफ़ेसर भट्टाचार्य की चिंता से ही ये सवाल भी उभरता है कि जिस तरह शिक्षा प्राइवेट हाथों में जाती जा रही है, वो समय दूर नहीं जब उच्च शिक्षा व्यवस्था पर भी निजी हाथों का वर्चस्व हो जाएगा और अगर ऐसा हुआ तो मानविकी और समाज विज्ञान जैसे विषयों का भविष्य क्या होगा - ये एक बहुत बड़ा सवाल है और गंभीर चिंतन की मांग करता है.
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