पायलिन: पहली बार सरकार तैयार दिखी

- Author, एंड्र्यू नॉर्थ
- पदनाम, बीबीसी दक्षिण एशिया संवाददाता
भारत के तटीय राज्यों से शनिवार को भीषण तूफ़ान पायलिन के टकराने के वक्त कुछ ही लोग तट के करीब थे.
इन्हीं में से एक थे होटल सी साइड ब्रीज़ के मैनेज़र कृष्णा. गोपालपुर के समुद्र तट पर खड़े नीले रंग के इस होटल के एकदम सामने तूफ़ान तट से टकराया. उस वक्त क्षेत्र में हवाओं की गति अपने चरम पर थी.
कृष्णा ने 14 साल पहले साल 1999 में इस इलाके में आए तूफ़ान को भी देखा था और उसकी यादें उनके ज़हन में आज भी बिल्कुल ताज़ा हैं. वह कहते हैं कि इसमें कोई संदेह नहीं कि इस बार का तूफ़ान उससे ज्यादा ताकतवर था.
लेकिन आज पायलिन को लेकर ख़तरों के बारे में चर्चा नहीं हो रही है. बल्कि इस बात की चर्चा हो रही है कि इतने भीषण तूफ़ान के गुज़र जाने के बावजूद इलाके की हज़ारों जिंदगियों को बचा लिया गया. भारत के लिए यह आश्चर्यचकित करने वाली घटना है.

बेहद ताकतवर तूफ़ान के असर को काबू में करने के लिए भारत की प्रशासनिक तैयारियों की प्रशंसा की जा रही है.
अफ़रा-तफ़री का माहौल नहीं
हालांकि तूफ़ान से नुकसान को कम से कम रखने में प्रशासन की तैयारियों के अलावा तूफ़ान के तट से टकराने के वक्त समुद्र में ज्यादा ऊंची लहरों का नहीं उठना भी था.
तूफ़ान के कारण बिज़ली आपूर्ति ठप होने के अलावा लाखों घरों के ढहने और लाखों हेक्टेयर क्षेत्र में धान की खड़ी फ़सल के तबाह होने के बावजूद अफ़रा-तफ़री का माहौल नहीं है.
तूफ़ान के कारण अब तक 18 लोगों की मौत की पुष्टि हुई है, लेकिन साल 1999 में 10 हज़ार से अधिक लोग मारे गए थे. पायलिन की तीव्रता और उसके संभावित असर को देखते हुए जान-माल के भारी नुकसान की आशंका जताई जा रही थी.
सटीक और समय पर चेतावनी जारी करने और समय रहते बड़ी तादाद में लोगों को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाने के लिए ओडीशा सरकार की सराहना की जा रही है. केंद्र के साथ मिलकर राज्य सरकार ने बेहतरीन काम किया है.
कुछ महीने पहले उत्तराखंड में आई भीषण बाढ़ के कारण हुई तबाही को रोक पाने में विफल रहने के बाद भारतीय एजेंसियों की काफी आलोचना हुई थी. उस बाढ़ में हज़ारों लोग मारे गए थे.
उत्तराखंड के अनुभव से सीख लेते हुए आपदा प्रबंधन से जुड़े सभी विभाग सतर्क थे. इस बार वायु और थल सेना की अतिरिक्त यूनिटों को तैयार रखा गया था.
'दुनिया बिखर गई'
तूफ़ान के पूरे समय तक कृष्णा अपने होटल में कमरे की खिड़कियों और दरवाज़ों को बंद कर बैठे रहे.
अगले दिन उन्होंने देखा कि उनके होटल को कोई बड़ा नुकसान नहीं पहुंचा है और वह सही सलामत हैं.
लेकिन, तटीय इलाकों के सभी लोगों के अनुभव कृष्णा जैसे ही हों ऐसा नहीं है.
तूफ़ान के कारण कुछ दिनों तक अपने घर से दूर रहने वाली लक्ष्मी बेहरा जब अपने घर पहुंचीं तो उनकी दुनिया लूट चुकी थी.
लक्ष्मी एक विधवा हैं और मछली बेचकर वह रोज़ 50 रुपए कमाती हैं.
उन्होंने साल 1999 का तूफ़ान भी देखा था और इस बार उनके लिए तबाही उससे कहीं ज्यादा थी. उनके घर की दीवार और छत में दरारें आ गई हैं.
वह कहती हैं, ''मेरा घर टूट गया है और सब कुछ तबाह हो गया है. मैं अब क्या करूं?''
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