गुजरात: पुराना लोकायुक्त विधेयक दोबारा पास

गुजरात, लोकायुक्त बिल, नरेंद्र मोदी

गुजरात की नरेंद्र मोदी सरकार ने राज्य विधानसभा में गुजरात लोकायुक्त आयोग विधेयक 2013 पारित कर दिया है. विपक्ष की ग़ैरमौजूदगी का फ़ायदा उठाते हुए बिल बिना किसी उपद्रव के पारित किया गया. लेकिन ये बिल भी लगभग वही है जिसे राज्यपाल कमला बेनीवाल ने पहले लौटा दिया था.

लोकायुक्त बिल को राज्यपाल कमला बेनीवाल ने कुछ दिन पहले आठ मुद्दों पर सुधार करने का सुझाव देते हुए इसे पुनर्विचार करने के लिए वापस भेज दिया था.

राज्य सरकार ने आठ में से दो मुद्दों पर सुधार करते हुए बिल को विधानसभा में पेश किया और विपक्ष की ग़ैरमौजूदगी में बिल को बहुमत से पारित कर दिया.

बिल पारित करते समय विधानसभा में भाजपा के सदस्य ही मौजूद थे. विपक्षी विधायकों को सोमवार को दो दिन के लिए निलंबित कर दिया गया था.

बिल में राज्य लोकायुक्त या लोकपाल नियुक्त करने के लिए सभी शक्तियां मुख्यमंत्री की अध्यक्षता वाली समिति को दी गईं थीं. इस प्रक्रिया से राज्यपाल और गुजरात उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश बाहर हो गए.

यह बिल राज्य सरकार को लोकायुक्त के निष्कर्षों को स्वीकार या अस्वीकार करने या न करने का अधिकार प्रदान करता है.

बिल फिर से राज्यपाल को भेजा जाएगा और वह इस समय हस्ताक्षर करने के लिए बाध्य हैं. मौजूदा हालात में राज्यपाल बिल को ख़ारिज नहीं कर सकतीं. हालांकि वे उसे राष्ट्रपति को विचारार्थ भेज सकती हैं.

लोकायुक्त मुद्दे पर मोदी और राज्यपाल के बीच पिछले कुछ सालों से टकराव चल रहा है.

लंबी लड़ाई

राज्यपाल कमला बेनीवाल ने सेवानिवृत्त न्यायाधीश आरए मेहता को 25 अगस्त 2011 को गुजरात का लोकायुक्त नियुक्त किया था.

इसके बाद क़ानूनी लड़ाई शुरू हो गई, जो क़रीब दो साल तक चली. राज्य सरकार ने उनकी नियुक्ति रद्द करने की मांग की थी और बात सुप्रीम कोर्ट तक पहुंची लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार की याचिका को ख़ारिज कर दिया था.

अगस्त में राज्यपाल और हाईकोर्ट के चीफ़ जस्टिस को लिखे एक पत्र में जस्टिस आरए मेहता ने लोकायुक्त पद संभालने से इनकार कर दिया था.

उन्होंने अपनी नियुक्ति के ख़िलाफ़ मोदी सरकार की लंबी और ख़र्चीली क़ानूनी लड़ाई को अपने फ़ैसले की वजहों में से एक बताया था.

जस्टिस मेहता का आरोप था कि जब मोदी सरकार सहयोग नहीं कर रही, तो किसी भी लोकायु्क्त के लिए काम करना संभव नहीं होगा.

राज्य सरकार पहले गुजरात हाईकोर्ट गई, लेकिन हाईकोर्ट ने लोकायुक्त के फ़ैसले को सही बताया. इसके बाद सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का रुख़ किया. वहां भी सरकार को मुंह की खानी पड़ी.

राज्य सरकार ने पहले रिव्यू पिटीशन और फिर उसके बाद क्यूरेटिव पिटीशन दाख़िल की थी, लेकिन दोनों बार कोर्ट ने अपना फ़ैसला बरक़रार रखा.

मेहता का पत्र

सेवानिवृत्त न्यायाधीश मेहता ने पत्र में कहा था, ''मैं यह ज़िम्मेदारी ग्रहण करके कैसे लोकायुक्त बन सकता हूं, जब मेरी निष्पक्षता और विश्वसनीयता सरकार और सरकारी अधिकारियों को मंज़ूर नहीं है. इनके आचरण की जांच लोकायुक्त को करनी होती है. ऐसे माहौल में जांच के नतीजे और सिफ़ारिश हमेशा सवालिया निशानों के घेरे में रहेगें.''

उन्होंने आगे कहा, ''सरकार विरोधी होने के आरोप से दुख पहुंचता है. कुछ लोग मानते हैं कि अगर कोई व्यक्ति सरकार के साथ नहीं है, तो वह सरकार विरोधी ही होगा. वह स्वतंत्र और निष्पक्ष लोगों वाले वर्ग के बारे में नहीं सोचते.''

'45 करोड़ रुपए ख़र्च'

गुजरात सरकार ने जस्टिस आरए मेहता को रोकने के लिए 45 करोड़ रुपए ख़र्च किए थे.

मेहता ने लिखा था, ''कहा जाता है जनता के पैसे से पैंतालीस करोड़ रुपए इस मुक़दमे में गुजरात सरकार की तरफ़ से ख़र्च किया गया है.''

सूचना के अधिकार के तहत मिली जानकारी के मुताबिक़ अहमदाबाद स्थित नेशनल काउंसिल ऑफ़ सिविल लिबर्टीज़ और दूसरे ग़ैरसरकारी संगठनों ने लोकायुक्त मामले में सरकार का समर्थन करने के लिए शीर्ष वकीलों के क़ानूनी शुल्क का भुगतान किया था. गुजरात उच्च न्यायालय में लड़ाई हारने के बाद राज्य सरकार जब सुप्रीम कोर्ट चली गई थी तो दो ग़ैरसरकारी संगठन उसके साथ सहयाचिकाकर्ता बन गए थे.

<bold>(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए <link type="page"><caption> यहां क्लिक करें</caption><url href="https://play.google.com/store/apps/details?id=uk.co.bbc.hindi" platform="highweb"/></link>. आप हमें <link type="page"><caption> फ़ेसबुक</caption><url href="https://www.facebook.com/bbchindi" platform="highweb"/></link> और <link type="page"><caption> ट्विटर</caption><url href="https://twitter.com/BBCHindi" platform="highweb"/></link> पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)</bold>