सरोगेसी: गुजरात की 'बेबी फैक्ट्री' जहाँ मिलती है किराए की कोख

- Author, लूसी वालिस
- पदनाम, बीबीसी न्यूज
भारत में किराए की कोख यानी सरोगेसी का बाजार लगभग 63 अरब रुपये से ज्यादा का है.
गर्भ धारण के दौरान सरोगेट माताएं अलग सामूहिक शयन गृहों (डॉर्मेट्री) में रहती हैं, जिसे आलोचक 'बेबी फैक्टरी' कहते हैं.
निःसंतान लोगों को इस प्रकार संतान की प्राप्ति होती है लेकिन उन महिलाओं की स्थिति दयनीय होती है जो पैसे के लिए दूसरे का भ्रूण वहन करती हैं.
28 वर्षीय महिला वसंती गर्भवती हैं और उनके पेट में पल रहा भ्रूण एक जापानी दंपति का है. इसके लिए उन्हें करीब पांच लाख रुपए मिलेंगे.
यह राशि उनके नए घर के लिए पर्याप्त होगी और अपने दोनों बच्चों को अंग्रेजी स्कूल में पढ़ाने का उनका सपना भी पूरा हो जाएगा.
वसंती कहती हैं, ''भारत में परिवारिक संबंध काफी मजबूत होते हैं. आप अपने बच्चे के लिए कुछ भी कर गुज़रने को तैयार रहते हैं.''
सरोगेसी हाउस
गुजरात के एक छोटे से शहर आणंद में डॉ. नयन पटेल का अस्पताल है. वसंती भ्रूण इम्प्लांट के बाद इसी अस्पताल के पास ही स्थित डॉर्मेट्री में नौ महीने रहीं.
यहां उनके साथ 100 अन्य सरोगेट माताएं भी थीं और प्रत्येक कमरे में 10 माताओं को रखा गया था.

ये सभी डॉ. पटेल से जुड़ी हुई हैं.
डॉर्मेट्री की नर्सें उन्हें समय-समय पर खाना, विटामिन और दवाएं देती रहती हैं और आराम करते रहने की सलाह देती हैं. लेकिन बच्चे का जन्म होने तक उन्हें घर जाने की अनुमति नहीं होती.
डॉर्मेट्री में गर्भावस्था के दौरान सेक्स वर्जित है. यहां के नियम के अनुसार, किसी भी दुर्घटना के लिए कोई जिम्मेदार नहीं है, न अस्पताल, न डॉक्टर और न संतान चाहने वाला दंपति.
पैसा
अगर सरोगेट माता जुड़वां बच्चों को जन्म देती है तो उसे करीब सवा छह लाख रुपए मिलता है और यदि पहले ही गर्भ गिर गया तो उसे करीब 38,000 रुपए देकर विदा कर दिया जाता है.
बच्चा चाहने वाले दंपति से अस्पताल हर सफल गर्भवास्था के लिए करीब 18 लाख रुपए लेता है.
आइवीएफ क्लीनिक और डॉर्मेट्री की संचालिका डॉ. पटेल को लेकर विवाद भी कम नहीं है.
वह कहती हैं, ''मुझे बहुत कुछ सहना पड़ता है. लोग आरोप लगाते हैं कि यह बच्चा पैदा करने का यह व्यवसाय है, बच्चा बनाने की फैक्ट्री है. इससे ठेस लगती है.''
कुछ लोगों का कहना है कि सरोगेट माताओं का शोषण होता है लेकिन पटेल इससे सहमत नहीं हैं.
वह कहती हैं, ''माताएं शारीरिक श्रम करती हैं और इसके लिए उन्हें उचित पारिश्रमिक दिया जाता है. वे जानती हैं कि बिना कष्ट के लाभ नहीं मिल सकता.''
पटेल के अनुसार, सरोगेट हाउस में रहते हुए महिलाओं को सिलाई-कढ़ाई जैसे हुनर सिखाए जाते हैं ताकि बाहर जाने पर वह अपनी आजीविका कमा सकें.
यह पारिश्रमिक स्थानीय मानकों से कहीं ज्यादा है. वसंती को मिलने वाली राशि उसके पति की 2500 रुपए प्रति माह की कमाई की तुलना में बहुत ज्यादा है.
कुछ माताएं दोबारा मां बनने के लिए आती हैं लेकिन पटेल एक महिला को सिर्फ तीन बार ही गर्भ धारण की इजाजत देती हैं.

भारत में दुनिया के एक तिहाई गरीब रहते हैं और आलोचक कहते हैं कि महिलाओं के इस ओर रुझान के पीछे ग़रीबी सबसे बड़ा कारण है.
डॉ. पटेल कहती हैं कि भारत सरोगेसी का हब बन गया है इसके पीछे कई कारण हैं. यहां अच्छी तकनीक उपलब्ध है और लागत भी अपेक्षाकृत कम है. यहां का कानून भी अनुकूल है.
भारतीय कानून के अनुसार पैदा होने वाली संतान पर सरोगेट माता का न तो हक होता है न ही जिम्मेदारी, वहीं पश्चिमी देशों में जन्म देने वाली माता ही असली मां मानी जाती है और जन्म प्रमाणपत्र पर उसी का नाम होता है.
कठिन जिंदगी
लेकिन सरोगेट माताओं की सामाजिक जिंदगी इतनी आसान नहीं होती क्योंकि इसे हेय दृष्टि से देखा जाता है.
जब वसंती और उनके पति ने नया घर लिया तो उन्होंने अपने मोहल्ले से दूर जाना पड़ा क्योंकि वहां उन्हें कोई नहीं जानता है.

वसंती कहती हैं, ''जब घर पर होते हैं तो यह बात किसी से छिपी नहीं रहती कि आप सरोगेसी माता हैं और गर्भ में एक टेस्ट ट्यूब बेबी है और लोगों का नज़रिया बदल जाता है.''
वसंती ने ऑपरेशन के जरिए एक बच्चे को जन्म दिया. वह जानती थी कि जापानी दंपनि ने एक प्यारी बच्ची की कामना की थी.
जन्म देने के तुरंत बाद बच्चे को वहां से हटा दिया गया. वसंती के अनुसार, उन्होंने उस बच्चे को चार से पांच सेकंड ही देख होगा. यह बताते हुए वसंती आंखें भर आती हैं.
वसंती आज अपने नए घर में रहती है और उसने अपने दोनों बच्चों को अंग्रेजी स्कूल में दाखिला करा दिया है.
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