'हुसैन जैसा जुनूनी कोई आज तक न हुआ'

- Author, वैभव दीवान
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
दक्षिण मुंबई के पॉश इलाके में एक आर्ट गैलरी में पिछले कुछ साल से मशहूर चित्रकार एमएफ़ हुसैन की पेंटिंग्स की प्रदर्शनी चल रही है. इस आर्ट गैलरी के संचालक तुषार सेठी, हुसैन के चाहने वालों से उधर लेकर उनकी पेंटिंग्स अपने यहाँ प्रदर्शित करते हैं. तुषार ने बीबीसी से बात करते हुए मक़बूल फ़िदा हुसैन से जुड़ी कई बातें बताईं.
पिता भी थे प्रशंसक
वे बताते हैं, ''मैं लगभग 20 साल से एमएफ़ हुसैन को उनके काम से जानता हूँ . पहले मेरे पिता विक्रम सेठी इस आर्ट गैलरी को संभालते थे और अब मैं.
मेरे पिताजी हुसैन साहब के बारे में ख़ासी जानकारी रखते थे. उनकी पेंटिंग्स अक्सर हमारे यहाँ ही डिस्प्ले होती थीं.
हालाँकि हमारे पास हुसैन साहब की सिर्फ़ तीन या चार पेंटिंग्स ही हैं लेकिन हम हर साल उनके प्रशंसको से उनकी वर्षगांठ पर पेंटिंग्स उधार लेकर यहाँ प्रदर्शित करते हैं.
इस साल भी हम हुसैन साहब की 100 पेंटिंग्स प्रदर्शित कर रहे हैं. ये एक फ्री प्रदर्शनी है जहां पेंटिंग्स बेचीं नहीं, बल्कि दिखाई जाएँगी.''
तीस हज़ार पेंटिंग्स हुसैन के नाम

तुषार कहते हैं, ''एमएफ़ हुसैन कला की दुनिया के महारथी थे. एक आर्टिस्ट होने के लिए एक आदमी के पास अपना एक सिग्नेचर स्टाइल होना चाहिए और हुसैन साहब के पास वह स्टाइल था.''
बीबीसी से बातचीत में तुषार का कहना था, ''कुछ कलाकार अपने इस स्टाइल में नयापन नहीं ला पाते और कुछ समय बाद उनका काम एक सा दिखने लगता है. पर ऐसा हुसैन के साथ नहीं था, वो निरंतर अपनी शैली में बदलाव लाते रहे.
इसलिए वो अपने जीवन में लगभग तीस हज़ार पेंटिंग बना पाए.
हुसैन का मानना था कि हर आर्ट प्रशंसक के घर में उनकी एक न एक पेंटिंग तो ज़रूर हो.
एक बार वो अपने किसी मित्र के घर गए और रात को उन्हें वही ठहरना था. उनके उस दोस्त के घर में एक भी पेंटिंग नहीं थी. रात को सोने से पहले उन्होंने घर की एक दीवार पर एक पेंटिंग बना डाली.
अगली सुबह जब सब जागे तो हुसैन साहब की इस पेंटिंग ने सबको चौंका दिया.''
'भारत के पिकासो'
आर्ट गैलरी के संचालक तुषार बताते हैं, ''हुसैन का स्टाइल पिकासो से काफी मिलता था. जब भारत में 80 के दशक में कला को ज्यादा अहमियत नहीं मिल रही थी, तो एमएफ़ हुसैन ने कई मार्केटिंग स्ट्रैटजी अपनाई और अपने काम और नाम को जीवित रखा.

हुसैन ने उस दौर में होने वाले राजनीतिक बदलावों, क्रिकेट में भारत-पाक के रिश्तों और कॉर्पोरेट जगत की गतिविधियों पर पेंटिंग बनाईं.
ऐसी पेंटिंग्स से लोग अपने आप को जोड़ पाते थे और इसी कारण हुसैन हमेशा आर्ट के जानने वालों और ना जानने वालो में मशहूर रहे.''
<link type="page"><caption> (हुसैन पर ई-बुक)</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/entertainment/2009/11/091113_hussain_ebook_pa.shtml" platform="highweb"/></link>
तुषार का कहना है, ''हुसैन ने मीडिया को और मीडिया ने हुसैन को बहुत सपोर्ट किया. हुसैन भारत में छपने वाले अखबारों को फ्री में अपनी पेंटिंग या स्केच दे देते थे और अगले दिन वो देश भर में प्रकाशित होती थीं, इसके कारण हुसैन साहब का नाम घर-घर पहुंच गया और ऐसा कोई पेंटर अभी तक नहीं कर पाया है.''
हुसैन की पेंटिंग्स के दाम
वे बताते हैं, ''हुसैन का जैसा मन करता था वो वैसे दाम पर अपनी पेंटिंग दे देते थे. मेरे पास एक बार एक बहुत बड़ा क्रिकेट खिलाड़ी आया, जिसने मुझसे हुसैन की पेंटिंग खरीदनी चाही.
मेरे दाम सुनकर वो हुसैन साहब के पास गया, जिन्होंने उसे वही पेंटिंग मेरे दाम से 75 फीसदी कम दाम पर दे दी. हुसैन को अपनी पेंटिंग को बेचने से ज़्यादा उन्हें सही घर तक पहुंचाने का चाव था.
आने वाली प्रदर्शनी में मेरे पास हुसैन की ऐसी पेंटिंग भी है जो उन्होंने 700 रुपये में मुंबई के एक पारसी परिवार को दी थी. अब शायद उस कलाकृति की कीमत तीन-चार लाख रुपए है.
हुसैन साहब की एक पेंटिंग विश्व की मशहूर आर्ट गैलरी क्रिस्टी में नीलाम की गई थी, जो पांच करोड़ रुपए में बिकी.''
आलोचकों ने हुसैन को कभी नहीं अपनाया
तुषार के मुताबिक़ ''हुसैन किसी आर्ट स्कूल से ताल्लुक नहीं रखते थे. उन्होंने पेंटिंग फ़िल्म के पोस्टर पेंट कर-करके सीखी. ब्रश पकड़ने का और उसे कैनवास पर ढालने का स्टाइल हुसैन का अपना ही था.

इसीलिए आलोचकों को उनकी पेंटिंग्स में कमियाँ नज़र आती हैं.
हुसैन ने अपने आलोचकों की कभी नहीं सुनी. उन्हें जो पसंद आता, वो उसे बनाते थे.''
उनके मुताबिक़ ''लोग कहते हैं कि हुसैन की ये बेबाकी, कलाकारों और आलोचकों दोनों को नापसंद थी.
<link type="page"><caption> एमएफ़ हुसैन</caption><url href="http://newsforums.bbc.co.uk/ws/hi/thread.jspa?forumID=11219" platform="highweb"/></link> को चाय पीने का बड़ा शौक था. वो तैय्यब मेहता और राम कुमार जैसे अपने कुछ ख़ास पेंटर दोस्तों के साथ ही घूमते थे.
कला समीक्षकों ने कभी हुसैन को गंभीर पेंटर नहीं माना और न हुसैन ने कभी अपनी पेंटिंग को गंभीरता से लिया. उनके जो मन में आया, वो उन्होंने कैनवास पर उतार दिया.''
'ऐसा जुनूनी और कोई नहीं'
हुसैन के जीवन के बारे में तुषार बताते हैं, ''हुसैन साहब एक जुनूनी इंसान थे. पार्टियों में ब्रश को घुमाते-फिराते पहुँच जाते थे. उनको गाड़ी में सोने का शौक था.
एक बार दुबई में उन्होंने अपने ड्राईवर से कहा- दो घंटे सड़कों पर गाड़ी यूं ही घुमाओ. मैं सोना चाहता हूं.
अपने देहांत से पहले उन्होंने अपने आगे के पांच साल भी योजना बना रखी थी कि कैसे ज़िंदगी बितानी है.
हुसैन वाकई भारतीय कला का सबसे बड़ा नाम है और वो किसी लेजेंड से कम नहीं थे.''
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