'मीडियापाल जैसी नियामक संस्था की ज़रूरत है'

- Author, क़मर वहीद नक़वी
- पदनाम, मीडिया विश्लेषक
16 दिसंबर के मामले को जिस तरह से मीडिया कवर कर रहा है उसकी भूमिका पर सवाल खड़े हो गए हैं.
16 दिसंबर को हुआ सामूहिक बलात्कार कांड जिस तरह से हुआ उससे लोगों की भावनाएं जुड़ गईं. समाज का हर वर्ग बलात्कार के विरुद्ध उठ खड़ा हुआ.
मीडिया उनकी भावनाओं को स्वर दे रहा था. यहां तक तो उसकी भूमिका सराहनीय रही.
मगर सामूहिक बलात्कार के अभियुक्तों पर अदालत का अंतिम फ़ैसला आने तक <link type="page"><caption> मीडिया</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/09/130904_britain_media_dp.shtml" platform="highweb"/></link> जिस तरीक़े से कवरेज कर रही है, उसे लेकर चिंता हो रही है.
अदालत पर दबाव
मीडिया में व्यापक कवरेज आ रहा है. चैनलों पर 'अपराधियों को फांसी दो' के नारे लग रहे हैं, सड़कों पर प्रदर्शन हो रहे हैं, अख़बारों में राजनेताओं के बयान आ रहे हैं.
इन सारी चीज़ों से अदालत पर दबाव बन रहा है. अदालत अपना काम कर रही है.
ठीक है कि अदालत ने मान लिया है कि उन्होंने अपराध किया है. फ़ैसला आने के बाद टिप्पणी की जाती, कि वो सही था या ग़लत, तो बेहतर होता.
सज़ा तय करने का काम अदालत का है. ये काम मीडिया, राजनेताओं या समाज का नहीं है.
भूमिका पर सवाल

इस मामले में मीडिया की भूमिका ये होनी चाहिए थी कि वह अदालत को मौक़ा देती कि वह अपना फ़ैसला सुनाए. उसके बाद मीडिया व्याख्या करता कि फ़ैसला सही, या ग़लत था. सज़ा कम थी, या ज्यादा थी.
पहले से इस तरह की व्याख्या से मीडिया को <link type="page"><caption> बचना चाहिए</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/science/2013/08/130822_linkedin_profiles_for_children_dil.shtml" platform="highweb"/></link> था.
व्यापक तौर से देखा जाए तो इस बलात्कार कांड के अलावा पहले भी कई ऐसे मामले हुए जिसमें समाज अलग क़िस्म की भावुक धारा में बहता दिखा. उसमें मीडिया भी बहा.
जैसे सरबजीत का मसला था. इसमें पूरे देश में भावनाओं का उफ़ान आ गया. मीडिया भी उसी उफ़ान में बह गयी. सरबजीत को शहीद घोषित करने जैसी मांगें उठाई गईं.
तर्कपूर्ण विमर्श की बजाए भावनाओं के आधार पर राय बनाना ख़तरनाक साबित होता है.
निष्पक्ष रिपोर्टिंग
टेलीविज़न में न्यूज़ ब्रॉडकास्टिंग स्टैंडर्ड अथॉरिटी (एनबीएसए) प्रेस काउंसिल के मुक़ाबले बहुत अच्छा काम कर रही है.
एनबीएसए तय करती है कि किस तरह के फ़ुटेज, या भाषा नहीं इस्तेमाल की जानी चाहिए. टीवी मीडिया ने दोंनो मौक़ों पर बहुत संयम बरता.
कई मौक़ों पर, जैसे अयोध्या फ़ैसला, तेलंगाना विभाजन का प्रस्ताव आने के समय, एनबीएसए ने मीडिया के लिए पहले से कुछ परामर्श घोषित कर रखे थे.
तब टेलीविज़न मीडिया ने बेहद संयमित ढंग से दोनों मामलों की रिपोर्टिंग की थी. इस मामले में भी एनबीएसए को पहले से सलाह घोषित करने चाहिए.
अभी भी एनबीएसए को इस बार भी सक्रियता दिखानी चाहिए.
मगर एनबीएसए के नियंत्रण में कुल मिलाकर 40-45 टेलीविज़न चैनल हैं. देश का मीडिया 40-45 चैनलों से नहीं बनता है.
देश का मीडिया बहुत बड़ा है. तमाम क्षेत्रीय चैनल हैं. छोटे-छोटे केबल ऑपरेटरों के चैनल हैं. अख़बार, वेबसाइट्स, समाचारों की वेबसाइट्स हैं. इतनी सारी चीज़ों को देखने की ज़रूरत है.
अभी मीडिया एकदम अनियंत्रित स्थिति में है.
मीडियापाल

इसलिए मीडिया का अपना तंत्र होना चाहिए. सेल्फ़ रेगुलेशन का और आत्मनियंत्रण का.
मीडिया तो बहुत बड़ा है. प्रिंट मीडिया है, तमाम वेबसाइट्स हैं. सोशल मीडिया है. तो एक बहुत बड़ा मैकेनिज्म चाहिए.
एक मीडियापाल जैसा तंत्र होना चाहिए. क्योंकि आज कन्वर्जेंस का जमाना है. हर <link type="page"><caption> मीडिया</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/09/130831_urdu_media_review_aa.shtml" platform="highweb"/></link> हाउस के पास प्रिंट है, टीवी है, वेब भी है.
तो अगर मीडिया कंटेंट को नियंत्रित करने के लिए अलग अलग ईकाइ होगी तो उनके बीच मतभेद भी हो सकते हैं.
एक बड़ी मीडियापाल जैसी नियामक संस्था हो. मगर वह सरकार से स्वतंत्र हो. वह आत्मनियंत्रण को इस तरह लागू करे कि वह पूरे देश में मीडिया के सभी प्लेटफार्म को अपनी नीति के दायरे में ला सके.
मीडियापाल में मीडिया के लोग रहें, सिविल सोसायटी के लोग हों. राजनीतिक दबाव नहीं हो.
कंटेंट के मामले में टीवी, रेडियो, इंटरनेट तमाम तरह के कंटेट को देखे और पूरे देश में उसका एक ही मानक हो. ऐसा नहीं कि मीडिया की एक अथॉरिटी एक फ़ैसला दे रही हो और दूसरी अथॉरिटी दूसरा.
इसके अलावा मीडिया में एंट्री, कारोबार और पेड न्यूज़ के सवाल भी बहुत ज़रूरी हैं.
अभी ऐसी कोई व्यवस्था नहीं होने के कारण इस तरह के छोटे-मोटे मसलों पर बहस होती रहती है.
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