मुंबई में महिलाओं की सुरक्षाः कितनी हक़ीक़त कितना फ़साना

- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
मुंबई के बारे में आम धारणा ये बनी हुई है कि भारत के दूसरे शहरों की तुलना में देश का सबसे पाश्चात्य 'महानगर' औरतों के लिए सुरक्षित है.
यहां समाज में उदारता है. लोग खुले विचारों के हैं और लड़के-लड़कियां खुल कर मिलते हैं.
मुंबई बॉलीवुड का गढ़ और मनोरंजन केंद्र भी है. ये सपनों का शहर है. मुंबई की शाम रंगीन होती है.
लेकिन इस आम धारणा में कितनी हक़ीक़त और कितना फ़साना है?
मैं लंदन से 2004 में जब मुंबई रहने आया, तो ये देख कर हैरान था कि किस तरह कम कपड़े पहने महिलाएं पार्टियों के बाद देर रात ऑटो रिक्शे पर वापस घर जाती हैं.
महिलाएं तो खुद को इतना सुरक्षित लंदन में भी नहीं समझती थीं.
महिलाओं की सुरक्षा दिल्ली का मुद्दा
मैंने कई बार शराब के नशे में चूर लड़खड़ाती लड़कियों को बार से निकल कर सड़कों पर देर रात चलते भी देखा. लेकिन उनके साथ मर्दों को छेड़ छाड़ करते नहीं देखा.
मुझसे मुंबई की हर महिला दोस्त ये गर्व से कहती थी कि महिलाओं के लिए सुरक्षा का मुद्दा दिल्ली वालों कामसला है.
सभी दावे करती थी कि मुंबई में अकेली लड़की देर रात भी घर से बाहर सुरक्षित है.
लेकिन साथ ही मैंने ये भी देखा कि समाज का एक बड़ा वर्ग काम करने वाली अकेली महिलों को इज्ज़त की नज़र से नहीं देखता.
मैंने ये भी देखा कि सड़क पर चलती अकेली महिला को घूर कर देखने वालों और सीटियाँ बजाने वालों की भी कमी नहीं.
मैंने पिछले नौ सालों में मुंबई में महिलाओं के खिलाफ़ बलात्कार और यौन हमलों पर रिपोर्टिंग भी की.
अनुभूति और हक़ीक़त में फासला
कल के सामूहिक बलात्कार के बाद मैंने मुंबई की अपनी कुछ महिला दोस्तों से बात की और पूछा कि उनकी राय अब भी यही है कि मुंबई लड़कियों के लिए सुरक्षित है?
वर्षा नायक अँधेरी की रहने वाली हैं और देर रात घर लौटना उनकी आदत सी है. वे कहती हैं, "ये हम नहीं कह सकते थे कि मुंबई में औरतों के खिलाफ़ हमले नहीं होते लेकिन मैं आज भी खुद को रात के किसी भी पहर घर से बाहर सुरक्षित महसूस करती हूँ."
मेरी एक और महिला दोस्त ने कहा, "पिछले कुछ सालों से मुंबई में बलात्कार और यौन हमले बढ़े हैं और इस बात को गंभीरता से लेना चाहिए."
उनसे कई और लोगों ने सहमति जताई.
शायद इसीलिए कलमुंबई में एक युवती के सामूहिक बलात्कार के बाद शहर में सनसनी फैल गई. और अब ये सवाल पैदा होता है कि अनुभव और हक़ीक़त में कोई फर्क है?
अगर आप सरकारी आंकड़ों पर नज़र डालें तो पता चलेगा कि अनुभव और हक़ीक़त में लंबा फ़ासला है. राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार मुंबई में 2011-12 में 207 महिलाओं का बलात्कार हुआ जबकि 552 के ख़िलाफ यौन हमले किए गए.
इससे भी गंभीर सच इन आंकड़ों के दायरे से बाहर है. लड़कियों के साथ छेड़ छाड़ की वारदातों में तेज़ी से बढ़ोतरी हो रही है. मनोरंजन उद्योग में औरतों के खिलाफ़ अत्याचार चरम सीमा पर है.
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार 2011 में मुंबई में महिलाओं के खिलाफ़ छेड़ छाड़ की 162 वारदातें दर्ज़ की गईं जबकि दिल्ली में ये संख्या कुछ कम थी.
आम धारणा और सच्चाई में फर्क़ क्यों है?

संहिता कसकर मुंबई में 30 साल पहले पैदा हुईं. वे आज एक कामयाब कंपनी की मालिक हैं. वो शहर के हर डिस्को और बार का चक्कर पिछले कई सालों से लगाती आ रही हैं. ऑटो रिक्शा में देर रात घर लौटना उनकी आदत है.
संहिता कहती हैं, "हम बचपन से लड़कों के साथ उठते बैठते आ रहे हैं. हमारे दोस्तों के लिए लड़कियां कोई अनोखी चीज़ नहीं हैं. लड़के और लड़कियों में आपस में कॉफ़ी और शराब पर मिलना जुलना आम बात है. जिस समाज में हम उठते बैठते हैं वहां महिलाओं की सुरक्षा कभी बहस का मुद्दा नहीं होता."
वो आगे कहती हैं, "हमें अकेले घर जाते कभी डर नहीं लगता. लेकिन अब मुंबई शहर बदल रहा है. यहाँ देश के हर कोने से लड़कियां आती हैं और लड़के भी. शहर का माहौल भी बदल रहा है. शायद मुंबई के बारे में जो आम धारणा बनी है उसे बदलने की ज़रूरत है."
महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराध पर रिपोर्टिंग
कुछ लोगों का ये मानना है कि मुंबई के अंग्रेज़ी प्रेस ने आम धारणा को बढ़ावा दिया है.
पिछले साल दिसंबर में दिल्ली में एक चलती बस में हुए सामूहिक बलात्कार के बाद मुंबई के अंग्रेज़ी अख़बारों ने पहली बार मुंबई में औरतों के खिलाफ़ होने वाले अपराधों पर जम का रिपोर्टिंग करनी शुरू की.
एक अख़बार ने तो औरतों के खिलाफ़ अपराध पर एक मुहिम भी चलाई. कल के सामूहिक बलात्कार के बाद भी मुंबई के ये अख़बार इस मुद्दे को उठा रहे हैं.
ऐसा लगता है कि जल्द ही मुंबई में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर हक़ीक़त और फ़साने के बीच दूरी काफी कम हो जाए और ऐसा जितनी जल्द हो उतना अच्छा.
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