क्या आर्थिक संकट की दहलीज पर खड़ा है भारत?

- Author, लिंडा यूह
- पदनाम, मुख्य आर्थिक संवाददाता
क्या भारत पर एक और आर्थिक संकट का खतरा मंडरा रहा है और क्या इससे दूसरे देश कोई सबक सीख सकते हैं?
कमजोर भारतीय मुद्रा संकट को बढ़ावा देगी, ऐसा ज़रूरी नहीं है. लेकिन अगर यह कमजोरी विदेशी लेनदारों के बकाया भुगतान को कठिन बना देती है तो ऐसे में यह एक समस्या बन सकती है.
इस मसले पर भारतीय रिजर्व बैंक के नवनियुक्त गवर्नर रघुराम राजन के साथ मैंने पिछले साल चर्चा की थी. उस समय वह सरकार के वरिष्ठ आर्थिक सलाहकार थे.
हमने उन जोखिमों के बारे में चर्चा की जिनसे 1991 के भुगतान संतुलन के संकट की पुनरावृत्ति के रूप में भारत रूबरू हो सकता है. अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के बचाव के बाद इस संकट का अंत हुआ था.
दोनों स्थितियों में कुछ प्रमुख समानताएँ हैं. भारत में चालू खाता घाटा लगातार बना रहा है और इस घाटे को पूरा करने के लिए उधारी की लागत में कमजोर रुपया कोई मदद नहीं करता है.
चिंताजनक रूप से 1991 के मुकाबले भारत का चालू खाता घाटा काफी अधिक है और रुपया अधिक कमजोर.
जुलाई 1991 में अमरीकी डॉलर के मुकाबले रुपए की क़ीमत में 32 प्रतिशत से अधिक की गिरावट आई. भारत के ख़जाने में विदेशी मुद्रा भंडार खत्म होने की कगार पर था. ऐसी स्थिति में सरकार को अपने आयात के खर्च को पूरा करने के लिए देश का सोना गिरवी रखना पड़ा था.
खतरे की घंटी

मई से अब तक 15 प्रतिशत गिरावट के साथ रुपया अमरीकी डालर के मुकाबले सर्वकालिक निचले स्तर पर जा पहुंचा है. अमरीकी फेडरल रिजर्व के प्रोत्साहन पैकेज को वापस लिए जाने की संभावना की चर्चाओं के चलते निवेशक भारत जैसे उभरते बाजार से पैसा वापस खींच रहे हैं.
मैं बड़ी मात्रा में मुद्रा संकट और इससे जुड़ी उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए खतरे की घंटी विषय पर पहले लिख चुकी हूँ.
सर्वाधिक असुरक्षित देश वो हैं जिनका चालू खाता घाटा काफी अधिक है और भारत इसी श्रेणी में आता है. पिछले साल भारत का चालू खाता घाटा जीडीपी के मुकाबले 6.7 प्रतिशत के स्तर पर जा पहुंचा था, जो एक रिकॉर्ड है.
इसी तरह 31 मार्च को खत्म हुए वित्त वर्ष के दौरान चालू खाता घाटा जीडीपी के मुकाबले करीब पांच प्रतिशत था.
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के मुताबिक अगर किसी देश का चालू खाटा घाटा जीडीपी के मुकाबले छह प्रतिशत के स्तर पर पहुंच जाचा है, तो समझिए खतरे की घंटी बज गई.
हालात तब और भी मुश्किल हो जाते हैं, जब अत्यधिक राजकोषीय घाटे के साथ ही मुद्रास्फीति की दर भी काफी अधिक होती है. राजकोषीय घाटा हाल में ही जीडीपी के मुकाबले पांच प्रतिशत से कुछ कम हुआ है.
आर्थिक चुनौतियां

इन दोनों कारणों से विदेशी निवेशक देश छोड़कर जाना चाहते हैं.
भारत की आर्थिक विकास दर घटकर पांच प्रतिशत के कम रह गई है, जो एक दशक के दौरान सबसे कम है. दूसरी ओर 2000 के दशक के मध्य में यह आंकड़ा नौ प्रतिशत के जादुई स्तर को छू गया था.
आर्थिक विकास दर एक बार फिर 4-5 प्रतिशत के दायरे में जा पहुंची है.
ऐसे में भारत के व्यापार और बजटीय घाटे को देखते हुए आश्चर्य नहीं कि आरबीआई गवर्नर राजन एक और संकट को लेकर चिंतित हों.
इन दोनों से निपटने के लिए जिन सुधारों की ज़रूरत है, वो सरकार के दायरे में आते हैं. इसलिए एक केन्द्रीय बैंक के गवर्नर के रूप में वो कितना कर सकते हैं, यह एक अलग विषय है.
राजन वह व्यक्ति हैं जिन्होंने अमेरिकी हाउसिंग संकट के बारे में चेतावनी दी थी और अब उन्होंने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सरकार को सलाह दी है. आईएमएफ के पूर्व मुख्य अर्थशास्त्री के रूप में भी राजन को वित्तीय संकटों और उसके परिणामों का अनुभव है.
हर संकट के अपने अलग कारण होते हैं. भारत को 1990-91 में कुछ खास झटके सहने पड़े थे. इसमें पहला खाड़ी युद्ध शामिल है.
मुद्रा की रवानगी

इस बार उभरती अर्थव्यवस्थाओं से बड़े पैमाने पर विदेशी मुद्रा के देश से बाहर जाने के कारण संकट पैदा हुआ है.
इस पूरी घटना के मायने क्या हैं. भारत में 1991 के आर्थिक संकट के बाद सुधारों की गति तेज हुई और देश का दुनिया भर से जुड़ाव बढ़ा और इस कारण तेजी से विकास देखने को मिला.
कुछ लोगों के मुताबिक सुधारों की प्रक्रिया में पिछड़ने के कारण भारत की विकास गाथा को झटका लगा है. खतरे की आहट के कारण सुधारों में तेजी आ सकती है ताकि औद्योगीकरण को बढ़ावा मिल सके और नियामक बोझ कम हो सके और महत्वपूर्ण रूप से शिक्षा जैसे दूसरे क्षेत्रों में निवेश बढ़े.
कहने की ज़रूरत नहीं है कि राजन के सामने चुनौतियां काफी बड़ी हैं. विश्व अर्थव्यवस्था में भारत के महत्व को देखते हुए कहा जा सकता है कि राजन इन चुनौतियों से जिस तरह निपटते हैं, उसके वैश्विक प्रभाव हो सकते हैं.
सस्ती मुद्रा के दौर की समाप्ति के चलते पैदा हुए हालात को वह किस तरह संभालते हैं, वह दूसरी उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए भी सबक बन सकता है.
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