'कम से कम मस्जिद के पीछे तो इश्क़ न लड़ाएं'

- Author, नितिन श्रीवास्तव
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
उत्तर प्रदेश के फैज़ाबाद शहर की कुछ चुनिंदा ऐतिहासिक इमारतों में से एक है बहू बेगम का मक़बरा.
18वीं शताब्दी में अवध के तत्कालीन नवाब शुजा-उद-दौला की बीवी उन्मातुज़ोहरा बानो को उनकी मौत के बाद यहाँ दफ़नाया गया था.
इसी मक़बरे से थोड़ी दूरी पर है टीले वाली <link type="page"><caption> मस्ज़िद</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/multimedia/2013/07/130730_picgallery_ramzan_mumbai_dk.shtml" platform="highweb"/></link>.
हर साल ईद के मौके पर ये मस्जिद चहल-पहल और रौनक से गुलज़ार रहती है.
बचपन में फैज़ाबाद छुट्टी मनाने जाते थे तो ज़ाहिर है ईद के मौके की बेहतरीन यादें आज भी ज़िंदा हैं.
टीले वाली मस्जिद के पीछे वाला अमरूद का बाग़ आज भी नहीं भूल सके हैं.
बेहद मीठे सफ़ेद अमरूद जिन्हें इलाके का हर बच्चा 'गद्दर' कह कर ज़रूर चखता था.
लेकिन, अमरुद के इस बाग़ की थोड़ी ‘बदनामी’ भी थी.
छोटे-छोटे पर घने पेड़ों वाले इस बाग़ में अकसर युगल जोड़े, दीन-दुनिया से परे, एकांत में कुछ पल बिताने जो आते थे!
इमाम साहब

टीले वाली मस्जिद के <link type="page"><caption> इमाम</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2012/12/121207_ayodhya_babri_rdt_memoirs_sdp.shtml" platform="highweb"/></link> साहब बेहद उदार लोगों में से एक थे.
आस पास खेलते बच्चों को अकसर मीठे बताशे, छुआरे और शरबत तक पिलवा दिया करते थे.
लेकिन जब भी देख सका ईद के पहले रमज़ान के दिनों में इमाम साहब थोड़े बेचैन से ही नज़र आए थे.
वजह बेहद मामूली थी.
इमाम साहब को कतई नहीं पसंद था कि मस्जिद के पीछे वाले बाग़ में युगल जोड़े आते थे और घंटों गुप-चुप बैठे रहते थे.
रमज़ान के दिनों में इमाम साहब ख़ास एहतियात भी बरता करते थे.
आस-पास के गांवों के करीब चार ऐसे लोग मस्जिद के इर्द गिर्द ज़रूर चहलकदमी करते मिल ही जाते थे जो इस बात को सुनिश्चित करते थे कि अमरुद के बाग़ में युगल जोड़े चैन से न बैठ सकें.
कई बार उन्हें कहते सुना, "मस्जिद के पीछे तो इश्क़ न लड़ाएं".
नतीजतन दसियों ऐसे युगल जोड़े गुलाबबाड़ी , मिलिट्री मंदिर और गुप्तार घाट जैसी दूसरी हसीन जगहों का रुख कर लेते थे.
ईद की शाम

आज भी याद है ईद की हर वो शाम जो उस <link type="page"><caption> इलाके </caption><url href="www.bbc.co.uk/hindi/india/2012/10/121026_faizabad_update_ar.shtml" platform="highweb"/></link>में बिताई.
माहौल में केवड़े और गुलाब की ख़ुशबू.
सफ़ेद बुर्राक कुर्ते और उनके साथ या तो अलीगढ़ी या फ़िर चौड़े पायंचे वाले सूती पायजामा पहने लोग.
नए लहलहाते बुर्क़े जिनमे से छूटते हंसी के कहकहे.
सड़कों के किनारे खड़े दर्जनों ठेले जिनमे चूड़ियों से लेकर इत्र तक बिक रहा होता था.
मस्जिद के चारों ओर छोटे खुमचे जिनमे बड़ी 'हक्कानी' कढ़ाई में से छन कर निकलते शीरमाल.
इस सब के बीच एक हमारे इमाम साहब का सुकून से भरा चेहरा.
क्योंकि ईद और <link type="page"><caption> रमज़ान</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/multimedia/2013/08/130808_eid_prayers_gallery_ar.shtml" platform="highweb"/></link> का मौका अब अगले साल ही आएगा.
अमरुद के बाग़ में अगले दिन से कोई भी आए-जाए और बैठे.
इमाम साहब चैन से अज़ान करवाएँगे और बच्चों को बताशे बाटेंगे.
<italic><bold>(बीबीसी हिंदी का एंड्रॉयड मोबाइल ऐप डाउनलोड करने के लिए <link type="page"><caption> क्लिक</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/multimedia/2013/03/130311_bbc_hindi_android_app_pn.shtml " platform="highweb"/></link> करें. आप ख़बरें पढ़ने और अपनी राय देने के लिए हमारे <link type="page"><caption> फ़ेसबुक</caption><url href="http://www.facebook.com/bbchindi" platform="highweb"/></link> पन्ने पर भी आ सकते हैं और <link type="page"><caption> ट्विटर</caption><url href="https://twitter.com/BBCHindi" platform="highweb"/></link> पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)</bold></italic>












