'चुनाव जीत भर से मोदी बरी नहीं हो सकते'

- Author, राजेश जोशी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली.
भारतीय जनता पार्टी के सिद्धांतकार रह चुके के एन गोविंदाचार्य ने कहा है कि नरेंद्र मोदी को 2002 में हुए गुजरात दंगों की ज़िम्मेदारी से सिर्फ़ इसलिए बरी नहीं किया जा सकता क्योंकि वो बाद में चुनाव जीत गए.
गोविंदाचार्य का मानना है कि मोदी को इन दंगों की नैतिक ज़िम्मेदारी ज़रूर लेनी चाहिए थी. उन्होंने नरेंद्र मोदी के इस तर्क को सिरे से ख़ारिज कर दिया है कि गुजरात की जनता ने उन्हें चुनावों में जिताकर साबित कर दिया है कि वो ठीक थे.
लगभग बारह वर्ष पहले भारतीय जनता पार्टी छोड़ चुके गोविंदाचार्य राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन नाम का संगठन चलाते हैं. उन्होंने बीबीसी हिंदी सेवा के साथ कॉरपोरेट और आरएसएस तक तमाम विषयों पर विस्तृत बातचीत की.
नरेंद्र मोदी की नैतिक ज़िम्मेदारी
गोविंदाचार्य मानते हैं कि गुजरात में हुए दंगों के बारे में ये कहना ठीक नहीं है कि वो गोधरा में मारे गए लोगों की प्रतिक्रिया में हुए थे. उन्होंने कहा, “ये मानना कि (गुजरात दंगे) गोधरा की प्रतिध्वनि थी – इस विषय पर बहुत बहस करने से काम नहीं चलता. या तो आप दोनों दंगों को ग़लत मानिए या फिर दोनों को सही मान लीजिए.”
मैं मानता हूँ कि (मोदी को) नैतिक ज़िम्मेदारी ज़रूर लेनी चाहिए थी. ...बात इतनी थी कि सरकार निष्क्रिय रही तो वो राजधर्म का पालन नहीं था क्योंकि (जो अपनी रक्षा करने में सक्षम नहीं थे उनकी रक्षा करना) सरकार का कर्तव्य था.
पर उस जुनून के लिए किसी एक संगठन को ज़िम्मेदार ठहराना ज़रूरी नहीं है. अगर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ नहीं भी होता तो भी समाज में कैसी कैसी प्रतिक्रियाएँ आती हैं. समाज के एक हिस्से को गरम (उग्र) करके दूसरे से नरम प्रतिक्रिया की उम्मीद नहीं की जा सकती.

हम देखते हैं कि दोनों ही घटनाएँ ग़लत थीं. राजधर्म का तकाज़ा था कि सरकार सक्रिय रहती. आज चर्चा चलती है कि सरकार की ओर से ढिलाई थी. एक बात ये कही गई कि सरकार की ओर से जितना होना चाहिए था उसमें कमी रही.
चुनावी जीत सही और ग़लत का पैमाना नहीं हो सकता. अगर कोई कहे कि चुनावी जीत के कारण ही आदमी को सही ठहराया जा सकता है तो लालू प्रसाद यादव को भी चारा घोटाले का ज़िम्मेदार नहीं माना जाएगा. क्योंकि वो भी (घोटाला सामने आने के बाद) चुनाव जीते हैं.
कॉरपोरेट का सत्ता पर नियंत्रण
मैं ये मानता हूँ कि भारत में कॉरपोरेट सेक्टर आज सत्ता पर नियंत्रण कर रहा है या हस्तक्षेप कर रहा है. कॉरपोरेट सेक्टर किसी का नहीं होता. उसने हर दल में अपने लोग बिछाए हुए हैं. आज भी बहुत से नेता कॉरपोरेट कंपनियाँ ही बनाती और बिगाड़ती हैं.
मैं अपने काम में लगा हुआ हूँ और मेरा मक़सद है कि सत्ता का उपयोग अंतिम व्यक्ति के हक और हित में होना चाहिए. आज सभी प्रमुख राजनैतिक दल – सत्ता में हों या विपक्ष में – विदेश परस्ती और अमीर परस्ती के रास्ते पर चल रहे हैं. इसीलिए ग़रीबों के हित और हक़ की आवाज़ संसद और सदनों में कम और सड़कों पर ज़्यादा सुनाई पड़ती है.
सत्ता के अन्याय का परिणाम है नक्सलवाद

मैं हमेशा मानता हूँ कि समाज के स्तर पर विषमता, शोषण, उत्पीड़न और सत्ता का अन्याय आदि ऐसे कारण हैं जिनका परिणाम नक्सलवाद है. उसके उभरने के बाद विदेशी ताक़तों का भी उनको सहारा मिल जाता होगा. लेकिन इतना भर कह देने से काम नहीं चलता कि ये सब विदेशी एजेंट हैं. ऐसा कह कर आप सामाजिक-आर्थिक यथार्थ को भुला दें तो वहीं पहुँचेंगे जहाँ आज पहुँचे हैं.
मैं ये भी मानता हूँ कि हिंसा से नक्सलवादी अपने सपनों का समाज नहीं बना पाएँगे. पर सरकारी हिंसा से भी नक्सलवाद को समाप्त नहीं किया जा सकता. सामान्य आदमी (इस द्वंद्व के) बीच में फँसा है. इसका लाभ देसी-विदेशी ताक़तें भी लेती होंगी और कॉरपोरेट सेक्टर भी अपने हक़ में लेता रहा है.
आरएसएस राजनीति से अलग नहीं
मैं 1960 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का स्वयंसेवक बना था. 15 मई, 1961 को मैंने प्रतिज्ञा ली थी. पर मैं उन दस लाख स्वयंसेवकों में से हूँ जो रोज़ाना या हफ़्ते में एक बार शाखा में जाते हैं. मैं संघ की निर्णय प्रक्रिया में नहीं हूँ और उनके निर्णयों को उचित ठहराने या बचाव करने से भी परे हूँ. आइ डोन्ट होल्ड ब्रीफ़ फ़ॉर संघ.

आज कहा जा रहा है कि आरएसएस ने नरेंद्र मोदी की ताजपोशी करदी है. इस तरह का कोई बयान न सरसंघचालक और न ही सरकार्यवाह ही ओर से आया है. ये जाने-अनजाने माहौल बना दिया गया है.
लेकिन मैं ये नहीं कह रहा हूँ कि संघ राजनीति में दख़ल नहीं देता. जब संघ के तीन सह सरकार्यवाह टीवी पर लालकृष्ण आडवाणी जी के घर के दरवाज़े पर दिखाई पड़ेंगे और कहेंगे कि हमने देश की राजनीति के बारे में बात की, तब ये किसी को भी समझाया नहीं जा सकेगा कि संघ पूरी तरह से तटस्थ या निरपेक्ष है.
या फिर संघ के अधिकारी कहें कि (भारतीय जनता पार्टी का) जो भी अध्यक्ष बनेगा वो कम से कम दिल्ली के चार नेताओं में से नहीं बनेगा और इतना ठोक कर बोलने के बाद अगर कोई कहे कि संघ एकदम अलग है तो वो सच्चाई के प्रति अन्याय होगा.
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