मोदी क्यों करते हैं धार्मिक प्रतीकों का उल्लेख?

- Author, राजेश जोशी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
गुजरात दंगों के संदर्भ में ‘कुत्ते का बच्चा’ संबंधी बयान से उठा तूफ़ान शांत हो पाता, इससे पहले प्रधानमंत्री पद के 'दावेदार' नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस पर हमला करने के लिए एक बार फिर एक इस्लामी प्रतीक का सहारा लिया.
इस बार उन्होंने कांग्रेस का मज़ाक उड़ाने के लिए मुसलमान औरतों की वेशभूषा यानी बुर्क़े का इस्तेमाल किया.
पुणे में रविवार को एक रैली के दौरान मोदी ने कहा कि जब भी कांग्रेस को चुनौती दी जाती है वो “सेक्युलरिज़्म के बुर्क़े” में छिप जाती है.
क्या ये महज़ इत्तेफ़ाक़ है कि अपने विरोधियों पर हमला करने के लिए प्रधानमंत्री पद के प्रबल 'दावेदार' नरेंद्र मोदी इस्लामी प्रतीकों का इस्तेमाल करते हैं?
अगर मोदी के राजनीतिक अभियानों में एक-आध बार इस तरह के प्रतीकों का इस्तेमाल होता तो इसे इत्तेफ़ाक़ माना जा सकता था. पर पिछले दस बरसों में उन्होंने बार बार अपने राजनीतिक विरोधियों की धार्मिक पहचान और प्रतीकों का सहारा लिया है.
वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक नीरजा चौधरी मानती हैं कि नरेंद्र मोदी के इस बयानों का निहितार्थ किसी से छिपा नहीं है.
उन्होंने कहा, “उनको मालूम है कि अल्पसंख्यक उन पर कभी भरोसा नहीं करेंगे. वो जानबूझ कर ऐसे शब्दों का इस्तेमाल करते हैं जिसके बाद उन्हें कुछ और कहने की ज़रूरत नहीं पड़ती. सिर्फ़ इशारा होता है कि कांग्रेस पार्टी अल्पसंख्यकों का तुष्टीकरण करती है.”
‘मियाँ पटेल’
पिछले बरस हुए गुजरात विधानसभा चुनावों के दौरान मोदी ने अपने भाषणों में जब भी कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के राजनीतिक सचिव अहमद पटेल का ज़िक्र किया तो उन्हें हर बार 'अहमद मियाँ पटेल' कहकर पुकारा.
ये ढँकी-छिपी बात नहीं है कि कांग्रेस के एक मुसलमान नेता के नाम में बार बार मियाँ लगाकर मोदी क्या हासिल करना चाहते थे.
गुजरात दंगों के बाद जब केंद्रीय चुनाव आयोग ने राज्य में चुनाव के लायक उपयुक्त माहौल न होने की बात कही तो मोदी खामोश नहीं बैठे.
उन्होंने तत्कालीन चुनाव आयुक्त जेएम लिंगदोह को अपने भाषणों में बार बार उनकी ईसाई धार्मिक पहचान को रेखांकित करने के लिए उन्हें उनके पूरे नाम जेम्स माइकल लिंगदोह से पुकारा.
सितंबर 2002 के उनके एक भाषण पर ध्यान दें तो उन्होंने धार्मिक प्रतीकों में स्पष्ट कर दिया कि वो उस दौर के सांप्रदायिक माहौल में किस तरह कांग्रेस को सिर्फ़ अल्पसंख्यक समुदाय की ख़ैरख़्वाह के तौर पर पेश करना चाहते हैं.

उन्होंने कहा, “मैं कांग्रेस से पूछना चाहता हूँ कि श्रावण के महीने में साबरमती नदी के किनारे रहने वाले लोगों को नर्मदा के पानी से आध्यात्मिक सुकून मिले, इसका आप क्यों विरोध करते हैं? जब आप सत्ता में आएं तो रमज़ान के महीने में पानी लाने को स्वतंत्र हैं.”
उसी दौर में “हम पाँच, हमारे पच्चीस” वाले मोदी के बयान से काफ़ी हंगामा हुआ था.
उन्होंने कहा था कि गुजरात में जनसंख्या बढ़ रही है. ग़रीबों तक पैसा नहीं पहुँचता क्योंकि वो लाइन लगाकर खड़े हो जाते हैं.... सड़क किनारे बैठकर साइकिल का पंक्चर ठीक करते हैं.
यही नहीं उन्होंने मदरसों के बारे में भी अपने विचार खुलकर ज़ाहिर किए.
सन 2002 के दंगों के बाद उन्होंने कहा, “गुजरात में मदरसे फैले हैं. प्राथमिक शिक्षा एक बच्चे का अधिकार है, लेकिन मदरसे जाने वाले बच्चे को प्राथमिक शिक्षा से वंचित रखा जाता है. ऐसा बच्चा बड़ा होकर क्या करेगा?”
तलवार की धार
पर जैसे जैसे 2014 का आम चुनाव नज़दीक आ रहा है, नरेंद्र मोदी के लिए ये राह और कठिन होती जा रही है.
एक ओर उनको हिंदुत्व के नाम पर बहुसंख्यक समुदाय को एकजुट करना है और दूसरी ओर ख़ुद को समग्रतावादी भी दिखाना है.
इसलिए वो खिल्ली उड़ाने के अंदाज़ में इस्लामी प्रतीकों का इस्तेमाल करते हैं ताकि वो ये संदेश दे सकें कि उन्हें संविधान के सेक्युलर आधार की परवाह नहीं है.

जब तक वो सिर्फ़ गुजरात की सीमा में राजनीति करते थे तो कई बार उन्होंने सीधे सीधे अल्पसंख्यकों को निशाना बनाते हुए बात कही.
लेकिन अब उनकी महत्वाकांक्षा प्रधानमंत्री बनने की है. शायद यही वजह है कि गुजरात बीजेपी के एक मुसलमान कार्यकर्ता की मौत पर अफ़सोस जताने के लिए वो ट्विटर का इस्तेमाल करते हैं और रमज़ान के पहले दिन मुसलमानों को मुबारकबाद देना भी उनकी मजबूरी बन गई है.
साथ ही जब ख़बर छपती है कि मोदी अयोध्या में अस्थायी रामजन्मभूमि मंदिर में दर्शन करने जाएंगे तो उनके दफ़्तर से बाक़ायदा एक स्पष्टीकरण जारी किया जाता है कि मोदी अयोध्या नहीं जाएँगे.
पर वही नरेंद्र मोदी 'सदभावना यात्रा' के दौरान एक मुसलमान के हाथों नमाज़ी टोपी पहनने से साफ़ इनकार कर देते हैं क्योंकि मोदी प्रतीकों के महत्व को जानते हैं. उन्हें मालूम है कि एक बार उन्होंने नमाज़ियों की तरह टोपी पहन ली तो फिर उनमें और प्रतीकात्मकता के लिए वैसी टोपी पहनने वाले दूसरे नेताओं में कोई अंतर नहीं रह जाएगा.
ये ऐसी तलवार की धार है जिस पर मोदी अब तक चल रहे हैं और उनके विरोधियों को समझ नहीं आ रहा है कि इस धार से मोदी के पैर कटते क्यों नहीं है?
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