कश्मीर की लड़कियों को क्यों लुभा रहा है कोटा?

- Author, नारायण बारेठ
- पदनाम, जयपुर से बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
हिंसा से सुलगते कश्मीर के कई छात्र-छात्राओं ने तालीम के लिए राजस्थान में कोटा शहर का रुख़ किया है.
कोटा में वादी-ए-कश्मीर के तीन सौ से ज्यादा विद्यार्थी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में जुटे है. इनमें से ज्यादातर लड़कियां हैं.
कोटा की पच्चीस साल पुरानी कोचिंग इंडस्ट्री में यह पहला मौका है, जब कश्मीर से इतनी बड़ी तादाद में विद्यार्थी कोटा के कोचिंग केंद्रों में तैयारी के लिए आ रहे हैं.
कश्मीर के कुलगाम की रहने वाली रुकइया पूरी शिद्दत से पढा़ई कर रही हैं. रुकइया से कोटा आने का सबब पूछा तो कहने लगीं, "हम इसलिए कोटा आए हैं क्योंकि अभी वहां बहुत सारी समस्याएं हैं, हड़तालें होती हैं और मेरा लक्ष्य डॉक्टर बनना है."
रुकइया के मुताबिक़, "मैं इसके लिए तैयारी कर रही हूं, ताकि मैं भी अपने माता-पिता का नाम रोशन कर सकूं. मैं वह मंज़िल हासिल करना चाहती हूं, जिससे मेरे माता–पिता का दिल खुश हो. अगर मैं डॉक्टर बन सकी तो बहुत कुछ कर पाऊंगी."
'यहां अपनापन मिला'

कश्मीर में बर्फ की पोशाक में लिपटी हुई पहाड़ियों की जगह यह मैदानी क्षेत्र अपने अलग सामाजिक परिवेश, मौसम, भाषा और भूगोल की भिन्नता के बावजूद कश्मीर के लोगों को अपनापन दे रहा है.
कोटा के कोचिंग संस्थानों ने कश्मीरी विद्यार्थियों को मदद का ऐसा माहौल दिया कि यह सारे फासले मिट गए. कोटा के एक प्रमुख संस्थान में कश्मीर के कोई दो सौ विद्यार्थी दाखिल हुए हैं.
इस संस्थान के नवीन महेश्वरी कहते हैं कि कश्मीर के छात्र-छात्राएं अच्छी तालीम लेकर दुनिया में अपना मक़ाम बनाना चाहते है. वे बताते हैं कि यह सिलसिला 2005 में शुरू हुआ.
नवीन के अनुसार, "उस समय एक-दो विद्यार्थी कश्मीर से आने शुरू हुए क्योंकि शुरू में कई समस्याएँ थीं. इसमें मौसम, खान-पान और नई जगह जैसे सवाल भी थे लेकिन समय के साथ सब ठीक हो गया. हम इनको जानने लगे और इन्हें भी लगा कि यहां कोई भेदभाव नहीं है. इनको भी अपनी परंपरा के अनुसार लिबास पहनने की छूट है और नमाज के लिए अलग से व्यवस्था है."
महेश्वरी कहते हैं, "हम इनका पूरा ध्यान रखते हैं. यहाँ के वातावरण ने भी इनको आश्वस्त किया और इनके माता-पिता खुद भी सारी व्यवस्था देखकर संतुष्ट हुए."

पुलिस की परेशानी
संस्थान के नवीन महेश्वरी कहते हैं कि उनके छोटे भाई कश्मीर गए तो कश्मीरी परिवारों ने बहुत मेहमाननवाज़ी की और उनके शाकाहारी होने का बड़ा ख्याल रखा.
कोचिंग संस्थानों की कक्षाओं में कश्मीरी विद्यार्थी अपने पारंपरिक इस्लामी लिबास में नज़र आते हैं.
एक कोचिंग संस्थान के अधिकारी ने बताया शुरू में जब कोटा से कश्मीर के लिए बहुत फोनकॉल होने लगे तो पुलिस का माथा ठनका. लेकिन बाद में पुलिस को सच्चाई पता लगी तो उन्होंने राहत की सांस ली.
'मैं भी कुछ कर सकती हूं'
कुलगाम की महविश रियाज़ की हसरत <link type="page"><caption> आईएएस</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/05/130507_jammu_kashmir_ias_girl_akd.shtml" platform="highweb"/></link> बनने की है लेकिन उसके अब्बू उसे डॉक्टर के रूप में देखना चाहते हैं.
इसलिए वह अब डॉक्टर बनने के लिए तैयारी कर रही हैं. महविश कहती हैं कि शुरू में परेशानी हुई, मगर अब सब कुछ ठीक हो गया है.
कुपवाड़ा की उल्फत एजाज़ कहती हैं, "कश्मीर में महिला रोग विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी है. मैं इस कमी को दूर करना चाहती हूं और फिर अपने सूबे में गरीब लोगों की सेवा करूँगी. अभी गरीब लोगों को इलाज से वंचित होना पड़ता है. वे रोजी-रोटी में ही लगे रहते हैं. मैं उनका मुफ़्त इलाज करूँगी."
'मैं डॉक्टर बनना चाहती हूं'
कुलगाम की हुमयरा हमीद का भी सपना डॉक्टर बनने का है, ''मैं अपने समाज की सेवा करना चाहती हूं. बचपन से यही हसरत थी और माँ-बाप का ख्वाब भी यही है."
कश्मीर की ये बेटियां डॉक्टर बनाना चाहती हैं. टगमार्ग की मुबशरा कहती हैं, "मैं अपने ज्ञान का वादी में फैलाव करूँगी. अभी कश्मीर विकास के मार्ग पर है और हम उसे पूरा विकसित राज्य बनाएंगे."
कोटा में एक प्रमुख संस्थान में कश्मीर के 65 विद्यार्थी तैयारी कर रहे हैं. इस संस्थान के मनोज शर्मा बताते हैं कि शुरुआत में बहुत कम कश्मीरी विद्यार्थी कोटा आते थे. मगर पिछले तीन साल से इसमें बढ़ोत्तरी हो रही है.
सुखद भविष्य का सपना
वे बताते हैं कि उनके संस्थान ने स्कूलों में सेमीनार आयोजित किए और लोगों से कश्मीर जाकर मुलाकात करके एक सुखद भविष्य का खाका प्रस्तुत किया .
पहले उनकी इच्छा कश्मीर में ही अवसरों के इस्तेमाल की होती है, फिर उन्हें लगा कि अच्छी तालीम से भारत के बाकी भागों में भी उन्हें बेहतरीन अवसर मिल सकते हैं.
कोचिंग संस्थानों को उम्मीद है कि यह सिलसिला शुरू हुआ है तो दूर तलक जाएगा.
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