उत्तराखंड: पायलट दबाव में ड्यूटी कर रहे हैं?

क्या उत्तराखंड में राहत और बचाव में लगा हेलीकॉप्टर दुर्घनताग्रस्त न होता अगर खराब मौसम की चेतावनी की अनदेखी न की जाती?
क्या राहत और बचाव में लगी एजेंसियां भारी दबाव में काम कर रही हैं? क्या उत्तराखंड जैसे संवेदनशील इलाके में मौसम का चेतावनी तंत्र इतना सक्षम है कि इस तरह की स्थितियों का पूर्वानुमान दे सके?
हांलाकि अभी ये तय नहीं है कि ये हेलीकॉप्टर ख़राब <link type="page"><caption> मौसम</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/06/130624_uttarakhand_relief_sk.shtml" platform="highweb"/></link> का ही शिकार बना और वायुसेना ने दुर्घटना की जांच के आदेश भी दे दिये हैं लेकिन ये कुछ सवाल हैं जो सभी के मन में उठ रहे हैं.
पायलट का फ़ैसला
उत्तराखंड के मौसम विभाग के निदेशक आनन्द शर्मा कहते हैं कि, “हमारा काम है मौसम का पूर्वानुमान देना और हमने बता दिया था कि तेज़ बारिश ,घने बादल और धुंध की संभावना है.अब इस चेतावनी को ध्यान में रखते हुए हेलीकॉप्टर उड़ाने या नहीं उड़ाने का निर्णय करना पायलट का काम है.”
“जिन्होंने हमसे पूछा हमने उन्हें क्लीयरेंस कल भी नहीं दी थी और आज भी नहीं दी हांलाकि मौसम में कुछ सुधार जरूर है.लेकिन अभी भी घने बादल और धुंध हैं.”
गौर करने की बात है कि कल जब वायुसेना के एम-आई-17 के दुर्घटना ग्रस्त होने की खबर आई उसके कुछ देर पहले ही शाम के पांच बजे उत्तराखण्ड के मुख्य सचिव सुभाष कुमार अपनी प्रेस कॉंफ्रेंस में कह भी रहे थे कि मौसम काफी खराब रहा और एम-आई-17 उड़ान नहीं भर पाया और राहत और बचाव का जो भी काम हुआ वो छोटे हेलीकॉप्टर के जरिये.
लेकिन मुख्य सचिव की प्रेस कॉंफ्रेंस के खत्म होने के कुछ ही समय बाद हेलीकॉप्टर गिरने की खबर आ गई. जाहिर है दिन में उड़ान संभव नहीं हो पाई होगी और शाम को संभवत: जोखिम लेकर इस हेलीकॉप्टर ने उड़ान भरी होगी.
पायलट पर दबाव
राज्य के एक वरिष्ठ अधिकारी इस पर टिप्पणी करते हुए कहते हैं कि स्थितियां इतनी विकट हो जाती हैं कि कई बार पायलट मना भी करता है तो हमारा ही दबाव होता है.

कहा जा रहा है कि फंसे हुए यात्रियों को निकालने के लिये भारी दबाव है चाहे वो राजनैतिक दबाव हो ,जनता का या फिर मीडिया खास तौर पर टेलीविजन चैनलों का.
वायुसेना के सूत्रों के अनुसार पायलट दोगुनी ड्यूटी कर रहे हैं.उनपर इस मिशन को जल्दी से जल्दी पूरा करने का भी दबाव है.
उत्तराखंड में आई विभीषिका के बारे में भी ये भी कहा जा रहा है कि अगर पहले से पता चल जाता तो नुकसान रोका जा सकता था लेकिन पता चलता तो कैसे.
कठिन हालात
उत्तराखण्ड के पास मौसम की तत्काल चेतावनी देनेवाला एक भी राडार नहीं हैं जबकि उत्तराखण्ड का मौसम विभाग कई वर्षों से चार धाम और प्रमुख पर्यटक स्थलों पर मौसम केंद्र स्थापित करने और दो जगहों नैनीताल और मसूरी में राडार स्थापित करने के लिये राज्य सरकार के चक्कर काट रहा है लेकिन उसे जमीन तक नहीं मुहैया कराई गई है.
मौसम केंद्र के निदेशक आनन्द शर्मा कहते हैं, “हमारे पास प्रभावित इलाकों में मौसम केंद्र नहीं है.राडार नहीं है और न ही मौसम का हाल प्रभावित इलाकों में पंहुचाने के लिये कोई संचार नेटवर्क है.जबकि इस इलाके के जटिल भूगोल और यहां मौसम में अचानक आनेवाले बदलावों को समझना औऱ अनुमान लगाना बेहद जरूरी है.”
“आज हम उपग्रहों से मिल रही तस्वीरों से ही पूर्वानुमान दे पा रहे हैं और वो भी एक घंटे पहले की होती हैं जबकि इस वक्त हर पल मौसम की नब्ज का पता लगना चाहिये.”
उत्तराखण्ड में हुई असाधारण तबाही को देखते हुए एक तरह से यहां युद्ध जैसे हालात हैं जहां अनुकूल कुछ भी नहीं होता और राहत और बचाव में लगी एजेंसियों के सामने यही बड़ी चुनौती है कि जान जोखिम में डालकर वो कितनी जानों को बचा पाएं.
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