नाका जहाँ आदिवासी, माओवादी मान लिए जाते हैं

- Author, सलमान रावी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, कोंटा (छत्तीसगढ़) से
मध्य भारत में सुरक्षा बलों और <link type="page"><caption> माओवादी</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/06/130617_forced_labour_abducted_vr.shtml" platform="highweb"/></link> छापामारों के संघर्ष वाले इलाक़ों में लोगों को जश्न मनाने के मौक़े कम ही मिलते हैं.
क्योंकि यहाँ की ज़िंदगी पर संगीनों का साया है.
इस संघर्ष नें <link type="page"><caption> बस्तर</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/06/130608_chhattisgarh_naxal_violence_ban_vr.shtml" platform="highweb"/></link> के जंगलों में मानो नफ़रत का ज़हर घोल दिया है.
एक दूसरे पर बढ़ रहे अविश्वास की वजह से लोग खुली हवा में सांस लेने से भी महरूम हो गए हैं.
एक ओर जहाँ इस इलाक़े में रीति रिवाजों पर प्रतिबंधों की मार है वहीं दूसरी ओर यहाँ के <link type="page"><caption> आदिवासी</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/06/130607_salman_ravi_diary_darbha_ar.shtml" platform="highweb"/></link> इन्हीं परिस्थितियों में अपनी ख़ुशियाँ तलाश करने की कोशिश करते हैं.
बस्तर और इससे लगे ओडिशा, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र के इलाक़ों में बारिश से पहले <link type="page"><caption> 'बीज पनडूम'</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/05/130527_naxal_attack_villagers_impact_sy.shtml" platform="highweb"/></link> का अपना अलग ही मज़ा है.
'बीज पनडूम'
ये धान की रोपाई से पहले का अनुष्ठान है जो यहाँ के आदिवासियों को अपनी ज़िंदगी के कुछ पल 'बिंदास' होकर जीने का मौक़ा देता है.
महुआ की शराब, नाच गाना और भोज. कई दिनों तक यही सिलसिला रहता है.
'बीज पनडूम' की झलक जंगलों के कच्चे रास्तों, गाँव की चौपाल और साप्ताहिक हाट बाज़ारों में भी दिखाई पड़ती है.
इस जश्न के दौरान आदिवासी इलाक़ों से गुज़रते हुए आपको जनता के 'चेकपोस्ट' यानी जनता के नाके मिले तो चौंकिएगा मत.
ये न माओवादियों के चेक पोस्ट जैसे हैं और ना ही सुरक्षा बलों के चेक पोस्ट जैसे हैं, जहाँ आपको अपनी गाड़ियों से उतरने में डर लगे.
इन चौकियों पर तो स्वागत की तैयारी है. क्या नौजवान, क्या बच्चे और क्या औरतें.
सब नाचते और गाते हुए आपके इर्द गिर्द घूमने लगते हैं.
गोंडी भाषा में गाए जाने वाले इस पनडूम के गीत में यहाँ के आदिवासियों की संस्कृति की झलक देखी जा सकती है.
मुठभेड़

बस्तर की दहशत भरी सड़कों से गुज़रते हुए अचानक इस तरह का स्वागत दिल को काफ़ी सुकून पहुंचाता है.
सुकमा से कोंटा तक की सड़क पर से जब भी कोई गुज़रता है तो अपनी गाड़ियों के टेप भी बंद कर देता है.
कहीं सड़क कटी हुई है तो कहीं हमले की ख़बर. कहीं सुरक्षा बलों और माओवादियों के बीच संघर्ष की घटना. ये यहाँ की रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा है.
इस सड़क पर पहली बार गुज़रने वालों का कलेजा मुँह को आ जाता है जब उन्हें थोड़ी थोड़ी दूरी पर ख़बर मिलती है कि आगे मत जाएए, वहाँ माओवादी तलाशी ले रहे हैं या सुरक्षा बलों और माओवादियों के बीच मुठभेड़ चल रही हो.
मगर यहाँ के आदिवासियों के लिए ये रोज़मर्रा की बात है. गोलियाँ चल रहीं हों तो चला करें. तलाशियां तो इनकी ज़िंदगी का हिस्सा बन गईं हैं.
इन सब के बीच इन्होंने जीना सीख लिया है.
छोटी सी रक़म
इंजवरम में जिस जगह पर जनता का ये नाका लगा हुआ है. उससे कुछ ही दूरी पर पता चला कि माओवादियों ने किसी की हत्या कर दी.
मगर उत्सव में मगन इन आदिवासी औरतों और बच्चों की जमात को इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता.
पंक्तिबद्ध होकर ये गीत गुनगुनाते हुए नाचते-नाचते आपके इर्द गिर्द घुमते हैं.
फिर एक छोटी सी रक़म चंदे के रूप में लेकर ये गाड़ियों के सामने खड़े किए गए अवरोध को हटा देते हैं.
ये जमात वसूली करने वालों जैसी नहीं है. ये सिर्फ़ पांच या दस रूपए मिलने से ख़ुश हो जाते हैं.
बस्तर में प्रतिबंधों की ज़िंदगी के बीच ये इसी तरह अपनी खुशियाँ तलाश करते हैं.
मगर इस बार बीज पनडूम पर भी ग़म का साया है क्योंकि बीजापुर के बासागुडा और ऐदसमेटा में सुरक्षा बलों ने त्यौहार मना रहे आदिवासियों को नक्सली कहकर मार डाला.
'जन मिलिशिया'

ये आम धारणा ही बन गई है की अगर बीच जंगल से होकर गुज़रने वाली पगडंडियों पर आपको आदिवासी महिलाओं और बच्चों का समूह मिल जाता है तो ये मान लिया जाता है कि ये नक्सलियों के 'जन मिलिशिया' के सदस्य है या फिर 'संघम’ के.
मीडिया वालों का भी कुछ ऐसा ही रुख़ है.
हाल ही में बस्तर के दर्भा घाटी में हुई घटना के बाद मीडिया के लोगों का जमावड़ा लगा.
सबने अपनी अपनी तरह से इन इलाक़ों की व्याख्या की है.
कुछ पत्रकारों ने 'बीज पनडूम' मना रहे लोगों की चौकियों को माओवादियों के नाके बता डाला.
एक अख़बार ने तो दर्भा थाने के पास लगे भारत की कम्युनिस्ट पार्टी के शहीद स्मारक को भी माओवादियों का शहीद स्मारक क़रार दे दिया.
'बीज पनडूम' मना रहे आदिवासियों को मारने के बाद सुरक्षा बलों की ओर से माफ़ी माँगी गई लेकिन बरसात के मौसम में आदिवासी अंचल में मनाए जाने वाले इस त्यौहार का मज़ा अब किरकिरा हो चुका है.
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