उत्तराखंड बाढ़: 'पिता और सास की लाश दो दिन से पड़ी है'

- Author, नितिन श्रीवास्तव
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, ऋषिकेश से
राजस्थान के जयपुर जिले की बस्सी तहसील से ऋषिकेश पहुंचे बृज मोहन ने पिछले दो दिन से खाना नहीं खाया है.
वजह ये है कि उन्हें दो दिन पहले ही पता चल गया था कि उनके पिता और उनकी सास की मृत्यु केदारनाथ में अचानक आई बाढ़ में हो गई है.
<link type="page"><caption> 'कहा था केदारनाथ अभी मत जाओ' </caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/06/130619_uttarakhand_family_reaction_ns_pk.shtml" platform="highweb"/></link>
बृज मोहन ने बताया, "हम तो अपने पिता और सास का शव लेने भर आए हैं. <link type="page"><caption> केदारनाथ</caption><url href=" http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/06/130618_kedarnath_profile_sm.shtml " platform="highweb"/></link> की यात्रा से तो हम भर आए. मेरे पिता और माता के शव के आस पास करीब सात लोग पिछले दो दिन से मौजूद हैं, लेकिन अभी तक कोई मदद नहीं पहुँच सकी है."
बृज मोहन ने बताया कि उनके रिश्तेदार जिनमें उनकी माता और ससुर शामिल हैं. इन दो शवों की देख रेख कर रहे हैं हैं और इसी बात का इंतज़ार कर रहे हैं कि उनका दाह संस्कार हो सके.
<link type="page"><caption> ख़ौफ़ की ये छह कहानियाँ </caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/06/130619_uttarakhand_family_reaction_ns_pk.shtml" platform="highweb"/></link>
उनका कहना है," जो लोग हमारे पिता और सास के शव के आस पास हैं, उनकी इच्छा यही है कि मुखाग्नि मैं ही दूँ."
व्यथा

बृज मोहन की तरह ही तमाम ऐसे लोग हैं जो देहरादून और ऋषिकेश पहुँच रहे हैं सिर्फ अपने उन परिजनों का पता लगाने जिनके बारे में अभी तक कोई खोज खबर नहीं है.
सुभाष गर्ग भी पिछले दो दिनों से ऋषिकेश में डेरा जमाए हुए हैं.
सुभाष गर्ग एक मध्यम वर्गीय परिवार से हैं और उनके पास ऐसे संसाधन नहीं हैं की वे अपने परिजनों को गौरीकुंड से सुरक्षित लाने के लिए एक निजी हेलिकॉप्टर की सहायता ले सकें.
सुभाष ने बीबीसी को बताया, "हमारी व्यथा यही है कि जो 24 लोग अभी हमारे गाँव से चार धाम की यात्रा करने आए थे और किसी तरह पानी पीकर गुज़ारा कर रहे हैं वे हम तक पहुँच जाएँ."
बौखलाहट

केदारनाथ और गंगोत्री की यात्रा पर निकले हजारों श्रद्धालुओं को इस बात का तनिक भी अंदाजा नहीं था कि मौसम ने कुछ और ही सोच रखा होगा.
हालांकि <link type="page"><caption> उत्तराखंड</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/06/130620_uttrakhand_toll_ss.shtml" platform="highweb"/></link> की प्रदेश सरकार लगातार यही कह रही है कि 20 से 30 हज़ार फंसे हुए लोगों को अभी तक बचा लिया गया है.
लेकिन बड़ा सवाल यह है कि अगर मान लिया जाए कि अभी भी 40 हज़ार लोग रुद्रप्रयाग और जोशीमठ के इलाकों के आगे फंसे हुए हैं तो उन्हें खाने-पीने के लिए क्या चीज़ें मुहैया कराईं जा रहीं हैं.
इससे भी बड़ा सवाल ये है कि कई बच कर लौटने वाले जो किस्से बता रहे हैं वो दिल दहला देने वाले हैं.
कुछ का कहना है कि उन्होंने लोगों को अपने सामने मरते देखा है और कुछ का कहना है कि लोग जिस दशा में फंसे हैं, वहां से निकलना नामुमकिन सा है.
अभी तक को सरकार यही कह रही है कि 150 मौतें हुईं हैं लेकिन अगर ऊपर फंसे लोगों की मानें तो गाँव के गाँव उजाड़ गए हैं और सैंकड़ों अभी भी लापता है.
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