बिहार: मुस्लिम मतदाता और सियासी असमंजस

मुस्लिम मतदाता
इमेज कैप्शन, बिहार में मुस्लिम समुदाय का वोट बैंक भुनाने की कोशिशें शुरू हो चुकी हैं.
    • Author, मणिकांत ठाकुर
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, पटना

लालू ने किया नीतीश सरकार को उखाड़ फेंकने का आह्वानभारतीय जनता पार्टी (भाजपा) से जनता दल यूनाइटेड (जदयू) का रिश्ता टूटते ही यह सवाल सियासी चर्चा में ज़ोर-शोर से उभरा है कि अब बिहार के मुस्लिम मतदाताओं का रुझान किस तरफ़ ज़्यादा होगा.

यहाँ 'किस तरफ़' का ख़ास मतलब लालू प्रसाद यादव के राष्ट्रीय जनता दल (राजद), कांग्रेस और नीतीश कुमार की पार्टी जदयू से है. वैसे यहाँ लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) और वामपंथी दलों को भी मुस्लिम वोट मिलते रहे हैं.

बिहार में इस वोट बैंक के पुराने दावेदार राजद के मुक़ाबले जदयू को खड़ा करना चाह रहे नीतीश कुमार इस कोशिश में कितने सफल होंगे, इसका विश्लेषण होने लगा है.

नीतीश की मुश्किल

भाजपा में सबसे सशक्त हो चुके नरेन्द्र मोदी को कट्टर सांप्रदायिक चेहरा बताकर एनडीए से अलग हुए नीतीश कुमार अगर इसका राजनीतिक लाभ लेना चाहते हैं, तो यह स्वाभाविक है.

मगर इस बाबत उनकी सबसे बड़ी मुश्किल यही है कि कथित सांप्रदायिक चेहरों के साथ सत्ता राजनीति का सत्रह वर्षों तक मज़ा लेने के बाद उन्होंने यह दोस्ती तोड़ी है.

इसलिए उनका 'मुस्लिम प्रेम' हो सकता है तब तक संदिग्ध अवस्था में रहे, जब तक उस पर उठ रहे सवालों की धार समय और परिस्थितियों के साथ कुंद न पड़ जाए.

लालू प्रसाद की आसानी

नीतीश कुमार
इमेज कैप्शन, नीतीश कुमार पर सांप्रदायिक ताकतों का साथ देने के आरोप लगते रहे हैं.

इस मामले में लालू प्रसाद यादव की स्थिति नीतीश कुमार से बेहतर इसलिए मानी जा रही है क्योंकि वो लम्बे समय से आरएसएस-भाजपा के खिलाफ़ खुलकर गरजते-बरसते रहे हैं.

लालू प्रसाद भाजपा नेता और नरेन्द्र मोदी- दोनों पर घोर सांप्रदायिक होने का आरोप लगाते हैं, लेकिन नीतीश कुमार अभी भी आडवाणी के ख़िलाफ़ कुछ नहीं बोलते.

शायद इसी संदेह के सबब व्यापक मुस्लिम समाज में नीतीश कुमार के प्रति समर्थन की कोई ख़ास ललक नहीं दिख रही है. लेकिन हाँ, इसी समाज का एक तबक़ा ऐसा भी है, जो लालू की तुलना में नीतीश को कई मायने में बेहतर मानता है.

कांग्रेस का रुख तय करेगा सियासत?

जहाँ तक बिहार में आगे की चुनावी राजनीति के मद्देनज़र मुस्लिम मतों की दिशा समझने का सवाल है, तो यह कांग्रेस के भावी रुख़ पर काफ़ी हद तक निर्भर है.

कांग्रेस अगर लालू प्रसाद के राजद को और रामविलास पासवान के लोजपा को साथ लेकर लोकसभा चुनाव में उतरना चाहेगी, तो ज़ाहिर है कि मुस्लिम मतों का रुझान उस तरफ़ ज़्यादा होगा.

ठीक उसी तरह कांग्रेस अगर नए सहयोगी दल के रूप में नीतीश कुमार के जदयू से हाथ मिला लेगी, तो मुस्लिम मतों का आकर्षण उस ओर भी हो सकता है. लेकिन इसमें एक पेंच है.

लालू प्रसाद यादव
इमेज कैप्शन, लालू यादव भाजपा के ख़िलाफ़ खुलकर बोलते रहे हैं

अगर मुस्लिम समाज को लगा कि यादवों के एकमुश्त समर्थन वाले राजद उम्मीदवारों में भाजपा प्रत्याशियों को हराने की क्षमता अधिक है, तो वैसी सूरत में अधिकांश मुस्लिम मतों का रुझान जदयू के बजाय राजद की तरफ़ हो सकता है.

राज्य की मुस्लिम आबादी 17 प्रतिशत के आसपास है और यहाँ के 13 लोकसभा क्षेत्र ऐसे हैं, जहाँ मुसलमानों की आबादी 18 से 44 फ़ीसद के बीच है. किशनगंज लोकसभा क्षेत्र में तो 69 फ़ीसद मुसलमान हैं.

मतों का ध्रुवीकरण तेज़ होगा?

इन इलाक़ों में हिदू और मुस्लिम मतों का ध्रुवीकरण होता रहा है और इसका लाभ भाजपा को अधिक मिला है. यानी बिहार में भाजपा वहीं मज़बूत है, जहाँ मुस्लिम आबादी ज़्यादा है.

इस बार नरेन्द्र मोदी की बहुप्रचारित 'ख़ास छवि' के कारण यह ध्रुवीकरण और बढ़ने की चर्चा अभी से ज़ोर पकड़ चुकी है. भाजपाई ख़ेमे से प्रचार हो रहा है कि नरेन्द्र मोदी के रास्ते का 'नीतीश रूपी रोड़ा' हट चुका है.

पिछले लोकसभा चुनाव में किशनगंज की सीट पर भाजपा ने जदयू को चुनाव लड़ने दिया था और नतीजा यह हुआ कि वहां कांग्रेस जीती और जदयू हार गया. जबकि जदयू पर वहां मुस्लिम तुष्टिकरण के आरोप भी लगे थे.

धर्मनिरपेक्षता का 'रोड़ा'!

इसलिए माना यही जा रहा है कि मुस्लिम मतदाताओं को रिझाने में नीतीश कुमार को सिर्फ 'नरेन्द्र मोदी विरोध' या भाजपा से सम्बन्ध-विच्छेद का बहुत लाभ मिल पाना बेहद मुश्किल है.

लालू यादव भी अपने बिखर चुके मुस्लिम-यादव समीकरण को फिर से पुख्ता बनाने में जी-जान से जुट गए हैं. उनके इस आरोप का जवाब देना जदयू को कठिन लग रहा है कि गुजरात दंगे के समय और बाद में वर्षों तक नीतीश क्यों ख़ामोश रहे?

धर्मनिरपेक्षता का मुद्दा नीतीश कुमार की राजनीतिक यात्रा का ऐसा अटपटा अंग लगता है, जिसका फ़ायदा न उठा पाने की आशंका ख़ुद उनकी पार्टी में भी झलकती है.

कुछ राजनीतिक टीकाकार शायद इसीलिये यह तर्क देते हैं कि सेकुलर छवि के नाम पर गठबंधन तोडना, दरअसल नीतीश कुमार की प्रधानमंत्री पद पाने संबंधी छटपटाहट का परिणाम है.