आपको कब मिलेगा गूगल गुब्बारों का फ़ायदा?

न्यूज़ीलैंड में जब गूगल कंपनी ने एक नया प्रयोग करते हुए हवा में <link type="page"><caption> गुब्बारे </caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/science/2013/06/130616_google_balloons_ap.shtml" platform="highweb"/></link>छोड़े तो दुनिया के कई पिछड़े हुए इलाकों में खुशी की लहर दौड़ गई.
प्रयोग के तौर पर उड़ाए गए इन गुब्बारों में ऐसे उपकरण लगे हैं जो अपने दायरे में आने वाले इलाकों में 3 जी इंटरनेट सेवाएँ मुहैया करा सकते हैं.
हालांकि अभी ये सिर्फ प्रयोग है लेकिन इसे भारत जैसे बड़ी आबादी वाले देश में काफी उत्सुकता से देखा जा रहा है.
भारत में तेज़ी से फैलते इंटरनेट के जाल के बावजूद अब भी ज़्यादातर जनसंख्या इंटरनेट सुविधाओं से दूर है.
दिक्कतें
जानकारों का मानना है कि <link type="page"><caption> गूगल</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/science/2013/06/130607_google_security_sb.shtml" platform="highweb"/></link> के इस प्रयोग को भारत में सफल बनाने में अब भी पाँच से दस वर्ष लग सकते हैं.
सायबर मीडिया ग्रुप के प्रमुख संपादक प्रशांतो कुमार रॉय का मत है कि लंबे समय तक ये तकनीक भारतीयों के लिए सपने जैसी ही रहेगी.
उन्होंने कहा, "एक तो ये अभी प्रयोग ही है. दूसरा, ये सुविधा सस्ते तौर पर लोगों को आने वाले वर्षों में उपलब्ध कराना सबसे बड़ी चुनौती रहेगी. फिर, इस सुविधा को व्यावसायिक तौर पर लोगों तक पहुँचाने में पाँच से दस वर्ष लगेंगे".
उनके मुताबिक़ भारत में कई वर्षों तक लोगों की प्रमुख ज़रूरत इंटरनेट सुविधा तक पहुँचना ही रहने वाली है.
प्रोजेक्ट लून

गूगल का इरादा है कि न्यूजीलैंड में प्रयोग किए गए गुब्बारों की तरह ही आने वाले समय में हजारों गुब्बारे पृथ्वी से करीब 12 मील की ऊँचाई पर उड़ेंगे.
कंपनी की <link type="page"><caption> रणनीति </caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/06/130603_us_google_glass_congress_vd2.shtml" platform="highweb"/></link>यही है कि दुनिया में लगभग चार अरब ऐसे लोगों को इंटरनेट से जोड़ा जाए. इसका फ़ायदा फिलहाल लगभग दो अरब लोग उठाते हैं.
गूगल के अनुसार ये परीक्षण करीब 18 महीनों तक चले एक लंबे 'प्रोजेक्ट लून' के बाद किया गया है.
कंपनी का इरादा ये भी है कि इस तरह की इंटरनेट सेवाएँ होने से आपात काल की स्थिति में दूर-दराज़ फँसे लोगों को राहत पहुँचाने में भी मदद मिलेगी.
इजाज़त
जानकारों का मत ये भी है कि इस तरह के प्रयोग को रोज़मर्रा के इस्तेमाल में लाने के लिए तमाम देशों की अनुमति लेनी होगी.
साथ ही इस बात पर भी सवाल उठेंगे कि <link type="page"><caption> इंटरनेट</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/04/130412_google_data_afterdeath_vd.shtml" platform="highweb"/></link> मुहैया कराने वाले इन गुब्बारों के ज़रिए आंकड़ों के आदान-प्रदान की ज़िम्मेदारी कौन लेगा?
प्रशांतो कुमार रॉय को लगता है कि सरकारें और उनकी जासूसी संस्थाएं इस प्रयोग को बहुत दिलचस्पी से देख रही होंगी.
उन्होंने बताया, "खुद गूगल का 'प्रिज्म प्रोजेक्ट' इन दिनों ख़बरों में हैं और कहा जा रहा है कि गूगल मेल और तमाम सेवाओं पर सरकारें निगरानी रखती हैं. जब ये गुब्बारे एक देश से दूसरे देश जाने में सक्षम हैं तो ज़ाहिर है इनसे तमाम डाटा पर नज़र रखी जा सकेगी".
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