'पहले माओवादियों का डर, अब पुलिस का...'

घटनास्थल के आसपास के इलाकों से कथित तौर पर पलायन शुरू हो गया है
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    • Author, सलमान रावी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

नागरिक समाज ने आशंका व्यक्त की है कि छत्तीसगढ़ के दर्भा घाटी में हुई घटना के बाद उस इलाके में रहने वाले लोगों पर पुलिस बदले की करवाई कर सकती है.

सामाजिक संगठनों का कहना है जगदलपुर ज़िले की दर्भा घाटी में जिस जगह माओवादियों नें कांग्रेस के काफिले पर हमला किया था, उसके परिणामों के डर से आस-पास के गाँव से बड़े पैमाने पर पलायन शुरू हो चुका है.

सामजिक कार्यकर्ता बीके मनीष ने बीबीसी से करते हुए कहा, “सूचना मिली है कि घटनास्थल के आसपास के कई गाँव खाली हो चुके हैं.”

मनीष का आरोप है की घटनास्थल के पास लगभग 600 लोगों को तैनात किया गया है, जिनका अनुसंधान से कोई लेना-देना नहीं है.

उन्होंने कहा, “ये वो लोग हैं जिनका काम है स्थानीय लोगों को तब तक पीटना जब तक एनआईऐ की टीम घटनास्थल नहीं पहुँच जाती है.”

सोमवार को एनआईऐ की टीम ने <link type="page"><caption> घटनास्थल</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/05/130526_police_odisha_sm.shtml" platform="highweb"/></link> का दौर किया और घायलों से बातचीत भी की ताकि घटना के बारे में जानकारियाँ जुटाई जा सके.

इस बीच नक्सली हमले में मारे गए कांग्रेस के नेता महेंद्र कर्मा, नन्द कुमार पटेल और उनके पुत्र दिनेश पटेल का अंतिम संस्कार कर दिया गया.

दूसरी तरफ केंद्र ने 2,000 अतिरिक्त सुरक्षा बालों को छत्तीसगढ़ भेजने का फैसला किया है, ताकि राज्य सरकार द्वारा चलाए जा रहे अभियान को बल मिल सके.

वार्ता है समाधान?

विभिन्न दलों ने माओवादी हमले के पीछे राजनितिक कारण होने की आशंका व्यक्त की है, मगर नागरिक समाज इस कयास को नहीं मानता है.

मनीष कहते हैं, “जहाँ तक माओवादियों का सवाल है, उनकी सोच बहुत साफ है. एक तरफ वो लोग हैं, जो क्रांति के साथ हैं और दूसरी ओर वो लोग जो क्रांति के खिलाफ है. तो कांग्रेस, भाजपा, वामपंथी दल या सारे मुख्यधारा के दल क्रांति के खिलाफ है. माओवादी इन सब दलों को एक सामान मानते हैं. उन्होंने क्रांति के दुश्मनों पर हमला बोला है.”

मनीष को लगता है कि कांग्रेस के काफिले पर हमला करना माओवादियों के लिए आसान था क्योंकि उनको इतनी सुरक्षा नहीं दी गई थी जितनी मुख्यमंत्री रमण सिंह के काफिले को दी जाती है.

वहीं माओवादियों और सरकार के बीच मध्यस्त रह चुके सामजिक कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश का कहना है कि चाहे कितनी भी बड़ी घटना हो जाए, उसका समाधान वार्ता से ही होना चाहिए.

स्वामी अग्निवेश ने कहा, “इसका जवाब यदि और बड़ी हिंसा से सरकार देती है तो इससे ज्यादा आदिवासी मारे जाएगें. सरकार के पास ऐसा कोई तरीका नहीं है जिससे वो अलग से माओवादियों की पहचान कर सके. इससे पहले भी निर्दोष लोग मरते रहे हैं और अब फिर ऐसी ही संभावना नज़र आ रही है.”

मनीष और स्वामी अग्निवेश के अलावा नेशनल अलायंस फॉर पीपल्स मूवमेंट्स ने भी आशंका व्यक्त की है कि इस घटना की आड़ में सरकार पूरे इलाके को छावनी में बदल देगी और वहां रहने वाले आदिवासियों की ज़िन्दगी को और तकलीफदेह बना देगी.

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