2012: नक्सली हमलों में पिसे आम लोग

एलेक्स पॉल मेनन
इमेज कैप्शन, एलेक्स पॉल मेनन के अपहरण के पहले माओवादियों ने उड़ीसा में चंद विदेशी पर्यटकों को बंधक बना लिया था.

इसमें शक नहीं की वर्ष 2012 को नक्सली वारदातों के लिए जाना जाएगा.

मई माह में माओवादियों ने छत्तीसगढ़ के सुकमा में तैनात जिला अधिकारी एलेक्स पॉल मेनन का अपहरण कर लिया था. तेरह दिनों तक चले नाटकीय प्रकरण के बाद मेनन की रिहाई तो हुई मगर शर्तों के साथ.

माओवादियों और छत्तीसगढ़ की सरकार के बीच जो समझौता हुआ उसको लेकर आज भी बहस चल रही है.

मेनन की रिहाई के लिए दोनों के बीच क्या तय हुआ किसी को पता नहीं. लेकिन इतना ज़रूर है की कुछ न कुछ तो ज़रूर पक रहा है परदे के पीछे जो सिर्फ सरकार और माओवादियों के बीच मध्यस्ता करने वाले जानते हैं और सरकार.

कम वारदातें

सरकारी आंकड़ों के मुतबिक़ मेनन के अपहरण की घटना के बावजूद दूसरे वर्षों की तुलना में वर्ष 2012 में नक्सली वारदातों में काफी कमी आई है. चाहे वो छत्तीसगढ़ हो, झारखण्ड, ओडिशा, बिहार, महाराष्ट्र या फिर आंध्र प्रदेश.

साल 2011 में जहां नक्सली वारदातों में 611 लोग मारे गए थे, वहीं 2012 में 409 लोग मारे गए थे जिनमे 113 सुरक्षा बल के जवान और 296 आम नागरिक शामिल हैं. अगर साल 2010 पर नज़र डालें तो हताहत होने वालों की संख्या 1005 थी.

लेकिन ग़ौर करने वाली बात ये है कि सुरक्षा बलों और माओवादियों के बीच चल रहे संघर्ष में ज्यादा नुकसान आम लोगों का ही हुआ है. आम लोग दोनों पक्ष यानी सुरक्षाबल और नक्सलियों के निशाने पर बने रहते हैं.

जहां सुरक्षा बलों पर आरोप लगे हैं की उन्होंने नक्सली कहकर आम लोगों को निशाना बनाया है, वहीँ माओवादियों पर भी आरोप है की उन्होंने भी पुलिस का मुखबिर कहकर कई लोगों को मौत के घाट उतारा है.

माओवादी
इमेज कैप्शन, माओवादी अपने लोगों की ट्रेनिंग पर बहुत ध्यान देते हैं.

इस दौरान जहां छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले के बासागुडा में सुरक्षा बालों नें 22 ग्रामीणों को भून डाला, वहीँ माओवादियों नें भी कई क्रूर हत्याओं को अंजाम दिया है.

दोनों के अपने-अपने पक्ष

माओवादियों के प्रवक्ता मानस का कहना है कि आम गांव के लोग ही बदले की भावना से ज्यादा क्रूर होकर आक्रमण करते हैं. वो कहते हैं की जन मिलिशिया में शामिल लोग और संगठन में निचली पंक्ति के कैडरों को अंतर्राष्ट्रीय कानूनों के बारे में पता नहीं है.

दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में नक्सल विरोधी अभियान का नेतृत्व कर रहे पुलिस अधिकारी सुरजीत अत्रि इन आरोपों को सिरे से ख़ारिज करते हैं. वो कहते हैं कि नक्सल विरोधी अभियान में मानवाधिकारों का ध्यान रखा जाता है.

मगर मानवाधिकार संगठन इस संघर्ष में आम लोगों को हो रहे नुकसान से काफी चिंतित हैं. संगठनों का मानना है कि अब वक़्त आ चूका है जब सरकार और माओवादियों को बैठकर बात करनी चाहिए.

मानवाधिकार कार्यकर्ता शशि भूषण पाठक कहते हैं कि माओवादियों और सरकार, दोनों को आगे आकर हत्याओं को बंद करना चाहिए.

लेकिन सुरक्षा मामलों के जानकार मानते हैं की हिंसा में कमी सुरक्षा बलों द्वारा चलाये जा रहे नक्सल विरोधी अभियान की वजह से है. वो कहते हैं की कई नए इलाकों में सुरक्षा बालों नें अपनी पैठ बना ली है जिस कारण माओवादियों को पीछे हटना पड़ा है. मसलन झारखण्ड के सारंडा में चल रहे अभियान की वजह से माओवादियों को दुसरे ठिकानों की तलाश करनी पड़ी.

उसी तरह छत्तीसगढ़ और ओडिशा में भी सुरक्षा बलों की दबिश लगातार जारी है. बस्तर के अबूझमाड़ में भी लगातार अभियान चलाये जाने से माओवादियों को अपनी रणनीति में बदलाव करना पड़ा है.

बहरहाल नक्सल प्रभावित राज्यों में 2013 पर सबकी नज़रें टिकी हुई हैं क्योंकि इस वर्ष के अंत में छत्तीसगढ़ में विधान सभा के चुनाव हैं. इन इलाकों में चुनाव संपन्न कराना भी कोई जंग लड़ने से कम नहीं है.