गुजरात में खड़ी शक की एक दीवार

बेस्टबेकरी के ठीक सामने की अपनी झुग्गी के बाहर खड़े उपेंद्र भाई बिना हिचके-सकुचाए कहते हैं, ''नरेंद्र मोदी सिर्फ़ अमीरों का ही विकास करते हैं. ये अमीरों की सरकार है.''
उपेंद्र भाई फेरी लगाते हैं. मोहल्ले-मोहल्ले अपनी साइकिल पर रूई रखकर बेचते हैं. हाल ही में उनकी पत्नी की मृत्यु हो गई और घर की देखभाल करने के लिए बड़ी बेटी को स्कूल छोड़ना पड़ा.
एक बेटा और एक बेटी अब भी स्कूल जाते हैं.
उपेंद्र भाई कहते हैं जिन्हें 'पचीस हज़ार-पचास हज़ार रुपए' तनख्वाह मिलती है, नरेंद्र मोदी उनके लिए काम करते हैं.
(शायद उपेंद्र भाई को अंदाज़ा ही नहीं है कि कुछ लोग इससे ज़्यादा रुपया सिर्फ एक शाम की अय्याशी में ही उड़ा देते हैं और महीने में आठ-दस लाख रुपए कमाना अब कुछ लोगों के लिए मामूली बात हो गई है.)
जिस जगह पर खड़े होकर उपेंद्र भाई से बात कर रहा था, वहीं दस साल पहले हिंदुत्ववादी कार्यकर्ताओं की जुनूनी भीड़ ने एक बेकरी में आग लगा दी और वहाँ मौजूद लोगों को ज़िंदा जला डाला था.
बदलाव ने आखिर क्या बदला
बेकरी के मालिक सहित बारह मुसलमान और दो हिंदू कर्चमारियों को यहाँ मार डाला गया था. पुलिस ने केस इतना कच्चा बनाया कि अदालत से सभी अभियुक्त रिहा कर दिए गए. पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आलोचना होने और सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद मामले की फाइल फिर से खुली और अंत में चार लोगों को आजन्म कारावास की सज़ा दी गई.
तब से पिछले दस साल में नरेंद्र मोदी ने गुजरात को 'वायब्रेंट' गुजरात में बदल दिया. हर जगह चौड़ी-चिकनी सड़कें, शॉपिंग मॉल्स, विदेशी कारें, विदेशी कंपनियाँ, आलीशान बड़े-बड़े विज्ञापन और बिजली.
लेकिन बड़ौदा के हनुमान टीकरी मोहल्ले में कुछ नहीं बदला- न गलियाँ, न गंदगी, न ग़रीबी. और न ही यादें.
ख़ास तौर पर मारे गए बेकरी के मालिक की पत्नी हिना के लिए फिर भी कुछ नहीं बदला. पति के मार डाले जाने के बाद अब वो अपने दो बच्चों के साथ उसी घर में रहती है. बकरियाँ चरा कर अपना गुज़ारा करती है. नीचे के कमरे उन्होंने उत्तर प्रदेश से आए कुछ कामगार परिवारों को किराए पर दे दिए हैं. उनके सभी किराएदार हिंदू हैं.
उपेंद्र भाई कहते हैं, ''यहाँ हिंदू और मुसलमानों में कोई समस्या नहीं है. नरेंद्र मोदी ने ये करवाया क्योंकि उन्हें वोट चाहिए थे.'' लेकिन मोहल्ले के दूसरे लोग इस मामले में अपनी राय ज़ाहिर नहीं करते.
बेस्ट बेकरी पर सब खामोश

इस बार के गुजरात विधानसभा चुनाव में बेस्ट बेकरी का ज़िक्र कहीं नहीं है- न सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी की सभाओं में और न ही प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के जलसों में. स्थानीय काँग्रेसी उम्मीदवार भी 2002 के दंगों का ज़िक्र करने पर असहज हो जाते हैं.
इसकी वजह जानने के लिए मुझे राजनीति के किसी पंडित के पास जाने की ज़रूरत नहीं पड़ी. टैक्सी ड्राइवर शक्तिभाई ने एक वाक्य में जवाब दिया, ''इसकी वजह वहम है. शक.''
उन्होंने कहा कि ''दंगों के बाद से हिंदुओं को लगता है कि अगर काँग्रेस जीत गई तो मुसलमानों का राज आ जाएगा और मुसलमानों को लगता है कि अभी शांति है और अगर इनको (बीजेपी वालों को) छेड़ा गया तो फिर दंगे भड़केंगे.''
और यही नरेंद्र मोदी की सफलता है कि पिछले दस साल में राज्य में कहीं पर भी सांप्रदायिक दंगे नहीं हुए, लेकिन उनका साया हर जगह मौजूद रहता है.
मगर हिंदुओं और मुसलमानों के बीच खिंच गई शक की इस दीवार को चुनावी मौसम में ऐसे देखा जाता है जैसे कि ये पारदर्शी दीवार हो.
भारतीय जनता पार्टी और उसके नेता नरेंद्र मोदी तो इसके वजूद को स्वीकार नहीं ही करते, काँग्रेस को भी लगता है कि अगर समाज के इस गहरे बँटवारे का ज़िक्र होगा तो इसे मुसलमानों की तरफ़दारी माना जाएगा.
पर जिस तथ्य के बारे में खाता-पीता गुजराती समाज चर्चा भी नहीं करना चाहता, उसके बारे में फेरीवाले उपेंद्र या टैक्सीवाले शक्तिभाई बिना लाग लपेट बतियाते हैं.












