बाल ठाकरे कवरेज: इतना भी निरमा ना लगाओ

शिव सेना प्रमुख <link type="page"> <caption> बाल ठाकरे </caption> <url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2012/11/121115_bal_thakeray_intrv_arm.shtml" platform="highweb"/> </link>की मृत्यु को जिस तरह से भारतीय टीवी चैनलों पर दिखाया गया उसे मीडिया विश्लेषक शैलजा बाजपेई "कारपेट कवरेज" कहती हैं.
इंडियन एक्सप्रेस अख़बार में काम करने वाली शैलजा सवाल उठाती हैं कि जिस तरह सीएनएन आईबीएन के राजदीप सरदेसाई और टाइम्स नाउ के संपादक अर्णब गोस्वामी सहित हिन्दी चैनलों के संपादक ठाकरे की अंतिम यात्रा के कवरेज पर पूरा दिन टीवी पर खुद बिताते हैं, वह कितना जायज़ है.
शैलजा सवाल करती हैं, "क्या दुनिया में कोई और समाचार नहीं था बाल ठाकरे के सिवा, कोकराझाड़ की हिंसा का अभी तक कोई अंत नहीं हुआ है, संसद का एक महत्वपूर्ण सत्र शुरू होने वाला है, ग़ज़ा और इसराइल के बीच का तनाव चरम पर है."
इतना कवरेज
शैलजा, ठाकरे को दिए गए कवरेज पर टिपण्णी करते हुए आगे कहती हैं, "ठीक है <link type="page"> <caption> ठाकरे </caption> <url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2012/11/121115_bal_thackeray_shiv_sena_ketkar_adg.shtml" platform="highweb"/> </link>के विवादित पहलुओं पर टिप्पणियाँ थीं लेकिन क्या इतना ज़्यादा कवरेज और उनकी तारीफ़ों के पुल बांधना कि वो निजी जीवन में बहुत ही अच्छे और ईमानदार आदमी थे, यह क्या सही है?"
एक और मीडिया समीक्षक सुधीश पचौरी कहते हैं, "किसी आदमी के मरने के बाद उसकी बुराई मत करो यह सही है लेकिन उसके चरित्र को इतना निरमा मत लगाओ कि निरमा भी शर्मा जाए."
पचौरी टीवी चैनलों पर आगे सवाल उठाते हुए कहते हैं, "मनमोहन सिंह जैसे कम बोलने वाले आदमी को तो आप फांसी दे दो लेकिन जो उग्र है उसके लिए आप बधाई गाओ. यह कहाँ तक सही है."
किसका डर
पचौरी आगे कहते हैं कि टीवी चैनलों के कवरेज को देख कर लगा कि चैनल "डरे हुए हैं और वो यह मान कर कवरेज कर रहे हैं कि <link type="page"> <caption> शिव सैनिकों में उग्र </caption> <url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2012/11/121115_amitabh_attacked_aa.shtml" platform="highweb"/> </link>होने की क्षमता है. इसका अर्थ यह हुआ कि मनमोहन सिंह अगर कल से अपना डंडा तोड़ना और रूतबा दिखाना शुरू कर दें तो आप उनका भी प्रशस्ती गान शुरू कर देंगे."
सुधीश पचौरी का यह भी मानना है की इस कवरेज से एक और संदेश आता है कि मीडिया ऐसे लोगों को पसंद करता है जो कि तानाशाह हो और किसी की ना सुनता हो.
पचौरी कहते हैं, "मेरे मन में कोई दुराव नहीं है जो गुज़र गया उसको क्या बोलना, उससे तो इतिहासकार निबटेंगे लेकिन मीडिया तो बताए कि वो किससे डरा हुआ था किसे ख़ुश करने की कोशिश कर रहा था? बाल ठाकरे तो गुज़र गए क्या उनके समर्थकों को या बाज़ार को."
'गलत नज़रिया'
लेकिन हिंदी के एक प्रमुख समाचार चैनल आईबीएन-7 के प्रबंध संपादक आशुतोष आलोचकों और समीक्षकों की टिप्पणियों को सिरे से नकार देते हैं.
आशुतोष का कहना है, "टीवी चैनलों को गाली देने वाले सोचें कि क्या हमने इससे पहले कभी बाल ठाकरे के इस पक्ष पर चर्चा नहीं की कि वो विभाजन की राजनीति करते हैं, वो भारतीय की मूल अवधारणा के ख़िलाफ़ काम करते थे."
आशुतोष ज़ोर दे कर कहते हैं, "टीवी चैनलों से बाल ठाकरे और उनके शिव सैनिक इसलिए नाराज़ रहते थे क्योंकि वे उनके मन के माफ़िक़ कवरेज नहीं करते थे. लेकिन उनकी मृत्यु के दिन यह ठीक नहीं होता. तमाम विवादों के बावजूद यह कौन नकार देगा कि ठाकरे एक चर्चित नेता थे."
आशुतोष के अनुसार जो लोग टीवी चैनलों की निंदा कर रहे हैं वो टीवी के चरित्र को नहीं समझते और शायद समझना भी नहीं चाहते.












