नीलामी की नाकामी से बढ़ेंगे मोबाइल कॉल के दाम?

2 जी स्पेक्ट्रम की नीलामी पर बाज़ार की बेरुखी ने सबको हैरान किया है, खास तौर पर भारत सरकार को.
2जी स्पेक्ट्रम के आवंटन में एक लाख 76 हजार करोड़ का नुकसान करा चुकी भारत सरकार को उम्मीद थी कि नीलामी से सरकारी खजाने में कम से कम 40 हजार करोड़ रुपए आ पाएगा.
लेकिन नीलामी में दूरसंचार कंपनियों ने कोई खास दिलचस्पी नहीं दिखाई है.
पहले दिन की नीलामी के बाद सरकार की झोली में सिर्फ 9,200 करोड़ रुपए ही आए.
मुंबई से बीबीसी संवाददाता समीर हाशमी बता रहे हैं कि नीलामी के फ्लॉप होने के क्या कारण थे और इसका क्या असर हो सकता है.
2जी की नीलामी को कैसे देखते हैं?
बुधवार का दिन नीलामी का दूसरा दिन था. पहले दिन भारत सरकार को बहुत अच्छी प्रतिक्रिया नहीं मिली. केवल पांच कंपनियों ने ही भाग लिया. सरकार केवल 9,200 करोड़ रुपए ही इकट्ठा कर पाई है.
इसका कारण था कि पूरे देश के लिए लाइसेंस के लिए बेस प्राइस यानी आधार मूल्य 14,000 करोड़ था जो काफी ज़्यादा था. इसलिए पहले दिन अच्छी प्रतिक्रिया नहीं मिला थी.
कंपनियों को लगा कि यह काफी महंगा है अगर इसकी तुलना करें 2001 के दामों से या 3-जी की कीमत से.
अलग अलग शहरों में कैसी प्रतिक्रिया रही?
इस नीलामी की खास बात यह रही है कि बडे़ शहर या सर्कल जैसे दिल्ली, मुंबई, कर्नाटक और राजस्थान के लिए किसी ने आवेदन नहीं डाला.
बुधवार को छोटे शहरों के लिए नीलामी थी. इसमें बिहार के अलावा कहीं मांग नहीं दिखी. बिहार में मोबाइल फोन इस्तेमाल करने वाले लोगों की संख्या तेज़ी से बढ़ रही है. इसलिए यहां कुछ कंपनियां आगे आई थी.
बाकी शहरों और राज्यों में कोई ज्यादा उत्साह देखने को नहीं मिला.
सरकार के लिए कैसी रही नीलामी?
भारत सरकार के लिए बहुत बुरी खबर है क्योंकि जब नीलामी शुरु हुई तो वो 40,000 करोड़ रुपए की उम्मीद कर रही थी भारत सरकार लेकिन कहा जा रहा है कि 20,000 करोड़ भी नहीं कमा पाएगी
क्या इस नीलामी का आम लोगों पर कोई असर होगा?
इसका लोगों पर या उद्योग पर यह असर पडे़गा. क्योंकि 'बिडिंग प्राइस' काफी अधिक है.
दूरसंचार कंपनियां मोबाइल के रेट बढ़ा सकते हैं क्योंकि भारत में पहले ही दाम काफी कम हैं.












