नंबर दो होने के दर्द से आहत प्रणब मुखर्जी

प्रणब मुखर्जी

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    • Author, भारत भूषण, वरिष्ठ पत्रकार
    • पदनाम, बीबीसी हिन्दी डॉट कॉम के लिए

केंद्र में सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ सदस्य प्रणब मुखर्जी 78 वर्ष की उम्र में भी सेहतमंद हैं और भारतीय राजनीति के लिहाज से सेवानिवृत्ति की उम्र तक नहीं पहुंचे हैं.

शिवसेना और जनता दल यूनाइटेड जैसे वैचारिक रूप से अलग राजनीतिक दलों से राष्ट्रपति पद की अपनी दावेदारी के लिए समर्थन हासिल करके उन्होंने राजनीति के पटल पर अपनी दक्षता की नई इबारत लिखी है.

गठबंधन की राजनीति में इतनी निपुणता दिखाने वाले प्रणब मुखर्जी शायद इस बात से परेशान हो गए थे कि उन्हें यूपीए सरकार में दूसरे नंबर पर रखा जाता है.

वर्ष 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या होने के बाद प्रणब मुखर्जी भारत के अंतरिम प्रधानमंत्री बनते-बनते रह गए थे.

साल 2004 में प्रणब मुखर्जी को एक बार फिर तब निराश होना पड़ा जब कांग्रेस पार्टी ने मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बना दिया, वही मनमोहन सिंह जो एक जमाने में नौकरशाह की तरह उन्हें रिपोर्ट करते थे.

फिर वर्ष 2006 में प्रणब मुखर्जी ने उप-प्रधानमंत्री बनना चाहा, लेकिन उनकी इस मंशा पर पानी फिर गया.

अगले साल यानी वर्ष 2007 में उन्होंने राष्ट्रपति का चुनाव लड़ना चाहा, लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने उन्हें ऐसा करने से रोक दिया.

गाढ़ा अनुभव

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इमेज कैप्शन, सत्तारूढ़ पार्टी ने भले ही प्रणब मुखर्जी को संवैधानिक रबर-स्टाम्प बनाना चाहा हो लेकिन वे इस भूमिका में काम नहीं कर पाएंगे

प्रणब मुखर्जी ये बात भी भलीभांति समझते हैं कि कांग्रेस वर्ष 2014 में होने वाला आम चुनाव जीतने की स्थिति में होगी.

वो ये भी जानते हैं कि राहुल गांधी को आगे किया जाएगा या ऐसा भी हो सकता है कि मनमोहन सिंह को ही तीसरे कार्यकाल के लिए हरी झंडी मिल जाए.

प्रणब मुखर्जी एक महत्वाकांक्षी नेता हैं. उन्होंने अपनी सोच भी जाहिर कर दी थी. प्रणब मुखर्जी को नहीं लगता कि राष्ट्रपति भवन विफल नेताओं को 'ठिकाने लगाने' की जगह है.

प्रणब मुखर्जी को प्रशासन, संसद और राजनीति का गाढ़ा अनुभव है. उन्हें पूर्ववर्ती राष्ट्रपतियों से कहीं बेहतर राष्ट्रपति साबित होना चाहिए.

नीलम संजीव रेड्डी और आर वेंकटरमन को छोड़कर भारत के पूर्ववर्ती राष्ट्रपति गैर-राजनीतिक रहे हैं या ऐसे रहे हैं जो तत्कालीन प्रधानमंत्री के मुकाबले राजनीति में मामूली जगह रखते थे.

इस लिहाज से प्रणब मुखर्जी राष्ट्रपति भवन पहुंचने वाले सबसे अनुभवी नेता होंगे.

वित्त मंत्रालय का कामकाज लंबे समय तक संभालने वाले प्रणब मुखर्जी भलीभांति जानते हैं कि भारतीय नेताओं के कार्य उनके वित्तीय नियंत्रक तय करते हैं.

हम ये उम्मीद भी कर सकते हैं कि प्रणब मुखर्जी के पास जो भी फाइल भेजी जाएगी, वे उसकी गहन पड़ताल करेंगे क्योंकि उनकी छवि एक ऐसे व्यक्ति की है जो संविधान के अच्छे जानकार हैं.

उन्हें कानून की जानकारी है और कानूनों का ड्राफ्ट तैयार करने में भी उन्हें महारत हासिल है.

राजनीतिक पर्यवेक्षकों को बस इस बात की चिंता हो सकती है कि वर्ष 2014 के आम चुनावों के बाद प्रणब मुखर्जी किस तरह काम करेंगे.

क्या उनके काम करने के तरीके पर इस बात का असर दिखेगा कि वे वर्ष 1984 में अंतरिम प्रधानमंत्री बनते-बनते रह गए थे और आठ साल तक उन्हें ऐसे व्यक्ति के नीचे काम करना पड़ा जिनका वो बहुत ज्यादा सम्मान नहीं करते थे.

वैसे इतना तय है कि वर्ष 2014 के आम चुनाव में कांग्रेस यदि बहुमत के साथ सत्ता में आती है तो प्रणब मुखर्जी 'रूल-बुक' के हिसाब से चलेंगे.

'रबर-स्टाम्प नहीं'

प्रणब मुखर्जी
इमेज कैप्शन, प्रणब मुखर्जी वर्ष 2007 में भी राष्ट्रपति चुनाव लड़ना चाहते थे लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने उन्हें रोक दिया था

इस बात की संभावना नहीं है कि राष्ट्रपति बनने के बाद प्रणब मुखर्जी कांग्रेस के खिलाफ जाएंगे या राहुल गांधी का रास्ता रोकेंगे.

प्रणब मुखर्जी अपने राजनीतिक करियर के आखिरी पड़ाव पर हैं, ऐसे में वो कांग्रेस पार्टी के पहले परिवार के हितों के खिलाफ नहीं जाएंगे.

किसी को ये उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि प्रणब मुखर्जी लीक से हटकर भारतीय जनता पार्टी का कभी समर्थन करेंगे. वैचारिक तौर पर कांग्रेसी होने के नाते दक्षिणपंथी हिंदू संगठनों के प्रति उनके मन में पर्याप्त संदेह रहेगा.

हां, ये जरूर है कि प्रणब मुखर्जी के राष्ट्रपति बनने से राष्ट्रपति भवन पत्रकारों के लिए एक महत्वपूर्ण 'बीट' बन जाएगा.

प्रणब मुखर्जी यदि विरोधी-सत्ता केंद्र के तौर पर नहीं उभरे तो वे आकर्षण के विरोध-केंद्र के तौर पर उभरेंगे.

सरकार भी कोई फैसला लेने से पहले राष्ट्रपति के नजरिए को ध्यान में रखेगी. प्रणब मुखर्जी को साबित करना होगा कि वो एक निष्पक्ष राष्ट्रपति हैं, लेकिन सत्तारूढ राजनीतिक दल उन्हें अपने वश में रखना चाहेंगे.

सत्तारूढ़ पार्टी ने भले ही प्रणब मुखर्जी को संवैधानिक रबर-स्टाम्प बनाना चाहा हो लेकिन वे इस भूमिका में काम नहीं कर पाएंगे.