सोनिया चाहतीं तो प्रधानमंत्री बन सकती थी: कलाम

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पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने इस राजनीतिक मिथक को तो़ड़ दिया है कि वे सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री नियुक्त किए जाने के ख़िलाफ़ थे.
उन्होंने कहा है, "यदि सोनिया गांधी ने खुद प्रधानमंत्री बनने का दावा पेश किया होता तो मेरे पास उन्हें नियुक्त करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था."
कलाम ने माना है कि उनके पास व्यक्तियों, संस्थाओं और राजनीतिक दलों की ओर से कई ईमेल आए और चिट्ठियाँ आईं थीं जिसमें सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री का पद दिए जाने का विरोध किया गया था. लेकिन वे कहते हैं कि ये मांगें 'संवैधानिक रुप से स्वीकार किए जाने योग्य नहीं थीं'
पूर्व राष्ट्रपति का कहना है कि इन ईमेल और चिट्ठियों को उन्होंने बिना किसी टिप्पणी के सरकारी एजेंसियों के पास भिजवा दिया था.
'कोई विकल्प नहीं था'
एपीजे अब्दुल कलाम के संस्मरणों की किताब 'विंग्स ऑफ़ फ़ायर' का दूसरा खंड 'टर्निंग पॉइंट्स' जल्द ही प्रकाशित होने जा रहा है.
इस किताब के हवाले से मीडिया में कई विवरण प्रकाशित हुए हैं.
इसमें एक विवरण सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री न बनने का भी है.
उन्होंने अपनी किताब में लिखा है कि जब मई, 2004 में हुए चुनाव के नतीजों के बाद जब सोनिया गांधी उनसे मिलने आईं तो राष्ट्रपति भवन की ओर से उन्हें प्रधानमंत्री नियुक्त किए जाने को लेकर चिट्ठी तैयार कर रखी थी.
लेकिन उनका कहना है कि 18, मई, 2004 को जब सोनिया गांधी अपने साथ मनमोहन सिंह को लेकर पहुँचीं तो उन्हें आश्चर्य हुआ.
वे लिखते हैं, "उन्होंने (सोनिया गांधी ने) मुझे कई दलों के समर्थन के पत्र दिखाए. इस पर मैंने कहा कि ये स्वागत योग्य है और राष्ट्रपति उनकी सुविधा के समय पर शपथ ग्रहण करवाने के लिए तैयार है."
आगे उन्होंने लिखा है, "इसके बाद उन्होंने बताया कि वे मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री के पद पर मनोनीत करना चाहेंगीं. ये मेरे लिए आश्चर्य का विषय था और राष्ट्रपति भवन के सचिवालय को चिट्ठियाँ फिर से तैयार करनी पड़ीं."
ये घटनाक्रम उस समय का है जब नवगठित गठबंधन यूपीए का नेतृत्व कर रही कांग्रेस के संसदीय दल ने सोनिया गांधी को सर्वसम्मति से अपना नेता चुन लिया था.
यूपीए को बाहर से समर्थन दे रहे वाममोर्चे ने भी कह दिया था कि उन्हें सोनिया गांधी के नाम पर आपत्ति नहीं है.
इन विवरणों से पहले अक्सर ये चर्चा होती रही है कि सोनिया गांधी प्रधानमंत्री तो बनना चाहतीं थीं लेकिन राष्ट्रपति कलाम ने उनके विदेशी मूल का मुद्दा उठाकर या बोफ़ोर्स कांड में गांधी परिवार का नाम होने का हवाला देकर कह दिया था कि उन्हें संवैधानिक मशविरा करना होगा, इसके बाद सोनिया गांधी ने मनमोहन सिंह का नाम सुझाया था.
दक्षिणपंथी पार्टियाँ इस बात का ख़ूब प्रचार करती रही हैं और इसकी वजह से यह एक राजनीतिक मिथक भी बन गया था.
यूपीए सरकार से तनाव भरे रिश्ते
हॉर्पर कॉलिन्स की ओर से प्रकाशित किए जा रहे इन संस्मरणों में कलाम ने यूपीए सरकार के साथ अपने तनाव भरे रिश्तों का भी ज़िक्र किया है.
इसमें उन्होंने बिहार में राष्ट्रपति शासन लगाए जाने का मामला उठाया है और कहा है कि एक समय ऐसा आया था जब इस मामले को लेकर वे राष्ट्रपति के पद से इस्तीफ़ा देना चाहते थे.
उन्होंने लिखा है कि यह बात उन्होंने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को बता भी दी थी, लेकिन इस्तीफ़ा देना इसलिए टाल दिया क्योंकि प्रधानमंत्री ने कहा है कि अगर वे इस्तीफ़ा देते हैं तो परिस्थितियाँ ऐसी हैं कि सरकार गिर जाएगी.

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इसके अलावा कलाम ने 'लाभ का पद' वाले मामले का ज़िक्र भी किया है जब उन्होंने संसद की ओर से पारित विधेयक को पुनर्विचार के लिए संसद के दोनों सदनों को भेज दिया था.
ऐसा पहली बार हुआ था कि राष्ट्रपति ने किसी विधेयक को पुनर्विचार के लिए मंत्रिमंडल को न भेजकर सीधे संसद को भेजा था.
ये मामला सीधे सोनिया गांधी से जुड़ा हुआ था और आख़िर उन्हें संसद से इस्तीफ़ा देकर एक बाऱ फिर रायबरेली से चुनाव लड़ना पड़ा था.
एपीजे अब्दुल कलाम की इस किताब में इन विषयों की चर्चा एकाएक इसलिए प्रासंगिक लग रही है क्योंकि हाल ही में उन्होंने राष्ट्रपति पद की दौड़ से ख़ुद को अलग किया है.
यूपीए में शामिल तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी ने कलाम का नाम प्रस्तावित किया था और मुलायम सिंह यादव ने इसका समर्थन किया था.
पिछली बार उन्हें राष्ट्रपति बनाने वाले गठबंधन एनडीए का नेतृ्त्व करने वाली भाजपा और कई घटक दल उनके नाम से सहमत थे लेकिन सर्वसम्मति न बनता देख कलाम ने अपना नाम वापस ले लिया था.












