सरदारपुरा दंगा मामले में 31 को उम्र क़ैद

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- Author, अविनाश दत्त
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता,
गुजरात के मेहसाणा में एक विशेष अदालत ने गोधरा कांड के बाद सरदारपुरा में हुए सांप्रदायिक दंगों के मामले में 31 अभियुक्तों को दोषी ठहराया हैं. इन अभियुक्तों को अदालत ने उम्र कैद की दजा सुनाई है.
कुल मिला कर 73 अभियुक्त थे जिन में से 42 अभियुक्तों को रिहा कर दिया है.
इन अभियुक्तों को अदालत ने उम्र कैद की दजा सुनाई है. इस मामले में पिछले दो साल से सुनवाई चल रही थी. सभी अभियुक्तों पर हत्या, हत्या की कोशिश, लूटपाट और दंगे-फ़साद जैसे अभियोग लगाए गए थे.
सरदारपुरा का मामला उन मामलों में से एक है, जिसकी उच्चतम न्यायालय के निर्देश पर विशेष जाँच दल जाँच कर रही थी. उस दल का नेतृत्व सीबीआई के पूर्व निदेशक डॉक्टर आरके राघवन कर रहे थे.
पृष्ठभूमि
साल 2002 में मार्च की पहली तारीख़ को हिंदुओं मुसलमानों के बीच हुए सांप्रदायिक दंगों में 33 लोगों को ज़िंदा जला कर मार डाला गया था.
लोगों की एक भीड़ ने रात के वक़्त सरदारपुरा गाँव के एक निवासी इब्राहिम शेख़ के घर पर धावा बोला.
इब्राहिम शेख़ के घर पर हमले के वक़्त अगल-बगल के कुछ और मुसलमान परिवारों के लोगों ने शरण ले रखी थी. भीड़ ने मकान को घेर कर आग लगा दी जिसमें मकान के अंदर मौजूद 33 लोगों की मौत हो गई थी. इनमें 20 महिलाएँ भी थी.
हमले में पीड़ितों के वकीलों का आरोप था कि यह हमला पूर्व नियोजित सज़िश के साथ किया गया था.
यूँ तो यह घटना घटी 28 फ़रवरी 2002 और मार्च 1 2002 की दरमयानी रात को लेकिन शुरुवाती कारवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने इसकी जांच पर रोक लगा दी. पीड़ितों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का आरोप था कि राज्य सरकार इस घटना को अंजाम देने वालों को बचाने की कोशिश कर रही है.
2008 में सुप्रीम कोर्ट ने एक विशेष जांच दल गठित किया जिसने इस मामले की नए सिरे से जांच की और 2009 में यह मुकदमा शुरू हुआ जिसकी इस फैसले के रूप में आज परिणति हुई.
प्रतिक्रिया
सालों से गुजरात दंगों से जुड़े मामलों को जोर शोर से उठाने वाली सामजिक कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़ कहती हैं कि ये फ़ैसला एक मील का पत्थर साबित होगा.
तीस्ता कहती है,"गुजरात में आज भी राज्य सरकार दंगाइयों को बचाने की कोशिश में लगीं हैं, वहाँ इस तरह के फ़ैसले से यह संदेश तो जाएगा कि व्यवस्था इस तरह की हिंसा को बर्दाश्त नहीं करेगी."
तीस्ता इस फैसले से ख़ुश हैं लेकिन बहुत ख़ुश नहीं. उनकी नाराज़गी सुप्रीम कोर्ट की बनाई हुई और उसी के निरिक्षण में काम कर रही एसआईटी से है.
उनको लगता है कि एसआईटी के काम में ढिलाई रहती है. वो कहती है कि अगर कोर्ट की तीखी निगाह इस एसआईटी पर नहीं रहती तो फ़ैसला इतना अच्छा नहीं आता.
तीस्ता का मानना है कि सरदारपुरा के मामले में भी एसआईटी ने इस घटना के पहले रची गई साज़िश पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया. तीस्ता और उनके साथी इस फ़ैसले का अध्यन करने के बाद फिर से इसके खिलाफ़ अदालत जा सकते हैं.

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गोधरा की घटना
गुजरात में यह दंगे 27 फ़रवरी 2002 को गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस ट्रेन के यात्री डब्बे को आग लगाने के बाद भड़के थे. इस डब्बे में सवार ज़्यादातर लोग हिंदू थे और उनमे से कुछ अयोध्या से लौट रहे थे.
इस डब्बे में आग के लिए स्थानीय मुसलामानों को ज़िम्मेदार ठहराया गया और उसके बाद पूरे प्रदेश में धार्मिक दंगे फ़ैल गए जिनमे हज़ारों मुसलामानों की मौत हो गई.
राज्य के दंगा पीड़ितों और मानवाधिकार संगठनों के अनुसार इन दंगों में राज्य की पुलिस ने अधिकांश मामलों में मुसलामानों के ख़िलाफ़ ही काम किया.
राज्य के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी पर 2002 से ही आरोप लगते रहे हैं कि उनकी सरकार ने जानबूझ कर अपनी ज़िम्मेदारी का निर्वाह नहीं किया.












