न्यायमूर्ति दिनाकरन का इस्तीफ़ा

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भ्रष्टाचार और ग़लत आचरण के आरोपों का सामना कर रहे सिक्किम उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश पीडी दिनाकरन ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है.
दिनाकरन के ख़िलाफ़ भूमि पर कब्ज़ा करने और आय से अधिक संपत्ति के मामले हैं और शनिवार को राज्यसभा के सभापति द्वारा नियुक्त जांच समिति को महाभियोग की कार्रवाई करने के लिए सुनवाई करनी थी.
समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक दिनाकरन ने अपना इस्तीफा राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल को भेजा है.
राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल को भेजे गए दो पन्नों के त्यागपत्र में उन्होंने कहा है कि संवैधानिक पद पर आसीन होने के बावजूद न्यायाधीशों की जांच समिति ने उन्हें अपने बचाव के उचित अवसर से वंचित कर दिया.
दिनाकरन का कहना था कि वह मीडिया की सुनवाई के शिकार बने हैं.
इससे पहले न्यायमूर्ति दिनाकरन ने समिति की कार्यवाही को रोकने की अनेक कोशिशें की पर उन्हें सफलता नहीं मिली. यहाँ तक कि उच्चतम न्यायालय से भी उन्हें राहत नहीं मिली.
शीर्ष अदालत ने राज्यसभा की ओर से मनोनीत समिति की उनके ख़िलाफ़ जांच को अमान्य करार देने की याचिका को खारिज़ कर दिया था .
जाँच समिति
संसद में जस्टिस दिनाकरन के ख़िलाफ़ 12 मामले तय किए जाने के बाद हामिद अंसारी ने आरोपों की जाँच के लिए जनवरी 2010 में तीन सदस्यीय समिति का गठन किया था.
इसके प्रमुख उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति आफ़ताब आलम, कर्नाटक उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश जे एस खेहर और वरिष्ठ वकील पीपी राव शामिल हैं. यह दिनाकरन के ख़िलाफ़ महाभियोग चलाने की तरफ़ एक क़दम था.
दिनाकरन ने इस आधार पर कार्यवाही को चुनौती दी थी कि समिति ने अतिरिक्त आरोप तय किए.
दिनाकरन ने अपनी अपील में समिति के एक सदस्य पीपी राव पर पक्षपातपूर्ण होने का आरोप लगाया था. उनका कहना था कि समिति अपने कार्यक्षेत्र से बाहर जा रही है.
लेकिन देश की उच्चतम न्यायालय ने उनकी अपील ख़ारिज कर दी और याचिका पर ही सवाल उठाते हुए उनकी कड़ी निंदा की.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि लगता है कि न्यायाधीश दिनाकरन की याचिका अपने ख़िलाफ़ महाभियोग की प्रक्रिया को टालने का एक तरीक़ा है.
अदालत ने राज्य सभा के सभापति को निर्देश दिया था कि वो समिति में पीपी राव की जगह दूसरे सदस्य की नियुक्ति करें.
पृष्ठभूमि
दिनाकरन जब कर्नाटक उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश थे तो उच्चतम न्यायालय के कॉलेजियम ने शीर्ष अदालत के न्यायाधीश के तौर पर उनके नाम को मंजूरी दी थी.
लेकिन कुछ वकील संगठनों के भ्रष्टाचार, ज़मीन हथियाने, अघोषित संपत्ति और फ़ायदे के लिए फैसला देने के आरोपों के बाद दिनाकरन की पदोन्नति पर रोक लगा दी गई.
इससे पहले उनका तबादला मद्रास उच्च न्यायालय से कर्नाटक उच्च न्यायालय में कर दिया गया. आरोपों के बाद उन्हें सिक्किम उच्च न्यायालय भेज दिया गया. हालांकि उन्होंने बार बार आरोपों का खंडन किया था.
दिनाकरन ऐसे तीसरे न्यायाधीश हैं जिन पर महाभियोग चलाने की प्रक्रिया चल रही है.
1990 के दशक के मध्य में न्यायमूर्ति वी रामास्वामी के खिलाफ महाभियोग लोकसभा में गिर गया था, जबकि कोलकाता उच्च न्यायालय के न्यायाधीश सौमित्र सेन के खिलाफ राज्यसभा सभापति द्वारा नियुक्त तीन सदस्यीय समिति की जांच रिपोर्ट लंबित है.












