ये हैं गंगा के पहरेदार...

- Author, पारुल अग्रवाल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
गंगा को प्रदूषण मुक्त करने के मिशन में जुटे पटना के गुड्डू बाबा को कीचड़ और गंदगी, गंगा में बहती लाशों की गंध या सरकारी निकम्मापन कुछ भी डिगा नहीं पाया है. वो अकेले ही उस काम को करने में जुटे हैं जिसे बड़ी-बड़ी सरकारी योजनाएँ भी नहीं कर पाईं.
पेश है सिटीज़न रिपोर्टर गुड्डू बाबा की कहानी उनकी अपनी ज़बानी.
''मेरा नाम विकास चंद्र है और मैं पटना का रहने वाला हूं. लोग मुझे गुड्डू बाबा के नाम से जानते हैं.
बिहार की राजधानी पटना उन ख़ास शहरों में से एक है, जहां से होकर पवित्र गंगा गुजरती है, लेकिन लगातार बढ़ती गंदगी और कूड़े-कचरे ने पटना में गंगा का रूप ही बदल डाला है.
<link type="page"><caption> गुड्डू बाबा की रिपोर्ट सुनने के लिए क्लिक करें</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/multimedia/2011/07/110729_guddubaba_audio_pa.shtml" platform="highweb"/></link>
एक समय था जब नदी शहर के किनारे से होकर गुज़रती थी, लेकिन आज शहर से दूर बहती गंगा भी नाले में तब्दील होती दिख रही है.
यहाँ तक कि गंगा के पानी से लोगों को पेट और त्वचा की घातक बीमारियाँ होने लगी हैं.
गंगा की सफ़ाई से जुड़ी मेरी इस मुहिम की शुरुआत आज से कई साल पहले हुई. एक दिन मैंने एक ग़रीब आदमी को अपनी पत्नी के संस्कार के बाद गंगा की इसी कीचड़ में नहाते देखा.
मेरे पूछने पर उसने कहा कि गंगाजल के बिना पत्नी को मोक्ष नहीं मिलेगा और साफ़ पानी तक पहुंचने के लिए उसके पास नाव के पैसे नहीं.
उस आदमी की बात मेरे मन में घर कर गई. गंगा हम सब की ज़िंदगी की एक अहम हिस्सा है और एक नदी के रूप में भी इस संपदा को बचाना ज़रूरी है.
ऐसे में अपने कुछ साथियों के साथ मिलकर मैंने गंगा के एक-एक हिस्से को साफ़ करने का बीड़ा उठाया.
सुबह-सवेरे मैं अपने कुछ साथियों के साथ घाटों पर पहुंच जाता और हम नदी में उतर कर पानी में मौजूद गंदगी को बाहर निकालते.

प्रमोद कुमार जैसे कई लोग हमारे साथ ज़ुड़ते गए.
प्रमोद कहते हैं, ''हाथों में तसले-फावड़े लिए हम लोग घाटों पर जाते हैं और सफ़ाई का काम शुरू कर देते हैं. सब लोगों के बीच काम बांट दिया जाता है, कोई पानी में गिरे कूड़े-कचरे की सफ़ाई करता है, कोई फूल-पत्ती साफ़ करता है तो कोई घाटों पर झाड़ू लगाता है. लंबी सफेद दाढ़ी और उजले बालों वाले गुड्डू बाबा को देखकर शायद ही कोई ये अंदाज़ा लगा पाए कि वो पानी में बहते शवों और गंदगी को बाहर निकालने का काम करते हैं.''
गंगा की सफ़ाई के दौरान हमने देखा कि मंदिरों और घरों से निकलने वाले धार्मिक कचरे के अलावा गंदगी का एक बड़ा कारण था गंगा में बड़ी संख्या में बहाए जाने वाले पशुओं के शव, लावारिस लाशें और अंतिम क्रिया के अवशेष.
ये लाशें सड़ती हैं, गलती हैं और गंगा को प्रदूषित करती हैं. आरटीआई के ज़रिए मैंने जाना कि पशुओं के शवों को ठिकाने लगाने के लिए तो शहर भर में एक इंच भूमि भी उपलब्ध नहीं.
इस मुद्दे को लेकर मैंने पटना हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की. कुछ साल बाद हाई कोर्ट के आदेश से इस पर तो रोक लग गई, लेकिन लाशों का गंगा के किनारे जलना और उन्हें गंगा में बहाने का सिलसिला लगातार जारी था.
क़ानूनी लड़ाई में मेरे साथ रही अंजू बताती हैं, ''लकड़ी का दाम इतना बढ़ गया है कि ग़रीब आदमी कम से कम लकड़ी के साथ शव को जलाने के लिए मजबूर है. ऐसे में लकड़ी ख़त्म हो जाने पर अधजली लाश ही गंगा में बहा दी जाती है.''
हमारा मकसद गंगा को हर तरह के प्रदूषण से बचाना था और अपनी मुहिम के तहत हमने अधजली लाशों और पानी में तैरते शवों को भी ठिकाने लगाने का काम शुरू किया.
प्रमोद बताते हैं, ''जो लोग अंतिम संस्कार के लिए घाटों पर आते हैं वो शव के साथ चादरें, तकिए, गद्दे, पहनने के कपड़े भी गंगा में बहा देते हैं. आप सोचिए कि हर दिन जब ऐसा किया जाए तो नदी तो जाम हो जाएगी. तो ऐसे में हम इन चीज़ों को बाहर निकालते हैं और उन्हें सुखाकर एमसीडी के ट्रकों में लदवा देते हैं.''
इस तरह के प्रदूषण से निपटने के लिए पटना में छह विद्युत शवदाह गृह शुरू किए गए थे, लेकिन सरकारी निकम्मेपन के चलते वो सिर्फ काग़जों पर ही दर्ज होकर रह गए.
अपनी मुहिम के तहत कई सालों की दौड़-धूप के बाद मैं तीन शवदाह गृहों को दोबारा चालू कराने में कामयाब हुआ.
साथ ही कोर्ट के आदेश से अब गंगा में लाशें बहाना भी अब क़ानूनन जुर्म हो गया है.
ये आदेश देश भर में लागू है लेकिन व्यवस्था में ख़ामी के चलते ज़्यादातर जगहों में इस पर अमल नहीं हो पा रहा.
ये विडंबना ही है कि गंगा को बचाने के नाम पर सरकार की ओर से ज़मीनी प्रयास कम और दिखावटी प्रयास ज़्यादा हो रहे हैं.
गंगा किसी पहचान की मोहताज नहीं और मेरा मानना है कि गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित करने या बड़े-बड़े गंगा आरती कार्यक्रम आयोजित करने से इस नदी का भला नहीं हो सकता.
गंगा को बचाने के लिए ज़रूरी है कि सरकारी धन की बर्बादी रुके और योजनाओं पर सख़्ती से अमल हो.
मेरी ये कोशिश तो एक छोटा सा प्रयास है, लेकिन देशभर में लोग अगर इस तरह की मुहिम छेड़ दें तो गंगा फिर उतनी ही पवित्र हो सकती है.''
सिटीज़न रिपोर्ट के ज़रिए हम आपकी मुलाकात ऐसे लोगों से करवाते हैं जिन्होंने अपने जीवन में कुछ लीक से हटकर करने का जज़्बा जुटाया है. हमारी ये शृंखला आपको कैसी लगी हमें ज़रूर बताएं. साथ ही अगर आप भी गुड्डू बाबा की तरह अपने बदलाव की कहानी हमसे बांटना चाहते हैं तो हमसे संपर्क करें parul.agrawal@bbc.co.uk पर.












