नहीं है तो ख़रीद ली बहू

- Author, दिव्या आर्य
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
पिछले कई सालों में हरियाणा में बच्चियों की गिरती संख्या ने अब वहां बहुओं की कमी कर दी है.
लिंग जांच कर भ्रूण हत्या और कम उम्र में ठीक से पालन-पोषण नहीं किए जाने की वजह से पूरे राज्य में बच्चियों की संख्या कम होती गई है.
पिछले सालों में बेटों को प्राथमिकता देने की वजह से युवा लड़के-लड़कियों का अनुपात बिगड़ता गया है.
नतीजा ये कि 15 वर्ष से 44 वर्ष तक की आयु के पुरुषों में एक बड़ी संख्या अविवाहित है. एक गैर-सरकारी संस्था के मुताबिक़ पिछले 10 सालों में ये आंकड़ा 40 से 50 फीसदी तक बढ़ गया है.
ऐसे ही एक पुरुष, धनपत सिंह यादव से हम मिले हरियाणा के भिवानी ज़िले के नंदगांव में.
दूसरे राज्यों से बहुओं की ख़रीद
45 साल के धनपत की अपने ज़िले में शादी नहीं हो पा रही थी. इसलिए डेढ़ साल पहले वो असम गए और 22 साल की सुशीला से शादी कर यहां ले आए.
सुशीला हरियाणा की और बहुओं से अलग दिखती है, उसके कपड़े मानो ख़ुद को ढकने की बजाय, तन को दिखाने की मंशा से ओढ़े गए हों.
सुशीला का एक बेटा है. वो कुछ कहती नहीं लेकिन मुझे देखकर बहुत हंसती है.
पर शायद वो अपनी ज़िंदगी पर हंस रही है, जिस पर अब उसका कोई वश नहीं रहा.
मां नहीं है, पिता ने दोगुनी उम्र के पुरुष से शादी कर दी, अब अनजान देश के मुताबिक़ ख़ुद को बदल रही है.
धनपत बताते हैं, "वो अपने गांव में सिर्फ़ चावल और मछली खाती थी और लुंगी पहनती थी, लेकिन यहां आकर वो घाघरा-चोली, साड़ी पहनने लगी है, वो रोटी बनाती भी है और खाती भी है."
धनपत ये नहीं मानते कF वो सुशीला को ख़रीदकर लाए हैं बल्कि बताते हैं कि, सुशीला एक ग़रीब परिवार में रहती थी और यहां उसे बहुत आराम है.
अक्सर होता है यौन शोषण
दूसरे राज्यों से लाई गईं लड़कियों को सिर्फ़ अपनी जीवन शैली ही नहीं बदलनी पड़ती.
हरियाणा में काम करने वाले समाजसेवी बताते हैं कि लड़कियों की कमी होने की वजह से अक्सर एक बाहरी बहू से परिवार के कई लोग शारीरिक रिश्ता बनाने की कोशिश करते हैं.
जगमति सांगवान ऑल इंडिया डेमोक्रेटिक वुमेन्स एसोसिएशन की हरियाणा राज्य की अध्यक्ष हैं.
वो बताती हैं कि पिछले सालों में पूर्वी और उत्तर-पूर्वी राज्यों, मध्य प्रदेश और केरल से लड़कियों को ख़रीद कर या उनकी मर्ज़ी से लाने का चलन बढ़ा है.
जगमति बताती हैं, "ज़्यादातर ये लड़कियां ख़रीदी जाती हैं जिस वजह से समाज में उनकी इज़्ज़त कम होती है और उन्हें यौन शोषण के लिए उपलब्ध माना जाता है."
क़ैद से निकले की चाह
नंदगांव में रहनेवाले नरेश बताते हैं कि उनके गांव में 650 परिवार रहते हैं जिनमें कम से कम 50 परिवारों में बहू दूसरे राज्य से लाई गई है.

वो मुझे सोना खातून से मिलाते हैं. हर तरीक़े से सोना सुशीला जैसी है. वो 21 साल की है, उसके पति क़रीब 40 साल के. वो ख़ूब हंसती है और वैसे ही खुले तरीक़े से घाघरा-चोली पहनती हैं.
फर्क़ सिर्फ़ इतना कि उसने हिंदी सीख ली है और हमारी छोटी सी मुलाक़ात में उसने मुझे बताया, "मैं घर से बाहर निकलना चाहती हूं, कुछ करना चाहती हूँ."
हरियाणा के पुरुष प्रधान समाज में महिलाओं को खुलकर अपनी बात कहने की आज़ादी नहीं, फिर ये तो यहां के समाज का ऐसा हिस्सा हैं, जिनकी एक अलग वर्ग की तरह गिनती ही नहीं की गई.
अब कई समाजसेवियों ने राज्य सरकार को आवेदन लिख कहा है कि ऐसी लड़कियों की सामाजिक स्थिति का ब्यौरा लें और उनके अधिकारों को सुरक्षित करने के लिए कदम उठाएं.












