कॉर्बेट में तीसरे बाघ की मौत

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- Author, शालिनी जोशी
- पदनाम, देहरादून से, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
कॉर्बेट नेशनल पार्क में एक और युवा बाघ की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई है.कॉर्बेट वन क्षेत्र में एक महीने में ये तीसरे बाघ की मौत है ,जिससे वन विभाग में खलबली है और बाघों की सुरक्षा को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं .
रविवार को रामनगर के पश्चिमी तराई क्षेत्र में सात साल के इस बाघ का शव पाया गया. मौत की वजह हार्ट अटैक बताकर वन अधिकारी मामले की लीपापोती में लगे हुए हैं.
लेकिन बाघ के शव का पोस्टमॉर्टम करनेवाले डॉक्टरी सूत्रों के अनुसार मौत ज़हर देने के कारण हुई है और ज़हर के कारण ही उसे हार्ट अटैक हुआ .
इसके पहले एक बाघिन का शव भी इसी तरह संदिग्ध हालात में पाया गया था.ये बाघिन गर्भवती थी और उसके गर्भ में पाँच शावकों के भ्रूण पाए गए थे.बताया जाता है कि उसके पोस्टमॉर्टम में भी ज़हरीले मांस के सेवन का पता चला था.
बाघों की संदिग्ध मौत को इस इलाके में नरभक्षी बाघों के आतंक से जोड़कर देखा जा रहा है.पिछले कुछ महीनों से इलाके में कॉर्बेट नेशनल पार्क के रामनगर और कालागढ़ इलाके में आदमखोर का आतंक है और चार महिलाओं और एक युवक को इस आदमखोर बाघ ने निवाला बना लिया है.
बताया जाता है कि आदमखोर के हमलों से परेशान स्थानीय लोगों में गहरा आक्रोश है और इसी गुस्से में वो बाघों को मारने की कोशिश कर रहे हैं.
आमतौर पर बाघ जिस जानवर का शिकार करता है उसके मांस में यूरिया या सल्फर मिला देते हैं और बाघ जब उसे खाता है तो उसकी मौत हो जाती है.
कॉर्बेट नेशनल पार्क के पूर्व निदेशक और वर्तमान में इको टूरिज्म के निदेशक राजीव भतहरि कहते हैं, “1996 के पहले भी इस इलाके में बाघों को ज़हर देने की घटनाएं सामने आई थीं और अगर ऐसी घटनाएं दोबारा हो रही हैं तो ये बहुत चिंता की बात है.”
बाघों की सुरक्षा ख़तरे में
करीब 10 दिन पहले आदमखोर बाघ ने जब एक युवक का शिकार किया तो लोगों ने राष्ट्रीय राजमार्ग बंद करके काफी हंगामा किया जिसे देखते हुए वन विभाग के अधिकारियों ने आनन-फानन में एक बाघ मार गिराया और लोगों के सामने पेश कर दिया.
लेकिन इसपर भी विवाद है कि क्या ये आदमखोर था या महज़ लोगों को तुष्ट करने के लिए ऐसा किया गया.क्योंकि वन विभाग ने आदमखोर की पहचान बाघिन के तौर पर की थी और जिसे मारा वो बाघ था.
उसके बाद जिस तरीके से उसके शव को हाथी पर बिठाकर ,कान पकडकर घुमाया गया उससे भी विवाद खड़ा हो गया.
यहां तक कि केंद्रीय वन और पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने भी मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर बाघ मारने के तरीके पर गहरा रोष ज़ाहिर किया और मुख्यमंत्री को हिदायत दी कि वो कॉर्बेट का दौरा करके बाघों की सुरक्षा सुनिश्चित करें.
ख़राब प्रबंधन

उत्तराखंड के मुख्य वन्य जीव प्रतिपालक श्रीकांत चंदोला बार-बार ये कह रहे हैं कि मारा गया बाघ ही नरभक्षी था लेकिन उनकी बात पर लोगों को भरोसा नहीं क्योंकि इलाके में अब भी लोग आतंकित हैं .
दिन ढलने के पहले ही लोग घरों में कैद हो जाते हैं और महिलाओं ने ईंधन और चारे के लिए जंगल जाना छोड दिया है.बच्चों और पालतु पशुओं को इस डर से अकेला नहीं छोडा जाता कि बाघ न जाने कब हमला कर दे.
उधर बाघों की सुरक्षा के लिए एक विशेष टास्क बल का गठन करने की अधिसूचना भी जारी हो गई है लेकिन अभी तक इसे लागू नहीं किया जा सका है.
कॉर्बेट नेशनल पार्क में बाघों का घनत्व एशिया में सबसे ज़्यादा है और इस प्रोजेक्ट टाइगर की सबसे सफल परियोजना माना जाता है.यहां करीब 160 बाघ हैं.
संयोग से ऐसे विवादपूर्ण हालात तब बने हैं जब इस वर्ष कॉर्बेट नेशनल पार्क की 75वीं सालगिरह मनाई जा रही है और इसके लिए ताम-झाम से समारोह मनाने की योजनाएं बनाई जा रही हैं.
भारतीय वन्यजीव संस्थान में प्रोजेक्ट टाइगर से जडें वन्य जीव विशेषज्ञ वाई.बी.झाला कहते हैं, “बाघों को बचाने के लिये सबसे ज़रूरी है उनका हैबिटेट बचाया जाए.जंगल में आहार की कमी के कारण बाघ आबादी की ओर रूख कर रहे हैं.इसके लिए बफ़र ज़ोन बनाने और संरक्षित क्षेत्र का दायरा और बढाने की ज़रूरत है ताकि बाघों को उनके जंगल में ही हिरण और सांभर जैसे जानवरों का शिकार मिल सके.”
कॉर्बेट से जुडे एक वरिष्ठ वन अधिकारी ने नाम न लेने की शर्त पर कहा है कि दरअसल ये खराब प्रबंधन और अधिकारियों के मनमौजी रवैये और लापरवाही का नतीजा है कि बाघ भी मारे जा रहे हैं और लोग भी.












