प्रोजेक्ट चीताः कूनो में चीतों की मौत के लिये कौन है ज़िम्मेदार?

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- Author, शुरैह नियाज़ी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए, भोपाल से
70 साल पहले भारत से विलुप्त हुए चीतों को एक बार फिर से देश में बसाने की योजना संकट में दिखाई दे रही है.
बीते 25 मई को मध्य प्रदेश के कूनो नेशनल पार्क में मादा चीता ज्वाला के दो और शावकों की मौत हो गई.
इसी साल के मार्च महीने से अब तक कूनो पार्क में छह चीतों की मौत हो चुकी है. अब वहां चीतों की संख्या घटकर 17 रह गई है. शावक भी एक ही बचा है और उसकी हालत भी गंभीर बताई जा रही है.
25 मई को दो शावकों की मौत को राज्य और केंद्र सरकार की योजना के लिये झटके के तौर पर देखा जा रहा है. इस प्रोजेक्ट को काफ़ी ज़ोर शोर से शुरू किया गया था और इन्हें लाने के लिये एक लंबी प्रक्रिया अपनाई गई थी.
शुक्रवार को मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने प्रदेश के वरिष्ठ अधिकारियों और वन विभाग के आला अधिकारियों के साथ एक बैठक की थी.
मुख्यमंत्री ने अधिकारियों से कहा कि किसी भी क़िस्म की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जायेगी. उन्होंने कूनो में मॉनिटरिंग बढ़ाने के भी आदेश दिये.
कहा जा रहा है कि उस इलाक़े में पड़ रही गर्मी के कारण दो शावकों की मौत हुई है.
इससे पहले 23 मई को भी एक शावक की मौत हो गई थी. आधिकारियों का कहना है कि जिस दिन पहले शावक की मौत हुई थी उस दिन तापमान 47 डिग्री सेल्सियस था.

कूनो में कब क्या हुआ
- 17 सितंबर को कूनो नेशनल पार्क में नामीबिया से आठ चीते लाए गये
- दूसरी खेप में 12 चीतों को साउथ अफ्रीका से 18 फ़रवरी को लाया गया था
- नामीबिया की मादा चीता 'ज्वाला' ने कूनो पार्क में 24 मार्च को चार शावकों को जन्म दिया था
- नामीबिया से आयी चीता 'साशा' की मौत 27 मार्च को किडनी ख़राब होने की वजह से हुई
- 23 अप्रैल को चीता 'उदय' की मौत हुई, उसे साउथ अफ्रीका से लाया गया था
- नौ मई को तीसरी मौत चीता 'दक्षा' की हुई
- 23 मई को एक शावक की मौत हुई, 25 मई को दो और शावकों ने दम तोड़ दिया


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मध्य प्रदेश के मुख्य वन संरक्षक जेएस चौहान ने बीबीसी को बताया कि शावकों की मौत के बाद कूनो में उनकी तरफ़ से मॉनिटरिंग को और बढ़ाया जा रहा है.
उन्होंने कहा, "अभी तक का जो शेड्यूल है वो बहुत अच्छा है और फ़ुल प्रूफ़ है. लेकिन कुछ चीज़ें ऐसी होती हैं जो कंट्रोल के बाहर होती हैं. उसमें बहुत कुछ नहीं किया जा सकता है. स्थिति ऐसी थी कि मां और बच्चों को अलग नहीं किया जा सकता था."
चौहान ने आगे कहा, "अगर आप देखें तो हमारे मॉनिटरिंग प्रोटोकॉल बहुत ही अच्छे हैं. आधिकारियों, रिसर्च करने वालों और विदेशी कोलैबोरेट्रर के साथ कई दौर की बैठक के बाद इसे बनाया गया है."
उनका कहना था, "छोटे बच्चे चार हफ़्ते के हो गये और वो मां के साथ बाहर आने लगे. बाहर आकर वो गर्मी में एक्सपोज़ हो गये जिसकी वजह से यह स्थिति बनी. नहीं तो वे काफ़ी खेल रहे थे और अच्छे थे."
लेकिन विशेषज्ञ यह मानने को तैयार नहीं हैं. वाइल्ड लाइफ़ एक्सपर्ट अजय दुबे का कहना है कि इस पूरे मामले में ग्राउंड लेवल स्टाफ़ की ज़िम्मेदारी तय की जानी चाहिये.
उन्होंने कहा कि गर्मी की वजह से यह मामला हुआ कहना सही नहीं होगा.
अजय दुबे का कहना था, "सुप्रीम कोर्ट ने चीतों को भारत लाने की मंज़ूरी 2020 में दे दी थी. उसके बाद 2020, 21 और 22 में कई बार यहां के अधिकारी और स्टाफ़ ट्रेनिंग के लिये नामीबिया और साउथ अफ़्रीका गये और वहां से कई बार एक्सपर्ट यहां पर आये."
उनका आरोप है कि तीन सालों में चीते के नाम पर करोड़ों रुपये ख़र्च किये गये हैं. अजय दुबे पूछते हैं कि फिर किस तरह से कहा जा सकता है कि गर्मी की वजह से मौत हुई?
दुबे कहते हैं, "ज़रूरत इस बात की है कि ट्रेंड स्टाफ़ को इस काम में लगाया जाये ताकि आगे मौत न हो."
मादा चीता ज्वाला ने चार शावकों को 27 मार्च को कूनो में जन्म दिया था. केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने इसकी जानकारी देते हुए पूरे स्टाफ़ को बधाई दी थी. लेकिन यह ख़ुशी ज़्यादा दिन नहीं रह पायी.

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इससे पहले तीन चीतों की मौत
शावकों की मौत से पहले तीन बड़े चीतों की मौत भी हो चुकी है. सबसे पहले नामीबिया से आये एक चीता 'साशा' की मौत 27 मार्च को हुई थी.
उस समय वन विभाग का दावा था कि किडनी ख़राब हो जाने की वजह से चीता की मौत हुई थी.
उसके बाद दूसरी मौत 'उदय' की 23 अप्रैल को हुई थी. 'उदय' को साउथ अफ़्रीका से लाया गया था.
तीसरी मौत नौ मई को हुई थी. साउथ अफ़्रीका से लाई गई मादा चीता 'दक्षा' की मौत मेटिंग के दौरान हिंसा से हुई थी.
इस दौरान दो चीतों ने उसे गंभीर रूप से घायल कर दिया था जिसके बाद उसकी मौत हो गई.

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चीते कब आये
पिछले साल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन के मौक़े पर 17 सिंतबर को नामीबिया से आठ चीतों को भारत लाया गया था. मोदी ने ख़ुद उन्हें बाड़े में छोड़ा था.
उसके बाद दूसरी खेप में इस साल 18 फ़रवरी को दक्षिण अफ़्रीका से 12 चीते भारत लाए गए और उन्हें भी कूनो नेशनल पार्क में छोड़ा गया था.
देश में चीतों को फिर से बसाने के उद्देश्य से ही 'प्रोजेक्ट चीता' की शुरुआत की गई थी. देश में लगभग 70 साल पहले चीता विलुप्त हो गये थे.
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