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भिंडरांवाले के भतीजे जसबीर सिंह रोडे अमृतपाल की गिरफ़्तारी के बाद क्यों हैं चर्चा में
- Author, सरबजीत सिंह धालीवाल
- पदनाम, बीबीसी पंजाबी संवाददाता
खालिस्तान समर्थक और वारिस पंजाब दे संगठन के मुखिया अमृतपाल सिंह को रविवार को पंजाब के मोगा ज़िले के रोडे गांव स्थित गुरुद्वारा संत खालसा साहिब के सामने गिरफ्तार किया गया.
रोडे, दमदमी टकसाल के 14वें प्रमुख जरनैल सिंह भिंडरावाले का पैतृक गांव है.
1984 में दरबार साहिब पर ऑपरेशन ब्लू स्टार के दौरान जरनैल सिंह भिंडरावाला और उनके साथियों की मौत हो गयी थी.
अमृतपाल सिंह को जरनैल सिंह भिंडरावाले के गांव में बने गुरुद्वारे से गिरफ्तार किया गया था.
इसी गुरुद्वारे में पिछले साल सितंबर में 'वारिस पंजाब दे' संस्था के प्रधान के तौर पर अमृतपाल सिंह की ताजपोशी की गयी थी.
अमृतपाल की गिरफ़्तारी की ख़बर सबसे पहले अकाल तख़्त के पूर्व जत्थेदार और भिंडरावाले के भतीजे जसबीर सिंह रोडे ने मीडिया को दी.
जसबीर सिंह ने कहा कि शनिवार की रात पुलिस ने उन्हें बताया कि अमृतपाल सिंह रोडे गांव से अपनी गिरफ़्तारी देना चाहते हैं.
इसलिए वह रोडे गांव पहुंचे और उन्होंने अमृतपाल सिंह से भी मुलाक़ात की. कुछ दिन पहले वह अमृतपाल सिंह के परिवार से उनके गांव जल्लूपुर खेड़ा भी गए थे.
हालांकि जसबीर सिंह के मुताबिक़ इससे पहले अमृतपाल सिंह उनके संपर्क में नहीं थे.
कौन हैं जसबीर सिंह रोडे
जत्थेदार जसबीर सिंह रोडे, जरनैल सिंह भिंडरालिया के भतीजे है. वे आजकल अमृतपाल सिंह के मामले में गिरफ़्तार किए गए सिख युवकों के मामलों की पैरवी करने वाली समिति से प्रमुख हैं.
इस कमेटी का गठन श्री अकाल तख्त साहिब के जत्थेदार ज्ञानी हरप्रीत सिंह ने किया है.
जसबीर सिंह रोडे का जन्म 1954 में रोडे गांव में सरदार जागीर सिंह के यहाँ हुआ था. जसबीर सिंह रोडे के पांच भाई और एक बहन है.
खेतीबाड़ी में काम करने वाला यह परिवार धार्मिक है और दमदमी टकसाल का इस परिवार पर सबसे अधिक प्रभाव था.
दमदमी टकसाल के 12वें मुखिया ज्ञानी गुरबचन सिंह का संत भिंडरावाले के परिवार से बेहद क़रीबी रिश्ता था.
संत ज्ञानी करतार सिंह दमदमी टकसाल के 13वें प्रधान बने और 14वें प्रधान जरनैल सिंह भिंडरावाले बने.
कौन हैं अमृतपाल और अबतक क्या हुआ?
- अमृतपाल सिंह वारिस पंजाब संगठन के प्रमुख हैं, वह सिखों के लिए एक स्वायत्त राज्य (खालिस्तान) को अपना लक्ष्य बताते हैं.
- कई सालों तक दुबई में रहने के बाद अमृतपाल सिंह पिछले साल अगस्त 2022 में पंजाब लौटे और नशामुक्ति आंदोलन के नाम पर युवाओं को गोलबंद करना शुरू कर दिया.
- वे अपने तीखे भाषणों और अजनाला थाने के सामने हुई हिंसा के कारण विवादों में आए.
- पंजाब पुलिस ने 18 मार्च से अमृतपाल सिंह और उसके साथियों को पकड़ने के लिए एक अभियान शुरू किया गया था.
- अमृतपाल सिंह के खिलाफ एनएसए दर्ज कर उन्हें डिब्रूगढ़ जेल भेज दिया गया.
- इससे पहले पुलिस इस मामले में 9 लोगों को एनएसए के तहत डिब्रूगढ़ जेल में बंद कर चुकी है.
- मुख्यमंत्री भगवंत मान ने कहा है कि देश के कानून को तोड़ने की कोशिश करने वालों के ख़िलाफ़ हम कार्रवाई करेंगे, हम निर्दोष लोगों को परेशान नहीं करेंगे.
दुबई और इंग्लैंड से नाता
जसबीर सिंह रोडे की 1981 में शादी हुई और उसके बाद वे दुबई चले गए.
'अज्ज दी आवाज़' अख़बार के संपादक रहे गुरदीप सिंह बठिंडा ने कहा कि जसबीर सिंह रोडे ने अपने भाई हरदयाल सिंह के साथ मिलकर दुबई में बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन कंपनी बनाई जो आज भी चल रही है.
इसके बाद 1984 में ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद जसबीर सिंह इंग्लैंड चले गए. वहां से वे पाकिस्तान चले गए.
वहां से जब वे दोबारा इंग्लैंड जाने लगे तो उन्हें इंग्लैंड नहीं जाने दिया गया और फिलीपींस की राजधानी मनीला में उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया.
इसके बाद उन्हें भारत लाया गया, जहां वे 1988 तक जेल में रहे.
अकाल तख़्त के जत्थेदार बनने का सफर
पंजाब के वरिष्ठ पत्रकार जगतार सिंह कहते हैं कि 1986 में पृथकतावादी दलों ने अकाल तख़्त साहिब पर सरबत खालसा बुलाया था, जिसमें जसबीर सिंह रोडे को अकाल तख़्त साहिब का जत्थेदार घोषित किया गया था.
जगतार सिंह का कहना है कि मार्च 1988 में जसबीर सिंह रोडे जेल से रिहा हुए और शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी ने भी उन्हें श्री अकाल तख़्त साहिब के जत्थेदार के रूप में मान्यता दी.
क्यों बर्ख़ास्त हुए?
दरअसल मई 1988 में अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में मौजूद हथियारमंद चरमपंथियों को बाहर निकालने के लिए ऑपरेशन ब्लैक थंडर हुआ था.
पत्रकार जगतार सिंह बताते हैं कि कि सिख संगठनों ने इस ऑपरेशन के दौरान जसबीर सिंह रोडे की भूमिका को लेकर तरह-तरह के संदेह जताए.
इसकी जानकारी पूर्व आईबी अधिकारी मलॉय कृष्ण धर की किताब ब्लैंक थंडर, डार्क नाइट्स ऑफ़ टेरोरिज़्म इन पंजाब में भी मिलता है.
पुस्तक में जसबीर सिंह रोडे की भूमिका पर एक पूरा अध्याय है. किताब आने के बाद सिक्खों में जसबीर सिंह रोडे का विरोध काफी बढ़ गया था.
विरोध को देखते हुए, शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति ने 29 मई 1988 को जत्थेदार को पद से बर्खास्त कर दिया.
जगतार सिंह के मुताबिक़, इसके बाद पंथिक कमेटी ने जसबीर सिंह रोडे को सरकारी एजेंट बताया.
पुलिस ने एक बार फिर जसबीर सिंह रोडे को गिरफ़्तार कर लिया.
रिहाई के बाद जसबीर सिंह रोडे 10 दिनों तक मार्च करते हुए श्री दरबार साहिब पहुंचे.
उस वक्त बीएसएफ़ के बॉर्डर रेंज के आईजी चमन लाल ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर जसबीर सिंह रोडे का विरोध किया था.
राजनीतिक सरगर्मी
जसबीर सिंह रोडे राजनीतिक रूप से भी सक्रिय थे.
गुरदीप सिंह बठिंडा ने कहा कि 1989 के लोकसभा चुनाव के दौरान जसबीर सिंह रोडे ने अग्रणी भूमिका निभाई थी और यूनाइटेड अकाली दल ने उस समय 13 में से 11 सीटों पर जीत हासिल की थी.
जसबीर सिंह रोडे के राजनीतिक सफ़र के बारे में चंडीगढ़ के वरिष्ठ पत्रकार बलजीत सिंह बल्ली कहते हैं कि उन्होंने मुख्य रूप से शिरोमणि अकाली दल के बराबर एक पंथक पार्टी बनाने की कोशिश की लेकिन सफल नहीं हुए.
बल्ली के अनुसार, जसबीर सिंह रोडे कभी भी पंजाब में बड़े जनाधार वाले नेता नहीं रहे, वे लोगों के बीच केवल इसलिए लोकप्रिय हैं क्योंकि वे भिंडरावाले के रिश्तेदार हैं और उनका अपना कोई आधार नहीं है.
मीडिया में सरगर्मी
जसबीर सिंह रोडे ने 1990 में रणजीत सिंह नगर, जालंधर से 'अज्ज दी आवाज़' नामक दैनिक समाचार पत्र का प्रकाशन शुरू किया.
इस अख़बार के संपादक रह चुके गुरदीप सिंह बठिंडा का कहना है कि जसबीर सिंह रोडे की लिखी एक किताब में जरनैल सिंह भिंडरावाले के बारे में काफी अहम जानकारी दी गई है.
गुरदीप सिंह बठिंडा का कहना है कि वह 1990 से 2002 तक 'अज्ज दी आवाज़' के संपादक रहे.
बेटे के घर से हथियार बरामद
20 अगस्त 2021 को जसबीर सिंह रोडे फिर सुर्खियों में आए जब उनके बेटे गुरमुख सिंह बराड़ को जालंधर से हथियारों के साथ गिरफ़्तार किया गया.
उस वक़्त कपूरथला पुलिस ने प्रतिबंधित संगठन इंटरनेशनल सिख यूथ फ़ेडरेशन के दो कार्यकर्ताओं को गिरफ़्तार करने का दावा किया था.
माना जाता है कि जसबीर सिंह रोडे के भाई लखबीर सिंह रोडे पाकिस्तान में हैं.
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