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अमर्त्य सेन और शांति निकेतन के बीच ज़मीन को लेकर छिड़ा विवाद और फंसा पेच
- Author, प्रभाकर मणि तिवारी
- पदनाम, कोलकाता से बीबीसी हिंदी के लिए
पश्चिम बंगाल के बीरभूम ज़िले में शांति निकेतन स्थित विश्वभारती विश्वविद्यालय जमीन के एक छोटे-से टुकड़े के मालिकाना हक़ के मुद्दे पर बीते कई महीनों से लगातार सुर्खियों में है.
नोबेल पुरस्कार से सम्मानित कविगुरु रवींद्रनाथ टैगोर ने वर्ष 1921 में जब लाल माटी की धरती कहे जाने वाले बीरभूम जिले के बोलपुर या शांति निकेतन में इस विश्वविद्यालय की स्थापना की थी तो शायद उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि क़रीब सौ साल बाद विश्वविद्यालय के इसी परिसर में एक अन्य नोबेल पुरस्कार विजेता विवादों के केंद्र में होंगे.
क्या है पूरा मामला
दरअसल, विश्वभारती विश्वविद्यालय परिसर में अमर्त्य सेन के पास 1.38 एकड़ ज़मीन का एक प्लॉट है. उस पर उनका मकान भी बना है जिसका नाम है प्रतीची. विश्वविद्यालय प्रबंधन का कहना है कि दरअसल सेन के पास 1.25 एकड़ ज़मीन का ही मालिकाना हक़ है.
बाकी ज़मीन पर उनका क़ब्ज़ा अवैध है. इसलिए उनको यह ज़मीन वापस कर देनी चाहिए. लेकिन सेन का दावा है कि यह ज़मीन उनके पिता ने बाज़ार से ख़रीदी थी. इसलिए पिता की ज़मीन अब उनके नाम हस्तांतरित की जानी चाहिए.
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सेन को विवि की ओर से पत्र
विश्वभारती विश्वविद्यालय की ज़मीन पर अनधिकृत क़ब्ज़े को लेकर विश्वविद्यालय प्रशासन ने नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन को जनवरी में कई पत्र लिखे थे.
इसमें उनसे कहा गया था कि वे उस ज़मीन को विश्वविद्यालय को सौंप दें जिस पर अवैध रूप से उनका क़ब्ज़ा है.
यूं तो यह विवाद कई साल पुराना है. लेकिन अब इस साल जनवरी से इसमें अचानक तेज़ी आ गई.
विश्वविद्यालय की ओर से जनवरी के आख़िर में सेन को कई नोटिस भेजे जाने के बाद पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने शांति निकेतन का दौरा किया था.
ममता बनर्जी ने सेन से कहा था, "वे आपका अपमान कर रहे हैं. इसी वजह से मैं यहां आई हूं. सरकारी दस्तावेज़ों से साफ़ है कि यह ज़मीन आपकी है. विश्वविद्यालय प्रबंधन झूठ बोल रहा है."
इसके साथ ही उन्होंने सेन को दस्तावेज सौंपे थे और उनको जेड श्रेणी की सुरक्षा मुहैया कराने का भी एलान किया था.
मुख्यमंत्री ने विश्वविद्यालय प्रबंधन पर सेन का अपमान करने का आरोप लगाते हुए कहा था कि ज़रूरत पड़ने पर सरकार इस मामले में क़ानूनी कार्रवाई करेगी.
लेकिन विश्वभारती के वाइस-चांसलर बिद्युत चक्रबर्ती की दलील है कि मुख्यमंत्री की ओर से सेन को दिए गए काग़ज़ात अप्रासंगिक हैं.
वीसी का क्या है कहना?
बिद्युत चक्रबर्ती ने कहा था, "सेन ने वर्ष 2006 में पांच हज़ार रुपए प्रति बीघे की दर से 1.25 एकड़ ज़मीन का म्युटेशन कराया था. उन्होंने 1.38 एकड़ के लिए भुगतान नहीं किया था तो अब वे उस पर दावा कैसे कर सकते हैं?"
ममता के दौरे के कुछ दिनों बाद विश्वविद्यालय की मुख्य जनसंपर्क अधिकारी महुआ गांगुली ने एक बयान जारी कर मुख्यमंत्री पर 'कान से देखने' का आरोप लगाया था.
इसमें कहा गया था कि विश्वविद्यालय को मुख्यमंत्री के आशीर्वाद की ज़रूरत नहीं है क्योंकि वह प्रधानमंत्री के दिखाए रास्ते पर चल रहा है.
विश्वविद्यालय की ओर से जारी बयान में इस्तेमाल की गई भाषा की कई शिक्षाविदों ने निंदा की थी.
शिक्षाविद् पवित्र सरकार का कहना था, "यह विश्वविद्यालय की भाषा नहीं हो सकती. ममता महज़ ज़मीन के दस्तावेज़ सौंपने सेन के आवास पर गई थीं."
इस विवाद के बीच ही सेन बीती 23 फ़रवरी को अमेरिका चले गए थे. बीते महीने की 17 तारीख को सेन को भेजे पत्र में विश्वविद्यालय प्रबंधन ने उनसे यह बताने को कहा था कि उनके ख़िलाफ़ सार्वजनिक परिसर (अनधिकृत क़ब्ज़ाधारियों की बेदखली) अधिनियम, 1971 के तहत कार्रवाई क्यों न की जाए.
इसमें उनसे 24 मार्च तक जवाब देने और 29 मार्च को संबंधित कागज़ात के साथ सुनवाई के लिए आने को कहा गया था.
उसके बाद ही सेन ने अपने वकील गोराचंद चक्रवर्ती के ज़रिए पत्र भेज कर तीन महीने का समय मांगा था. लेकिन विश्वविद्यालय प्रबंधन ने उनको महज़ दस दिन का समय दिया. उसने कहा है कि इस मामले की सुनवाई 13 अप्रैल को शाम चार बजे होगी.
ज़मीन पर कब्ज़े का आरोप
विश्वविद्यालय प्रबंधन का दावा है कि वह ज़मीन रवींद्रनाथ टैगोर ने सेन को उपहार में दी थी. लेकिन सेन का दावा है कि उस पर उनका वैध मालिकाना हक़ है.
विश्वभारती प्रबंधन ने दिसंबर, 2020 में पहली बार कहा था कि शांति निकेतन स्थित परिसर में सेन ने ज़मीन पर अवैध क़ब्ज़ा कर रखा है.
विवाद बढ़ने पर ममता बनर्जी ने इस मामले में हस्तक्षेप किया और इस साल 30 जनवरी को सेन को ज़मीन से संबंधित काग़ज़ात सौंपे. उन्होंने सेन पर लगे आरोपों को भी निरधार क़रार दिया.
विश्वविद्यालय प्रबंधन ने 24 और 27 जनवरी को सेन को भेजे पत्रों में आरोप लगाया था कि उन्होंने ग्रीन ज़ोन में 0.13 एकड़ ज़मीन पर अवैध क़ब्ज़ा कर रखा है. उनसे अतिरिक्त ज़मीन लौटाने का अनुरोध किया गया था.
कविगुरु के समय कई प्रमुख हस्तियों को विश्वविद्यालय परिसर में 99 साल की लीज़ पर प्लॉट दिए गए थे. विश्वभारती की ओर से जारी एक बयान में दावा किया गया था कि दस्तावेज़ों से साफ़ है कि अमर्त्य सेन के पिता स्व. आशुतोष सेन को 1.25 एकड़ ज़मीन लीज़ पर दी गई थी, 1.38 एकड़ नहीं.
अमर्त्य सेन के नाना और संस्कृत के विद्वान क्षितिमोहन सेन ने रवींद्रनाथ टैगोर के साथ मिल कर विश्वभारती विश्वविद्यालय की स्थापना में अहम भूमिका निभाई थी.
टैगोर के बुलावे पर वे वर्ष 1908 में शांति निकेतन पहुंचे थे. क्षितिमोहन इस विश्वविद्यालय के दूसरे वाइस-चांसलर रहे जबकि अमर्त्य के पिता आशुतोष सेन यहां प्रोफ़ेसर रहे थे.
राजनीति तेज़
इस मुद्दे पर सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच राजनीति भी तेज होने लगी है.
तृणमूल कांग्रेस महासचिव अभिषेक बनर्जी ने बीती 28 जनवरी को कहा था, "विश्वभारती के वाइस-चांसलर का बयान दुर्भाग्यपूर्ण है. दरअसल, अमर्त्य सेन ने ममता की तारीफ़ और केंद्र की आर्थिक नीतियों की आलोचना की थी. भाजपा नेताओं को यह बात सहन नहीं हुई. इसी वजह से सेन को निशाना बनाया जा रहा है."
तृणमूल कांग्रेस प्रवक्ता कुणाल घोष कहते हैं, "अमर्त्य सेन बंगालियों और विश्व के गौरव हैं. उनको जान-बूझ कर बार-बार अपमानित किया जा रहा है. दरअसल जो लोग कहते हैं कि विश्वभारती रवींद्रनाथ के आदर्शों की बजाय प्रधानमंत्री के आदर्शों पर चलती है, वे निश्चित तौर पर भाजपा की राह के यात्री हैं."
ममता ने लगाए भवगाकरण के आरोप
ख़ुद ममता बनर्जी भी विश्वविद्यालय के भगवाकरण की कोशिशों का आरोप लगाती रही हैं.
इस बीच, ज़मीन विवाद में अमर्त्य सेन का नाम लिए बिना वाइस-चांसलर बिद्युत चक्रबर्ती ने उन पर निशाना साधा है.
बीते रविवार को विश्वविद्यालय की वेबसाइट पर उन्होंने आरोप लगाया है कि कुछ लोग विश्वविद्यालय को बदनाम करना चाहते हैं. उन्होंने विश्वभारती की तुलना सोने का अंडे देने वाली मुर्गी से भी की है.
वीसी का कहना है कि इस विवाद में मुख्यमंत्री के हस्तक्षेप ने इस मामले को और जटिल बना दिया है.
सेन के वकील गोराचंद चक्रवर्ती ने इस पर टिप्पणी करते हुए कहा है कि चूंकि इसमें वीसी ने सीधे सेन का नाम नहीं लिया है, इसलिए इस पर कोई टिप्पणी करना उचित नहीं होगा.
वह कहते हैं, "प्रबंधन ने इतना कम समय दिया है कि इसमें सेन का यहां काग़ज़ात के साथ आना शायद ही संभव हो."
इस विवाद पर विश्वविद्यालय के एक प्रवक्ता ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बीबीसी से कहा, "हमने अपना रुख़ साफ़ कर दिया है. अब अगली तारीख़ के बाद ही प्रबंधन इस मुद्दे पर कोई टिप्पणी करेगा."
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