बिहार शरीफ़ हिंसा: 17वीं सदी की शाही मस्जिद में उस दिन क्या हुआ

इमाम मोहम्मद शहाबुद्दीन
इमेज कैप्शन, इमाम मोहम्मद शहाबुद्दीन.
    • Author, फ़ैसल मोहम्मद अली
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, बिहार शरीफ़

बिहार शरीफ़ का मदरसा अज़ीज़िया इन दिनों ख़बरों में है, मगर उससे सटी तक़रीबन चार सौ साल पुरानी शाही मस्जिद में शुक्रवार शाम दंगाईयों ने जो किया वो वहां मौजूद लोगों के मुताबिक़ "मौत को क़रीब से देखने जैसा था."

परिसर में लगाई गई आग और उससे फैले धुंए में साल भर की बच्ची समेत तीन बच्चे फंस गए, "जिन्हें अगर छत से कूदकर धुएं से भरे कमरे से न निकाला गया होता तो उनका दम घुट जाता."

इन दिनों रमज़ान का महीना चल रहा है और मुसलमान रोज़ा रखते हैं. उस दिन रोज़ा खोलने यानी इफ़्तार में लगभग आधा घंटा था, मस्जिद के इमाम मोहम्मद शहाबुद्दीन, बारहवीं क्लास के छात्र नायाब कामरान और क़रीब 20-22 दूसरे लोग मस्जिद के भीतर फंस गए थे.

सामने सड़क से कुछ ही देर पहले रामनवमी शोभा यात्रा की भारी भीड़ गुज़री थी. शोभा यात्रा में मौजूद कई लोग तलवारें लहरा रहे थे और नारे लगा रहे थे. उनको देखते हुए वहां तैनात पुलिसकर्मियों ने शाही मस्जिद के मेन गेट में ताला लगा दिया.

इमाम मोहम्मद शहाबुद्दीन कहते हैं, "इफ़्तार का सामान सेहन (मुख्य इबादतगाह के बाहर का आंगन) में लगाया ही जा रहा था कि उपद्रवियों की एक भीड़ ने मेन गेट का ताला तोड़ दिया, ऊपर बनी मीनार पर चढ़कर उसे तोड़ा-फोड़ा और भगवा झंडा लगा दिया, उनमें से चंद मियांओं को मारने का नारा भी लगा रहे थे."

मस्जिद

हिंसा के दिन मस्जिद में क्या हुआ?

मुग़ल बादशाह शाहजहां (1592-1666) के गवर्नर सैफ़ ख़ान के दौर मे 17वीं सदी में तैयार पांच गुंबदों वाली मस्जिद निहायत ही ख़ूबसूरत है और कलाकृति के नमूने के तौर पर किताबों में इसका ज़िक्र है.

पास के मदरसा अज़ीज़िया की तरफ़ से ग़रीबों और मुसाफ़िरों के लिए इफ़्तार का ख़ास इंतज़ाम होता है. उस दिन भी लोग रोज़ा खोलने के लिए उस शाही मस्जिद में जमा थे.

मस्जिद परिसर में ज़बरदस्ती घुसी भीड़ ने वहां खड़ी मोटरसाइकिलों, दूसरे वाहनों, दुकानों और गोदाम में आग लगाना शुरू कर दिया, वज़ुख़ाने के बाहर लगे शीशे तोड़ दिए. उन्होंने मस्जिद के भीतरी दरवाज़े को भी तोड़ने की कोशिश की लेकिन उसमें वो कामयाब नहीं हो पाए.

परिसर में मौजूद जिन दुकानों, गोदामों को आग लगाई गई उसी के पहले तल्ले पर इमाम शहाबुद्दीन का परिवार रहता है. पेट्रोल बमों के इस्तेमाल से परिसर को जलाया गया था. आग तेज़ होने के बाद ऊपर बने कमरों में भी धुंआ भरने लगा.

''ऊपर के तल्ले में मेरी सबसे छोटी साल भर और दो साल की बच्चियां और बच्चा चीख़ रहे थे", कहते-कहते इमाम मोहम्मद शहाबुद्दीन फफक पड़ते हैं.

वो कहते हैं, "शायद उनका दम घुट रहा था, अगर दो-तीन लोग जान पर खेलकर छत से कूदकर बच्चियों को न निकालते तो सबका दम घुट जाता."

बारहवीं क्लास के छात्र नायाब कामरान हर दिन की तरह उस दिन भी इफ़्तार लेकर मस्जिद में मौजूद थे लेकिन उनके मुताबिक़ वो दिन "रोंगटे खड़ा करने वाला" बन गया था.

कामरान

'रोंगटे खड़ा करने वाला मंज़र'

कामरान कहते हैं, "वो मंज़र रोंगटे खड़ा कर देने वाला था, उस दिन हमने मौत को क़रीब से देखा, लगा था कि अब शायद दस मिनट के मेहमान हैं."

उनके अनुसार, अंदर घुसे लोग गालियां दे रहे थे, उन्होंने पानी लाने वाली गाड़ी को भी जला दिया जिसकी वजह से रोज़ेदारों को पानी तक मिलना मुश्किल हो गया.

हंगामा दो घंटे से भी अधिक जारी रहा और वहां मौजूद लोगों के मुताबिक़, वार्ड पार्षद दिलीप कुमार यादव के वहां पहुंचने के बाद ही शांत हुआ.

मस्जिद परिसर के बिल्कुल बाहर इकलौते मुस्लिम नायाब कामरान के परिवार के घर को भी भीड़ फूंकने की तैयारी में थी लेकिन मोहल्ले के कुछ हिंदू ही दीवार बनकर खड़े हो गए.

नायाब कहते हैं, "कुछ लोगों ने उस दिन इंसानियत की मिसाल भी क़ायम की."

घटना के लिए लोग पुलिस प्रशासन को ज़िम्मेदार बता रहे हैं.

इमाम साहब कहते हैं, "जुमे का दिन, रमज़ान का महीना और शहर में हफ़्तों से जारी शोभा यात्रा की तैयारी के बीच पुलिस प्रशासन से कहीं न कहीं हालात को समझने में चूक हो गई."

उनके अनुसार, शोभा यात्रा के रूट में आनेवाली इस मुस्जिद की सुरक्षा के लिए चार-पांच पुलिसकर्मियों का एक दल लाठियां लिए मौजूद था, लेकिन "जब भीड़ घुसी तो उसके सामने वो कुछ करने की स्थिति में भी नहीं थे."

मस्जिद

क्या कहना है प्रशासन का?

मस्जिद में फंसे लोगों को पटना से अतिरिक्त फ़ोर्स के पहुंचने के बाद पुलिस की निगरानी में वहां से निकालकर मुस्लिम बहुल कांटापुरा मोहल्ला पहुंचाया गया.

इमाम शहाबुद्दीन के मुताबिक़, जब वो सहरी करने के बाद सुबह की नमाज़ के लिए मस्जिद पहुंचे तो गेट पर जेनरेटर से चलनेवाली बड़ी वेपर लाईट लगी थी, जले वाहनों को हटा दिया गया था, परिसर की सफ़ाई कर दी गई थी. वो कहते हैं, "प्रशासन ने एक तरह से लीपा-पोती में कोई कसर नहीं छोड़ी."

हालांकि प्रशासन इन आरोपों को ख़ारिज करता है. नालंदा के एसपी अशोक मिश्र ने कहा कि लोगों तो तुरंत रेस्क्यू किया गया.

एसपी अशोक मिश्र कहते हैं, "मस्जिद में जो भी प्रयास किया गया नुक़सान पहुंचाने का उसे हमने तुरंत रेस्क्यू किया. मस्जिद को आप लोगों ने देखा होगा वहां सामान्य स्थिति हो गई है."

"काम चल रहा है (मरम्मत). मदरसे में भी जो भी प्रयास किया गया है, हम लोग कोशिश कर रहे हैं कि उसे जल्दी अपने स्वरूप में लाया जाए. जो भी हुआ है वह दुर्भाग्यपूर्ण है."

उनके मुताबिक़, "भीड़ बहुत ज़्यादा थी दो तीन हज़ार लोग थे. हम लोग भी वहां मौजूद थे आगे की तरफ़. भीड़ को सोग़रा कॉलेज की तरफ़ जाने से रोका गया, अगर वहां चले जाते तो माहौल और बिगड़ सकता था."

वो कहते हैं, "भीड़ में इस तरफ़ आने में समय लगा, इसी दौरान कुछ असामाजिक तत्वों ने यहां पर (मस्जिद) घटना को अंजाम दिया."

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