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यूपी की 'गौरैया वालों की हवेली', जहां बसा है हज़ारों चिड़ियों का कुनबा
- Author, शहबाज़ अनवर
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए, बिजनौर (उत्तर प्रदेश) से
शाम के वक़्त हज़ारों गौरैयों के शोर के कारण बिजनौर के शेख़ जमाल की हवेली के भीतर एक अलग ही रौनक दिखती है.
छत पर कभी चिड़ियों का झुंड एक से दूसरी तरफ उड़ता दिखता है तो कभी मुंडेरों पर गौरैयों का झुंड बैठा होता है.
जैसे-जैसे रात गहराती है, आहते में लगे पेड़ों और बेलों पर गौरैयों की संख्या बढ़ती जाती है. कुछ देर बाद ये सो जाती हैं और हवेली में गहरी खामोशी छा जाती है.
उत्तर प्रदेश के बिजनौर ज़िले के स्योहारा इलाक़े में है, मोहल्ला शेख़ान. इसी मोहल्ले की एक संकरी गली में नवाब शेख़ जमाल और उनके भाइयों की एक हवेली है.
हवेली के भीतर प्रवेश करते ही आहते में कुछ पेड़ दिखते हैं. यही पेड़ इन तमाम चिड़ियों का बसेरा बन गए हैं.
कुछ क़दम चलने पर हम बैठक में पहुंचते हैं. यहां दीवारों पर लटकते हुए कुछ गमले लगाए गए हैं जिन्हें घोंसलों की शक्ल दी गई है.
आंगन में कई क़िस्मों की बेलें, एक आम और एक अमरूद का पेड़ है. गौरैयों ने इन पेड़ों को अपना मुख्य ठिकाना बनाया हुआ है. यहीं, दूसरे छोर पर शेख़ जमाल के परिवार के रहने के लिए पांच कमरे और एक रसोई है.
कई पीढ़ियों से यहां रह रही हैं गौरैया
शेख़ जमाल ने बीबीसी हिंदी से कहा, "मेरे दादा के समय से घर में गौरैया पाली जा रही हैं. पहले हमारे घर के कमरों की छतों में कड़ियां हुआ करती थीं. इन कड़ियों के भीतर ही गौरैया अपना घोंसला बनाया करती थीं. बाद में घर के कुछ हिस्सों में छत डाली गई. वहां से चिड़ियों के घोंसले हटाने पड़े. फिर हमने पेड़ों में और दूसरी जगहों पर घोंसले बना दिए."
शेख़ जमाल कहते हैं कि घर का एक बड़ा हिस्सा पुराने ही ढंग से बना हुआ है क्योंकि उसे तोड़कर बनाया तो गौरैया के यहां से चले जाने का डर है.
'सभी लोग एक साथ बाहर नहीं जाते'
शेख़ जमाल बताते हैं, "पिछले 40 सालों से मैं गौरैयों की देखभाल कर रहा हूं. दिन के तीनों वक़्त उनके लिए दाना-पानी की व्यवस्था करता हूं. शादी-ब्याह में भी घर के सभी लोग बाहर नहीं जाते बल्कि एक व्यक्ति को उनकी देखभाल के लिए घर पर रुकना होता है."
"मैं चाहता हूं कि इनकी संख्या बढ़ाने के लिए सरकार पार्कों में उनके लिए सुविधाएं बनाए. इसकी ज़िम्मेदारी पक्षी प्रेमियों को दी जानी चाहिए."
'शाम को पंखे बंद, बत्ती भी नहीं जलाते'
शेख़ जमाल के परिवार में शाम को घर के भीतर कम ही रोशनी होती है. उनका कहना है कि ये समय चिड़ियों के सोने का है, रोशनी से उन्हें परेशानी होगी.
उनके छोटे बेटे शेख़ फ़राज़ कहते हैं, "हमारे घर में शाम के समय आंगन में रोशनी नहीं रखी जाती. घर में पंखे तो हैं, लेकिन उन्हें चलाया नहीं जाता. इससे एक बार एक चिड़िया कट गई थी, तभी से पंखे बंद करवा दिए गए हैं."
"कमरों के भीतर जो पंखे हैं उन्हें दरवाज़ा बंद करने के बाद चलाया जाता है. छत पर भी किसी को जाने की इजाज़त नहीं है, क्योंकि वहां चिड़िया बैठी होती हैं."
शेख़ फराज़ ये भी बताते हैं कि गौरैया के अलावा अन्य परिंदे भी घर की छत पर आकर दाना चुगते हैं.
'मेहमान नहीं ठहर पाते'
शेख़ जमाल बताते हैं कि उनके घर में मेहमान ठहर नहीं पाते.
वह कहते हैं, "हमारे घर में सवेरे चार बजे से ही चिड़ियों का चहचहाना शुरू हो जाता है. ये आवाज़ इतनी तेज़ होती है कि लोग सो नहीं पाते. इसीलिए मेहमान हमारे घर पर नहीं रुकते. हमें तो इनकी आदत हो गई है."
क्या कहते हैं मोहल्ले के लोगों
बीबीसी ने शेख़ जमाल के घर में पल रही गौरैयों को लेकर मोहल्ले के लोगों से भी बातचीत की.
यहां रहने वाले नसीम अहमद कहते हैं, "हम शेख़ जमाल के पिता शेख़ अकबर साहब के ज़माने से इन गौरैयों को देखते आ रहे हैं. मैं अक्सर शाम के समय इनकी आवाज़ सुनने के लिए यहां आता हूं."
रईस अहमद, शेख जमाल के दोस्त हैं. वो बताते हैं, "शहर में कहीं और गौरैया मिले या न मिले, यहां ज़रूर मिलेगी. गर्मी के दिनों में यहां हमें पंखों के बग़ैर ही बैठना पड़ता है ताकि चिड़ियों को नुक़सान न पहुंचे."
शहर के ही अंकुर जैन कहते हैं, "शहर में शेख़ जमाल को कौन नहीं जानता. वो एक नेक काम कर रहे हैं, हमें भी उनसे सीख लेनी चाहिए."
शेख़ जमाल कहते हैं कि चिड़ियों के लिए वो दाना तो स्टोर कर के रखते ही हैं, साथ ही बिस्कुट का चूरा, बाजरा, कनकी, गेहूं भी रखते हैं. साथ ही घर का बचा खाना, रोटी, चावल और दाल भी चिड़ियों को खिलाते हैं. चिड़ियों के पानी के लिए कईं जगहों पर मिट्टी के बर्तन रखे जाते हैं.
शेख़ जमाल के बेटे शेख़ फराज़ पढ़ाई पूरी करने के बाद अपने पिता के साथ ही खेती-बाड़ी करते हैं और गौरैयों की देखभाल करते हैं.
उनकी शादी एक साल पहले ही हुई है. उनकी पत्नी वानिया सिद्दीक़ी कहती हैं, "शादी से पहले भी वो मुझे व्हाट्सऐप पर गौरैयों के वीडियो भेजा करते थे. मुझे भी इन्हें पालने का दिल हुआ. अब मैंने अपने मायके और पास-पड़ोस में भी गौरैया पालनी शुरू कर दी हैं."
'मैंने देखा है, वहाँ हज़ारों गौरैया हैं'
बिजनौर में धामपुर तहसील में रैनी वन क्षेत्र के रेंजर गोविंद राम कहते हैं कि विश्व गौरैया दिवस के मौक़े पर वो शेख़ जमाल के घर गए थे.
वह कहते हैं, "मैंने वहां हज़ारों की संख्या में गौरैया देखीं. अन्य प्रजातियों की भी कई चिड़िया वहां रहती हैं. हमने लोगों को जागरूक किया था कि वो भी विलुप्त प्रजाति में शामिल इन गौरैयों की संख्या बढ़ाने में मदद करें."
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