क्या ज्ञानी ज़ैल सिंह राजीव गांधी को करना चाहते थे बर्ख़ास्त?- विवेचना

    • Author, रेहान फ़ज़ल
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

जब इंदिरा गांधी 1977 में चुनाव हारीं तो क़रीब-क़रीब उनके सभी साथियों ने उनका साथ छोड़ दिया.

पंजाब के मुख्यमंत्री रहे ज्ञानी ज़ैल सिंह उन कुछ लोगों में से थे जो इस दौरान उनके 12 वेलिंग्टन क्रेसेंट निवास पर लगातार उनसे मिलने आते रहे.

हालांकि इमरजेंसी के दौरान संजय गांधी के साथ उनके संबंध गर्मजोशी भरे नहीं थे. संजय को शिकायत थी कि ज़ैल सिंह ने पंजाब में विपक्ष के साथ जिसमें अकाली दल का नेतृत्व भी था, पर्याप्त सख़्ती नहीं दिखाई थी. जेल में उन्हें अच्छा खाना और समुचित मेडिकल सुविधाएं उपलब्ध कराई गई थीं.

हाल ही में प्रकाशित पुस्तक 'द इंडियन प्रेसिडेंट एन इनसाइडर्स अकाउंट ऑफ़ द ज़ैल सिंह इयर्स' लिखने वाले केसी सिंह जो कि ज़ैल सिंह के उप सचिव रह चुके हैं.

वो बताते हैं, "इंदिरा गांधी के मुश्किल के दिनों में उनके प्रति निष्ठा के कारण चुनाव से पहले ही संजय गांधी ने मन बना लिया था कि अगर कांग्रेस की सरकार बनती है तो ज्ञानी ज़ैल सिंह को उसमें एक महत्वपूर्ण पद दिया जाएगा."

"जब चुनाव जीतने के बाद ज्ञानी ज़ैल सिंह गृह मंत्री बने तो संजय गांधी ने उनसे कहा कि शाह कमीशन मे जिन अधिकारियों ने उनके ख़िलाफ़ गवाही दी है, उन्हें तुरंत निलंबित कर दिया जाए."

"ज़ैल सिंह ने अपने स्पेशल असिस्टेंट आईएस बिंद्रा को संजय गांधी के पास भेज कर उन्हें समझाया कि इस कदम से अनावश्यक विवाद पैदा हो जाएगा. क्यों न उन अफसरों को उनके पदों पर बरकरार रखा जाए और उनसे ही कहा जाए कि वो अपनी की गई ग़लती ख़ुद ही सुधारें. संजय गांधी इसके लिए तुरंत राज़ी हो गए."

राष्ट्रपति पद संभालते ही ज्ञानी ज़ैल सिंह से इस्तीफ़ा लिखवाया गया

जब 1982 में राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी का कार्यकाल समाप्त हुआ तो इंदिरा गांधी ने ज्ञानी ज़ैल सिंह को अगला राष्ट्रपति बनाने का फ़ैसला किया.

चुनाव प्रचार के दौरान ज़ैल सिंह के इस कथन पर ख़ासा बवाल मचा कि अगर इंदिरा गांधी कहें तो वो सड़क पर झाड़ू लगाने के लिए भी तैयार हैं.

ज़ैल सिंह को राष्ट्रपति बनाने के फ़ैसले को इंदिरा गांधी के सलाहकारों जैसे माखनलाल फ़ोतेदार और अरुण नेहरू जैसे लोगों ने पसंद नहीं किया था. उन्होंने ज़ैल सिंह की निष्ठा की परीक्षा के लिए एक अजीब तरह की अग्निपरीक्षा का रास्ता चुना.

केसी सिंह बताते हैं, "आईएस बिंद्रा ने मुझे बताया था कि उन लोगों ने राष्ट्रपति बनते ही ज्ञानी ज़ैल सिंह से उनका इस्तीफ़ा लिखवाया जिस पर कोई तारीख़ नहीं थी. इसके पीछे विचार ये था कि 1985 के चुनाव के बाद अगर राजीव गांधी को प्रधानमंत्री बनाया जाता है तो इंदिरा गांधी राष्ट्रपति भवन चली जाएंगी."

"ज़ैल सिंह ने बाक़ायदा राष्ट्रपति भवन के पैड पर अपना इस्तीफ़ा लिखा. उनके पद संभालने के तुरंत बाद उनके सलाहकारों ने राष्ट्रपति भवन के सारे टाइपराइटर और स्टेशनरी बदल दी ताकि भविष्य में कभी उनका इस्तीफ़ा सार्वजनिक किया गया तो वो उसका खंडन कर सकें."

इंदिरा गांधी ने प्रोटोकॉल निभाया

इंदिरा गांधी ने उन्हें इस पद के लिए चुना था इसलिए उन्होंने ये सुनिश्चित किया कि दोनों के बीच कोई विवाद न उठ खड़ा हो. उन्होंने हर सप्ताह राष्ट्रपति से मिलकर सरकार की गतिविधियों की जानकारी देने का प्रोटोकॉल जारी रखा.

एक बार राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री दोनों किसी विदेशी मेहमान को रिसीव करने पालम हवाई अड्डे जा रहे थे.

के सी सिंह बताते हैं, "संयोग से राष्ट्रपति की मोटर कारों का काफ़िला प्रधानमंत्री की कार से आगे चल रहा था. जब राष्ट्रपति की कार टेक्निकल एरिया में पहुंची, हमने देखा की प्रधानमंत्री की कार बहुत तेज़ी से उनकी कार के आगे निकल गई ताकि जब ज़ैल सिंह वहाँ पहुंचे तो इंदिरा गांधी उन्हें रिसीव कर सकें.

"बाद में हमने इंदिरा गांधी को दिल्ली के पुलिस कमिश्नर को डांटते हुए सुना कि भविष्य में कभी भी ऐसा न हो कि राष्ट्रपति की कार पहले पहुंच जाए, जब उन्हें वहाँ रिसीव करने वाला कोई न हो."

पंजाब को लेकर इंदिरा और ज़ैल सिंह में बढ़े मतभेद

जैसे-जैसे पंजाब में अशांति बढ़ी इंदिरा गांधी और ज़ैल सिंह के बीच संबंधों में ठंडापन आना शुरू हो गया. इस मुद्दे पर न तो उनसे कोई राय ली गई और न ही उनके विचारों को कोई तवज्जो दी गई.

जानेमाने पत्रकार वीर सांघवी अपनी आत्मकथा 'अ रूड लाइफ़' में लिखते हैं, "राजीव गांधी के आसपास रहने वाले लोग अब तक इंदिरा गांधी को ये समझाने में कामयाब हो गए थे कि ज्ञानीजी पंजाब समस्या का एक हिस्सा हैं न कि समाधान.""

वीर सांघवी लिखते हैं, "राजीव गांधी ने मुझे बताया था, मेरे पास मेरी मां के हाथों से लिखे कागज़ात हैं जिसमें उन्होंने लिखा है कि ज़ैल सिंह ने किस हद तक पंजाब में शांति के लिए किए जा रहे प्रयासों को नुक़सान पहुंचाया है. पंजाब के नेता दिल्ली आते थे और हम लोग समाधान पर सहमत हो जाते थे. लेकिन वापस जाने पर ज़ैल सिंह उन्हें फ़ोन कर कहते थे तुम इस पर राज़ी मत हो. सरकार तुम्हें और देगी. आखिर में मेरी मां ने उन्हें पंजाब से संबंधित कागज़ात भेजने बंद कर दिए थे."

केसी सिंह इस वक्तव्य में कई खोट बताते हैं. उनका कहना है, "पूर्व गृह मंत्री के तौर पर ज़ैल सिंह को अंदाज़ा था कि उनका टेलिफ़ोन टैप किया जा रहा है.

वो लिखते हैं, "यही वजह थी कि जिन आगुतंकों से उन्हें गुप्त बात करनी होती थी, उन्हें वो मुग़ल गार्डन (अभी इसका नाम बदल कर अमृत उद्यान कर दिया गया है) ले जाते थे. उनको ये भी पता था कि उनकी स्टडी में होने वाली हर बात को सुना जा रहा है."

"वो इतने मूर्ख नहीं थे कि अकाली नेताओं को खुली लाइन पर फ़ोन कर उन्हें किसी समझौते पर राज़ी न होने के लिए उकसाएं. दूसरे अकालियों से उनका संपर्क ज़रूर था लेकिन वो उनमें से किसी पर विश्वास नहीं कर सकते थे."

स्वर्ण मंदिर का दृश्य देखकर ज़ैल सिंह हुए विचलित

ऑपरेशन ब्लूस्टार के बाद जब ज्ञानी ज़ैल सिंह ने स्वर्ण मंदिर का दौरा किया तो वो वहाँ पर हुई तबाही देख कर दंग रह गए.

ज़ैल सिंह के साथ वहाँ गए केसी सिंह याद करते हैं, "वहाँ का दृश्य किसी के लिए भी दिल दहला देने वाला था लेकिन किसी सिख के लिए ये बहुत बड़ा भावनात्मक धक्का था. हालांकि वहाँ से मारे गए लोगों के शव हटा दिए गए थे लेकिन माहौल में उनकी बदबू मौजूद थी. रह-रह कर फ़ायरिंग भी की जा रही थी ताकि वहाँ छिपे चरमपंथी राष्ट्रपति के दल पर निशाना न साध सकें."

उस दौरान अमृतसर के डिप्टी कमिश्नर रहे रमेश इंदर सिंह अपनी क़िताब 'टरमॉयल इन पंजाब' में लिखते हैं, "राष्ट्रपति की अमृतसर यात्रा से तीन तरह के लोग बहुत निराश हुए थे."

"सेना के अधिकारी इस बात पर खिन्न थे कि राष्ट्रपति ने घायल और मारे गए सैनिकों को देखने सैनिक अस्पताल जाने की ज़हमत नहीं उठाई थी हालांकि वो सेना के प्रधान सेनापति थे. प्रशासन इस बात से हतोत्साहित था कि राष्ट्रपति ने राज्यपाल को खरीखोटी सुनाई थी जबकि ग्रंथी इस बात पर नाराज़ थे कि राष्ट्रपति ने उनकी शिकायतों को दूर करने की कोशिश नहीं की थी."

ज़ैल सिंह ने इस्तीफ़ा देने का मन बनाया फिर विचार बदला

केसी सिंह बताते हैं, "ज़ैल सिंह इस बात से नाराज़ थे कि सरकार और जनरलों ने उन्हें ऑपरेशन, उसके समय और उससे हुई बरबादी के बारे में अंधेरे में रखा था. जब वो राष्ट्रपति भवन में अपनी कार से उतरे तो उन्होंने धीमी आवाज़ में कहा कि दूसरों की गई ग़लतियों का मूल्य उन्हें चुकाना होगा. मुझे ऐसा लगा कि वो इस्तीफ़ा देने का मन बना रहे हैं. लेकिन सुबह होते-होते उन्होंने अपना विचार बदल दिया था."

उन्होंने सोचा कि उनका ये कदम सिख समुदाय को सरकार के ख़िलाफ़ खड़ा कर देगा और सिखों का विद्रोह और गंभीर रूप ले लेगा. इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दिल्ली में जब सिख विरोधी दंगे हुए उस समय जानेमाने पत्रकार श्याम भाटिया दिल्ली में थे.

बाद में उन्होंने अपनी क़िताब 'बुलेट्स एंड बाइलाइंस' में लिखा, "मैंने राष्ट्रपति ज़ैल सिंह से मिलने का समय लिया. उस समय कोई टैक्सी ड्राइवर अपनी टैक्सी निकालने के लिए तैयार नहीं था. मैं अपने होटल की ट्रेवेल एजेंसी के असिस्टेंट के ब्वाए फ़्रेंड के स्कूटर पर राष्ट्रपति भवन पहुंचा."

"वहाँ सुरक्षाकर्मियों ने मुझे अंदर नहीं जाने दिया. जब 15 मिनट हो गए तो अंदर से फ़ोन आया कि मुझे अंदर आने दिया जाए. ज़ैल सिंह ने मुझे अपने पास बैठाकर वो सब चीज़ें बताने के लिए कहा जो मैंने देखी थीं. मैं देख पा रहा था कि रो-रो कर उनकी आंखें लाल हो गई थीं. बार-बार वो यही दोहरा रहे थे, क्या किया उन्होंने ?"

भिंडरावाले को बढ़ावा देने का आरोप

ऑपरेशन ब्लूस्टार पर क़िताब लिखने वाले और बीबीसी के पूर्व संवाददाता मार्क टली याद करते हैं, "जब मेरी क़िताब छपी तो ज़ैल सिंह ने उसे पसंद नहीं किया. उनके प्रवक्ता त्रिलोचन सिंह का मेरे पास फ़ोन आया कि वो मुझसे मिलना चाहते हैं."

"जब मैं अपने जिगरी दोस्त और क़िताब के सह लेखक सतीश जैकब के साथ उनसे मिलने पहुंचा तो उन्होंने पूछा कि मैंने कैसे लिख दिया कि भिंडरावाले को बढ़ाने में मेरा हाथ है. सतीश ने उनसे पूछा कि भिंडरावाले को आपने बढ़ावा नहीं दिया तो किसने दिया? ज़ैल सिंह बोले कांग्रेस पार्टी ने. तब सतीश ने उनकी आंखों में आंखे डालकर सवाल किया, क्या आप उस समय कांग्रेस पार्टी के सदस्य नहीं थे?"

मैंने केसी सिंह से पूछा कि इन आरोपों में कितनी सच्चाई है कि भिंडरावाले को बढ़ावा देने में ज्ञानी ज़ैल सिंह का हाथ था?

केसी सिंह का जवाब था, "हो सकता है कि सत्ता से बाहर रहने के दौरान अकालियों को विभाजित करने के उद्देश्य से ज्ञानी ज़ैल सिंह ने भिंडरावाले को बढ़ावा दिया हो लेकिन एक साधारण उपदेशक के चरमपंथी बन जाने के पीछे पंजाब के मुख्यमंत्री दरबारा सिंह की दमनकारी नीति ने भी कम योगदान नहीं दिया."

राजीव गांधी को प्रधानमंत्री की शपथ दिलाने का फ़ैसला

जब इंदिरा गांधी की हत्या हुई तो ज्ञानी ज़ैल सिंह यमन की सरकारी यात्रा पर थे. उन्होंने तय किया कि वो राजीव गांधी को प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाएंगे जबकि उनके कई सलाहकारों ने उन्हें सलाह दी कि वो एक अंतरिम प्रधानमंत्री को शपथ दिलाएं जैसा कि जवाहरलाल नेहरू और लाल बहादुर शास्त्री को देहावसान के समय हुआ था.

राजीव गांधी के संकट प्रबंधकों के मन में ज़ैल सिंह की भावी भूमिका के मारे में इतना संदेह था कि एक समय अरुण नेहरू यहाँ तक सोच रहे थे कि राजीव गांधी के कोलकाता से लौटते ही उप राष्ट्रपति वैकटरमण उन्हें प्रधानमंत्री पद की शपथ दिला दें. केसी सिंह कहते हैं, सौभाग्य से ऐसा नहीं किया गया.

विदेश यात्रा पर गया राष्ट्रपति सर्विंग राष्ट्रपति होता है. अगर उसकी अनुपस्थिति में कोई दूसरा उसकी शक्तियों का इस्तेमाल करे, संविधान का इससे बड़ा उल्लंघन नहीं हो सकता.

राजीव गांधी ने बनाई ज़ैल सिंह से दूरी

लेकिन राजीव गांधी के कार्यकाल की शुरुआत से ही ये लगने लगा कि उनके और ज्ञानी ज़ैल सिंह के बीच सब कुछ ठीक नहीं है. इसका पहला संकेत तब मिला जब ज़ैल सिंह के नज़दीकी आर के धवन को न सिर्फ़ उनके पद से हटा दिया गया बल्कि ये कहानी गढ़ने की कोशिश की गई कि प्रधानमंत्री की हत्या के षड्यंत्र में उनका भी हाथ हो सकता है.

ज़ैल सिंह के विशेष सहायक आईएस बिंद्रा को राष्ट्रपति भवन में एक्सटेंशन नहीं दिया और वापस पंजाब भेज दिया गया. प्रधानमंत्री ने राष्ट्रपति से हर सप्ताह मिलकर उन्हें सरकार की गतिविधियों की जानकारी देना बंद कर दिया जबकि उनके नाना जवाहरलाल नेहरू हर सोमवार को राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद से मिलकर उन्हें सरकारी कामकाज की जानकारी देते थे. प्रधानमंत्री की विदेश यात्रा से पहले और बाद में राष्ट्रपति को ब्रीफ़ करने की प्रथा भी समाप्त कर दी गई.

राज्य सरकारों में इस तरह का संदेश भेजा गया कि प्रधानमंत्री के लिए राष्ट्रपति का पद महत्वपूर्ण नहीं है. इन संकेतों को कांग्रेस के मुख्यमंत्रियों ने बहुत तेज़ी से ग्रहण कर लिया. वो राज्यों में राष्ट्पति की यात्रा को हतोत्साहित करने लगे और राष्ट्रपति के वहाँ पहुंचने पर हवाईअड्डे पर उपस्थित न रहने के बहाने ढ़ूंढने लगे. नतीजा ये रहा कि ज्ञानी ज़ैल सिंह ने उन राज्यों में जाना बंद कर दिया जहां कांग्रेस की सरकार थी.

ज्ञानी ज़ैल को इस्तीफ़ा देने की दी गई सलाह

इस दौरान ज्ञानी ज़ैल सिंह से अप्रत्यक्ष रूप से कहा गया कि वो अपने पद से इस्तीफ़ा दे दें.

ज़ैल सिंह अपनी आत्मकथा 'मेमॉयर्स ऑफ़ ज्ञानी ज़ैल सिंह' में लिखते हैं, "उस समय हरियाणा के मुख्यमंत्री भजन लाल और केंद्रीय मंत्री के सी पंत मेरे पास आए. उन्होंने मुझे ये बताने की कोशिश की कि पंजाब की समस्या का हल तभी निकल सकता है अगर मैं वहाँ का फिर से मुख्यमंत्री बन जाऊं. उन्होंने कहा कि ये आपकी तरफ़ से बहुत बड़ा त्याग होगा अगर आप राष्ट्रपति का पद छोड़ राज्य के मुख्यमंत्री बनने को तैयार हो जाएं. लेकिन ये त्याग देश के हित में होगा."

"मैंने उन दोनों से पूछा कि क्या यहाँ आने से पहले आपने प्रधानमंत्री से परामर्श किया है या उन्होंने ही आपको मेरे पास भेजा है? उन्होंने कहा कि ये पहल उन्होंने अपनी तरफ़ से की है. मैंने उनसे पूछा कि अगर प्रधानमंत्री को इस प्रस्ताव की भनक नहीं है तो आप कैसे मान सकते हैं कि वो इस प्रस्ताव को मान लेंगे? मैंने उनसे कहा कि मैं नहीं मानता कि आप मुझे ये सलाह सिर्फ़ अपने बूते पर दे रहे हैं. लेकिन अगर ये सही है तो मुझे इस बारे में कुछ नहीं कहना है."

ज्ञानी ज़ैल सिंह पोस्टल बिल पर बैठे

इस बीच ज़ैल सिंह ने उन नेताओं से मेल-जोल बढ़ाया जो राजीव गांधी से असंतुष्ट थे. इनमें प्रमुख थे कल्पनाथ राय, हेमवतीनंदन बहुगुणा, बुद्धप्रिय मौर्य और विद्याचरण शुक्ल.

केसी सिंह बताते हैं, "जब विद्याचरण शुक्ल ज़ैल सिंह से मिलने आए तो उन्होंने मुझे निर्देश दिया कि मैं उन दोनों के बीच संवादवाहक का काम करुं, ताकि उन्हें बार-बार राष्ट्रपति भवन न आना पड़े क्योंकि इसकी वजह से इंटेलिजेंस ब्यूरो के जासूस कुछ अधिक ही सतर्क हो सकते हैं. मेरा घर वेलिंगटन क्रेसेंट पर था, शुक्ल का घर वहाँ से बिल्कुल नज़दीक था. ऐसे में वो ज्ञानी ज़ैल सिंह को संदेश पहुंचाने के बहाने मेरे घर आने लगे."

इस बीच राजीव गांधी सरकार ने संसद मे पोस्टल बिल पेश किया जिसमें व्यवस्था थी कि किसी भी व्यक्ति की डाक को खोलकर पढ़ा जा सकता था. जब मीडिया को इसकी ख़बर लगी तो सरकार की चारों ओर आलोचना होने लगी.

केसी सिंह बताते हैं "जब ये बिल संसद से पास होकर ज्ञानी ज़ैल सिंह के हस्ताक्षर के लिए आया तो उन्होंने सोचा कि अगर वो इस बिल को वापस कर देते हैं तो सरकार उसे पुन: उनके हस्ताक्षर के लिए भेजेगी और संविधान के 44वें संशोधन के तहत वो तब उस पर हस्ताक्षर करने के लिए बाध्य होंगे."

"उन्होंने तय किया कि वो बिल को वापस न लौटा कर उस पर बैठे रहेंगे क्योंकि संविधान में इस बात का कोई उल्लेख नहीं है कि राष्ट्रपति कब तक उस बिल को रोक सकते हैं. इसके लिए राजीव गांधी ज़ैल सिंह पर महाभियोग चला सकते थे लेकिन इसके लिए उनके पास राज्यसभा में पर्याप्त समर्थन नहीं था."

राजीव गांधी को बर्ख़ास्त करने का विपक्ष का दबाव

इस बीच बोफ़ोर्स मामले के कारण राजीव गांधी की छवि ख़राब होने लगी और विपक्ष के नेता जिनमें विद्याचरण शुक्ल प्रमुख थे, ज़ैल सिंह पर दवाब डालने लगे कि वो राजीव गांधी को बर्ख़ास्त कर दें.

केसी सिंह बताते हैं, "विद्याचरण शुक्ल का मानना था कि जैसे ही राजीव गांधी को बर्ख़ास्त किया जाएगा कांग्रेस में उनका समर्थन जाता रहेगा. इस बीच 24 मार्च को विश्वनाथ प्रताप सिंह रक्षा मंत्री के तौर पर राष्ट्रपति से मिलने आए."

उन्होंने वीपी सिंह को परखने की कोशिश की और उन्हें अंदाज़ा हो गया कि उनका राजीव गांधी को बर्ख़ास्त करने की मुहिम में राष्ट्रपति का साथ देने का कोई इरादा नहीं है.

वीपी सिंह राजीव गांधी से लड़ने के लिए तैयार तो थे लेकिन व्यवस्था के अंदर रह कर. वो ये आभास देना चाह रहे थे कि वो सत्ता के पीछे भाग नहीं रहे हैं.

अशोक सेन को प्रधानमंत्री बनाने की मुहिम

केसी सिंह बताते हैं, "इस बीच विद्याचरण शुक्ल मेरे यहां आए और बोले कि वो और अशोक सेन राष्ट्रपति से तुरंत मिलना चाहते हैं. मैं उन्हें अपनी नीली फ़ियेट कार में बैठा कर राष्ट्रपति भवन ले गया. उन दिनों वरिष्ठ अधिकारी के साथ राष्ट्रपति भवन आने वाले लोगों की सुरक्षा जांच नहीं होती थी. शुक्ल ज़ोर दे रहे थे कि राजीव गांधी सरकार को बर्ख़ास्त करने का उचित समय आ पहुंचा है."

"ज़ैल सिंह ने उन दोनों की बात ध्यान से सुनी लेकिन इस सलाह के व्यवहारिक पक्ष के प्रति उनकी शंका बनी रही. जब ज़ैल सिंह ने पूछा कि राजीव गांधी की जगह किस को प्रधानमंत्री बनाया जाए तो शुक्ल ने अशोक सेन का नाम आगे कर दिया. ज़ैल सिंह का मानना था कि अशोक सेन का क़द इतना बड़ा नहीं है कि वो अपनी तरफ़ कांग्रेस के दूसरे सांसदों को खींच पाएं."

राजीव गांधी पर मनोवैज्ञानिक दबाव

केसी सिंह का मानना है कि ज़ैल सिंह किसी चरण में राजीव गांधी सरकार को बर्ख़ास्त करने के पक्ष में नहीं थे लेकिन वो इसके द्वारा राजीव गांधी पर मनोवैज्ञानिक दवाब बनाना चाहते थे और उसमें वो सफल भी हुए.

इससे कांग्रेस में राजीव गांधी के विरोध को बढ़ावा मिला और विपक्ष भी एकजुट और उत्साहित बना रहा.

एक समय ऐसा भी आया जब विपक्ष उन्हें दूसरे कार्यकाल के लिए राष्ट्रपति चुनाव लड़ने के लिए मनाने लगा.

लेकिन ज्ञानी ज़ैल सिंह ने इसके लिए एक शर्त रखी कि वो वैंकटरमण के ख़िलाफ़ संयुक्त विपक्ष का उम्मीदवार बनने के लिए तैयार हो जाएंगे बशर्ते वीपी सिंह उनके नाम का प्रस्ताव करें. लेकिन वीपी सिंह इसके लिए तैयार नहीं हुए.

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