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'ख़ून से इतिहास लिखने वाले' करणी सेना के लोकेंद्र कालवी नहीं रहे
- Author, नारायण बारेठ
- पदनाम, जयपुर से बीबीसी हिंदी के लिए
करणी सेना के संस्थापक लोकेन्द्र सिंह कालवी का सोमवार को जयपुर के सवाई मानसिंह अस्पताल में हृदय गति रुकने से निधन हो गया.
सवाई मानसिंह अस्पताल के अधीक्षक डॉक्टर अचल शर्मा ने बीबीसी से उनके निधन की पुष्टि करते हुए बताया है कि कालवी को बीती रात सवा एक बजे से डेढ़ बजे के बीच कार्डियक अरेस्ट हुआ था जिससे उनका निधन हो गया.
इससे पहले साल 2022 के जून महीने में ब्रेन स्ट्रोक आने के बाद उन्हें सवाई मानसिंह अस्पताल में भर्ती कराया गया था.
बता दें कि लोकेंद्र सिंह कालवी ने साल 2006 में 'श्री राजपूत करणी सेना' की स्थापना की थी जिसने साल 2018 में दीपिका पादुकोण की अभिनय वाली फ़िल्म पद्मावत का विरोध किया था.
लेकिन लोकेंद्र कालवी आख़िर कौन थे और करणी सेना से पहले और बाद में राजस्थान में उन्हें लोग कैसे देखते थे, आइए जानते हैं.
शानदार निशानेबाज़ थे कालवी
कालवी अपनी सभाओं में राजपूताना शौर्य और बलिदान का बखान करते थे और जब वो ऐसा करते थे तो उनके समर्थक भावों से भर जाते थे. वे अच्छे निशानेबाज़ थे, लेकिन अक्सर सियासी निशाना चूक जाते थे.
करणी सेना के संस्थापक लोकेन्द्र सिंह कालवी अपनी ज़बान से जज़्बात और जुनून पैदा कर देते थे. अपनी इस शैली से कालवी ने बड़ा समर्थक वर्ग खड़ा कर लिया था, लेकिन उनके आलोचक भी रहे हैं.
लम्बी कद काठी और राजपूती लिबास के साथ जब वे सभा में नमूदार होते थे, बरबस ही उनकी तरफ लोगों का ध्यान चला जाता था.
जब वे कहते थे कि 'मुझे रानी पद्मिनी की 37वीं पीढ़ी से होने का सौभाग्य प्राप्त है. जौहर की ज्वाला में बहुत कुछ जल जाएगा. रोक सको तो रोको' तो उनके समर्थक हुंकार भरने लगते थे.
'ख़ून से इतिहास लिखा'
यूँ तो उनकी शारीरिक बनावट उन्हें एक ख़ास पहचान देती थी. मगर ख़ुद भी वह अपने वज़न और क़द का उल्लेख करना नहीं भूलते थे.
सभाओं और जलसों में कालवी कहा करते थे कि 'मैं छह फ़ुट चार इंच 118 किलो का आपके सामने खड़ा हूं."
वह गाँधी का ज़िक्र करते थे तो इतिहास के उन किरदारों का उल्लेख भी करते थे, जिन्हें सुनकर राजपूत युवक जोश में भर जाते थे.
वह कहते थे, "हमने सिर कटवाए हैं मालिक! ख़ून से इतिहास लिखा है."
अपने समाज के मुद्दों को लेकर कालवी पिछले डेढ़ दशक से काफी मुखर रहे. भड़काऊ मुद्दे उन तक चले आते थे या वो खुद ऐसे मुद्दों तक चले जाते थे.
वह जोधा अकबर फ़िल्म के ख़िलाफ़ अभियान चलाकर सुर्खियों में आए थे. मगर फिल्म पद्मावत मुद्दे ने उनकी सुर्खियों का फलक बड़ा कर दिया.
मध्य राजस्थान के नागौर जिले के कालवी गांव में जन्मे लोकेन्द्र सिंह कालवी को यह सब विरासत में मिला था. उनके पिता कल्याण सिंह कालवी थोड़े-थोड़े वक्त के लिए राज्य और केंद्र में मंत्री रहे थे.
लोकेन्द्र के पिता चंद्रशेखर सरकार में थे मंत्री
कल्याण सिंह कालवी चंद्रशेखर सरकार में मंत्री रहे थे और वह चंद्रशेखर के भरोसेमंद साथी भी थे. इसलिए अपने पिता के असमय चले जाने के बाद लोकेन्द्र सिंह कालवी को पूर्व प्रधानमंत्री के समर्थकों ने हाथोहाथ लिया.
वे अजमेर के मेयो कॉलेज में पढ़े थे. मेयो कॉलेज तालीम के लिहाज़ से पूर्व राजपरिवारों का पसंदीदा स्थान रहा है.
कालवी हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में सहजता से अपनी बात कहते थे. कम लोग जानते होंगे कि वे बॉस्केटबॉल के अच्छे खिलाड़ी थे. इस राजपूत नेता की नज़र और हाथ शूटिंग के लिए बहुत मुफीद थे.
कालवी को निशानेबाज़ी ने कुछ तमगे भी दिलवाए थे. लेकिन यह विडंबना ही है कि जब-जब उन्होंने चुनाव लड़ा, निशाना ठीक नहीं बैठा.
कालवी नागौर से लोकसभा के लिए चुनाव मैदान में उतरे और हार गए. फिर 1998 में कालवी ने बीजेपी उम्मीदवार के रूप में बाड़मेर से संसद में जाने की कोशिश की पर शिकस्त मिली.
बीजेपी से कांग्रेस, कांग्रेस से बीजेपी
बाड़मेर उनके पिता का चुनाव क्षेत्र रहा था. बीच-बीच में कुछ महीनों की शिथिलता छोड़ दें तो अक्सर उनके हाथ में कोई अभियान रहा करता था.
साल 2003 में कालवी ने कुछ राजपूत नेताओं के साथ मिलकर सामाजिक न्याय मंच बनाया था और ऊंची जातियों के लिए आरक्षण की मुहिम शुरू की. तब वे प्राय मंचों पर कहते मिलते थे, "उपेक्षित को आरक्षण, आरक्षित को संरक्षण."
इस अभियान से बीजेपी से रिश्ता टूट गया. फिर वे कांग्रेस में चले आए और एक बार फिर बीजेपी में आए.
मगर पिछले कुछ सालों में दोनों पार्टियों में वे अपनों के बीच पराये से रहे. उन्हें पार्टी दफ्तरों में नहीं देखा जाता था.
राजपूत समाज के मुद्दों पर उनकी सक्रियता और मुखरता ने उन्हें एक ख़ास पहचान दी.
लेकिन जब बीजेपी ने साल 2017 के लोकसभा चुनाव में बाड़मेर से पूर्व विदेश मंत्री जसवंत सिंह का टिकट काट दिया, तब कालवी या तो चुप थे या पार्टी के इस फैसले पर सहमत थे.
इसे लेकर राजपूत समाज में उनकी बड़ी आलोचना हुई.
सिंह के एक समर्थक ने कुछ साल पहले कहा था कि 'कालवी ने बाड़मेर में जसवंत सिंह के विरुद्ध चुनाव प्रचार में भाग लिया. इसे हम भूल नहीं सकते. मगर जब जयपुर के पूर्व राजपरिवार की दिया कुमारी और बीजेपी सरकार के बीच एक संपत्ति को लेकर जंग छिड़ी तब कालवी पूर्व राजपरिवार के साथ खड़े मिले.'
मेहमान-नवाज़ी कालवी की शख़्सियत का हिस्सा
मेहमान-नवाज़ी उनके व्यक्तित्व का हिस्सा था. उनके इस काम में राजपूत आतिथ्य की झलक मिलती थी.
उन्हें कोई व्यसन नहीं था. वे शराबनोशी से बहुत दूर थे.
हालांकि, उनके आलोचक कहते थे कि वह राजस्थान में जातिवाद को प्रोत्साहित कर रहे थे.
उनके साथ काम कर चुके एक राजपूत नेता ने कुछ समय पहले बीबीसी को बताया था कि 'उनकी याददाश्त गजब की है. उन्हें सैकड़ों फोन नंबर मुँह ज़बानी याद हैं."
(नोट: ये लेख मूल रूप से साल 2018 में प्रकाशित हुआ था)
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