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नज़रिया: देश करणी सेना चलाएगी या संविधान?
- Author, अविनाश दास
- पदनाम, फ़िल्म निर्देशक, बीबीसी हिन्दी के लिए
इस दौर में हमारी संवैधानिक संस्थाओं की बेबसी पर मुझे ग़ुस्सा बहुत आने लगा है. कई लोग मुझे समझाते हैं कि फ़िल्म बनानी है तो ये ग़ुस्सा नुक़सानदेह है.
लेकिन मेरे लिए यह ग़ुस्सा इसलिए भी ज़रूरी है, क्योंकि इसके बिना अगर मैं फ़िल्म बना भी लूं तो उसका कोई अर्थ नहीं रह जाएगा.
सबसे पहले तो मुझे सेंसर बोर्ड पर ग़ुस्सा आया कि उसने करणी सेना के दबाव में राजस्थान के कथित इतिहासकारों और राजवंशियों को फ़िल्म दिखा कर 'पद्मावत' की रिलीज़ को हरी झंडी दी.
इसके बाद भी करणी सेना की धमकियां बंद नहीं हुईं और राजस्थान, हरियाणा, मध्य प्रदेश और गुजरात की राज्य सरकार 'पद्मावत' की रिलीज़ को अपने यहां बैन करके करणी सेना के विरोध की आग में घी डालने का काम किया.
असंवैधानिक प्रतिबंध
निर्माताओं ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया और सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रतिबंध को असंवैधानिक मानते हुए उसे रद्द कर दिया. अब तक सुप्रीम कोर्ट तमाम तरह की साज़िशों पर आख़िरी कील साबित होती रही है, लेकिन पता नहीं करणी सेना को किसकी शह मिली हुई है कि वह सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसलों से भी बग़ावत करने पर उतर आई है.
यहां तक कि बिहार जैसे सूबे में भी करणी सेना के गुंडा गिरोह ने तोड़फोड़ मचानी शुरू कर दी है.
मुझे इस बात की चिंता नहीं है कि अगर चार राज्यों में 'पद्मावत' रिलीज़ नहीं हुई तो निर्माताओं के 50 करोड़ रुपए डूब जाएंगे. मुझे इस बात की चिंता है कि अगर इन राज्यों में 'पद्मावत' रिलीज़ नहीं हुई तो सुप्रीम कोर्ट की अवमानना का रवैया आम हो जाएगा.
इसके बाद न तो कोई इतिहास के रचनात्मक पाठ की तरफ आगे बढ़ना चाहेगा, न वर्तमान में सिर उठा कर जी पाएगा.
हैरानी इस बात की है कि कश्मीर में सेना पर पत्थरबाज़ी की तरह करणी सेना से जुड़े तमाम हादसे राष्ट्रीय मुद्दा बन गए हैं, तब भी हमारे प्रधानमंत्री की बेमिसाल ख़ामोशी कायम है.
यानी एक लोकतांत्रिक समाज में उम्मीद की सबसे बड़ी रोशनी पर करणी सेना फूंक मार रही है और प्रधानमंत्री चुप हैं. न वे ख़ुद मुख्यमंत्रियों को निर्देश रहे हैं, न उनके सिपहसालार इस मसले को सुलझाने के लिए सामने आ रहे हैं.
क्या राज्यों को SC के अवमानना की चिंता नहीं?
इससे पहले प्रकाश झा की फ़िल्म 'आरक्षण' के वक़्त ऐसा हुआ था. सेंसर बोर्ड ने प्रमाणपत्र दे दिया, लेकिन उत्तर प्रदेश, पंजाब और हरियाणा ने अपने यहां इस फ़िल्म को बैन कर दिया.
प्रकाश झा सुप्रीम कोर्ट गए और कोर्ट ने भी मामले की गंभीरता को समझते हुए एक दिन के भीतर फ़ैसला दिया और बैन रद्द कर दिया गया.
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद राज्य सरकारों का रुख़ नरम हुआ, लेकिन 'पद्मावत' के मामले में फ़ैसला आने के बाद राज्य सरकारों की ओर से कोई आधिकारिक बयान अभी तक सामने नहीं आया है कि वे सुप्रीम कोर्ट के आदेश को मानने की दिशा में गंभीर हैं.
मुझे नहीं मालूम है कि सुप्रीम कोर्ट की अवमानना करने की स्थिति में ताक़तवर राज्य सरकारों को किस किस्म की सज़ा का प्रावधान है, लेकिन ये तय है कि राज्य सरकारों को इस अवमानना की कोई चिंता नहीं है.
एफ़टीआईआई पुणे के सबसे विवादास्पद अध्यक्ष गजेंद्र सिंह चौहान ने भी करणी सेना से अपील की है कि पहले फ़िल्म देखें और अगर कुछ ग़लत लगे तो फिर विरोध करें.
राजनीतिक रूप से बीजेपी का पक्ष लेने वाले फ़िल्मकार मधुर भंडारकर ने भी सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का स्वागत किया है.
करणी सेना की आवाज़ के पीछे कौन?
इंडस्ट्री के तमाम बीजेपी हितैषियों के लिए करणी सेना का मौजूदा संकट असहज करने वाला है, लेकिन बीजेपी का अपना स्टैंड पंजाब के नेता सूरजपाल अम्मू के बयान में देखिए जिन्होंने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट ने लाखों-करोड़ों हिंदुओं की भावनाओं को ठेस पहुंचायी है और 'पद्मावत' रिलीज़ हुई तो देश टूट जाएगा.
बीजेपी ने अम्मू के इस बयान से ख़ुद को अलग नहीं किया, न ही किसी किस्म की कार्रवाई के लिए कोई पहल की.
सुप्रीम कोर्ट ने भी अब तक इस मामले में कोई नोटिस नहीं लिया है. मैं उस दृश्य की कल्पना करना चाहता हूं, जब करणी सेना के नेता सुप्रीम कोर्ट में खड़े होकर न्यायमूर्तियों की समझ को अपनी खलनायक जैसी हंसी से रौंद डालेंगे और देश के नीति-निर्धारक उन जातीय नेताओं को शाबाशी देंगे.
अब इस बात में कोई शक़ नहीं है कि करणी सेना की आवाज़ के पीछे सरकार मज़बूती से खड़ी है. तक़लीफ़ इस बात की है कि एक जातीय सेना के असर में देश की वह सरकार गिरफ़्तार है, जिसे तमाम जाति के लोगों ने वोट दिया है.
यह केवल एक सिनेमा का मामला नहीं?
तक़लीफ़ इस बात की भी है कि इस दौर में इतिहास के तमाम नायक और योद्धा धर्म और जाति के खांचों में बांटे जा रहे हैं- चाहे वो अकबर हों, अशोक हों, शिवाजी हों या आंबेडकर हों.
कल को गांधी पर देश का बनिया समाज अपना दावा करेगा और तब भी सुप्रीम कोर्ट आज की तरह बेबस नज़र आएगा, तो सोचिए कि इस बेबसी की कितनी बड़ी कीमत समाज को चुकानी पड़ेगी!
ये तमाम संकेत हैं वर्ण व्यवस्था की ज़ोरदार वापसी के और इसका विरोध ज़रूरी है और बहुत ज़रूरी है. यह सिर्फ़ एक सिनेमा का मामला नहीं है, यह एक सिनेमा के बहाने सामाजिक एकता की जड़ें खोदने का मामला है - इसलिए करणी सेना का विरोध ज़रूरी और बहुत ज़रूरी है.
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