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कहाँ से आई थीं पद्मावती?
- Author, डॉ. महाकालेश्वर प्रसाद
- पदनाम, लेखक, जायसीकालीन भारत
संजय लीला भंसाली द्वारा निर्देशित फ़िल्म 'पद्मावती' को लेकर विवाद है लेकिन पद्मावती का चरित्र कितना असली है और कितना काल्पनिक, इस बात पर विद्वानों में मतभेद है.
पद्मावती नाम के महिला चरित्र का ज़िक्र पहली बार मध्यकालीन कवि मलिक मुहम्मद जायसी की कृति 'पद्मावत' में आता है, जो कि अलाउद्दीन ख़िलजी के शासनकाल के ढाई सौ साल बाद लिखी गई.
कई विद्वानों ने पद्मावती को एक विशुद्ध काल्पनिक चरित्र माना है. राजस्थान के राजपुताने के इतिहास पर काम करने वाली इरा चंद ओझा ने भी इसकी वास्तविकता को स्वीकार नहीं किया और साफ़ कहा है कि ये चरित्र पूरी तरह काल्पनिक है.
यहां तक कि हिंदी साहित्य के प्रकांड विद्वान रामचंद्र शुक्ल ने भी इसे काल्पनिक चरित्र ही माना है.
जायसी की पद्मावती इतिहास को थोड़ा अपने में समेटे हुए तो है लेकिन इसमें काल्पनिकता का पुट पर्याप्त है, इस बात का पता समकालीन रचनाकारों और इताहिसकारों से चलता है.
'पद्मावत मध्यकाल' का बहुत ही महत्वपूर्ण महाकाव्य है. कुछ लोगों का मानना है कि जायसी सूफ़ी कवि थे. उस समय सूफ़ी कवियों ने जो रचनाएं कीं उसमें उन्होंने चरित्रों को प्रतीकात्मक रूप में ग्रहण किया. उदाहरण के लिए मधुमती, मृगावती आदि का नाम लिया जा सकता है.
यहां जिस पद्मावती का चरित्र गढ़ा गया वो भी राजपुताने की पद्मावती तो नहीं थी, वो सिंघलगढ़ या सिंघल द्वीप जोकि लंका का नाम है, वहां से आती थी.
ख़िलजी और पद्मावती
रचना के अनुसार, जब राजा रत्नसेन पद्मावती को सिंघल द्वीप जाते हैं, उस समय तक राजा की एक पटरानी भी थी जिसका नाम था नागमती.
पद्मावती के आ जाने के बाद रचना में जो संघर्ष दिखाया गया है उसका वर्णन काल्पनिक है.
लेकिन राजस्थान में अब कुछ लोग इसे असल चरित्र बता रहे हैं. इस पर जो फ़िल्म बनी है उसमें अलाउद्दीन का जो चरित्र चित्रण किया गया है उस पर कुछ लोगों ने आपत्ति दर्ज कराई है.
लेकिन दिलचस्प बात है कि पद्मावत की रचना 16वीं शताब्दी की है जबकि अलाउद्दीन ख़िलजी का काल 14वीं शताब्दी की शुरुआत से शुरू होता है.
अलाउद्दीन का काल 1296 से 1316 तक था. इसलिए इस बात की संभावना ज़्यादा है कि कथाकार ने कहानी को आगे बढ़ाने के लिए कल्पना का सहारा लिया हो.
अलाउद्दीन के काल में जो रचनाएं लिखी गईं, उनमें तो पद्मावती नाम का कोई चरित्र भी नहीं मिलता.
अलाउद्दीन के समकालीन अमीर खुसरो थे. उनकी तीनों कृतियों में रणथंभौर और चित्तौड़गढ़ पर अलाउद्दीन ख़िलजी के आक्रमण का अलांकारिक वर्णन है लेकिन उसमें भी पद्मीवती जैसे किसी चरित्र का नाम नहीं है.
नहीं मिलता पद्मावती का ज़िक्र
अमीर खुसरो रणथंभौर के युद्ध में अमीरदेव और रंगदेवी की चर्चा ज़रूर करते हैं, लेकिन वहां पद्मावती का कोई ज़िक्र नहीं मिलता.
जब चित्तौड़गढ़ पर अलाउद्दीन ख़िलजी ने 1303 में आक्रमण किया तो इसे जीतने में उसे छह महीने का समय लगा था.
लेकिन जियाउद्दीन बर्नी, अब्दुल्ला मलिक किसामी जैसे उस समय के इतिहासकारों और जैन धर्म की अन्य समकालीन कृतियों में कहीं भी नहीं मिलता कि अलाउद्दीन ने औरतों के लिए आक्रमण किया था, जैसा कि आज दावा किया जा रहा है.
जौहर की बात अमीर खुसरों की कृतियों में मिलती है लेकिन वो रणथंभौर के आक्रमण के दौरान का है, चित्तौड़गढ़ के समय जौहर का कोई उल्लेख नहीं मिलता.
बाद के इतिहासकारों की रचनाओं में जो रतनसेन या पद्मावती का जो ज़िक्र आता है वो जायसी के 'पद्मावत' से लिया गया लगता है.
अबुल फ़जल ने आईने अकबरी में उन्हीं से लिया है बाद के इतिहासकारों ने भी ऐसा ही किया.
ताज्जुब की बात ये है कि जायसी ने पद्मावती का चरित्र ऐसा गढ़ा है कि उसने इतिहास को ही अतिक्रमित कर दिया.
बाद के इतिहासकारों ने जायसी की रचना को एक इतिहास की कृति की तरह लिया.
कल्पना को इतिहास मान लिया
इसका उदाहरण है कर्नल टाड की कृति. राजपुताने के इतिहास की अपनी कृति में उन्होंने लोक और दंत कथाओं में प्रचलित 'पद्मावती' चरित्र को इतिहास के एक हिस्से के रूप में दर्ज़ा दे दिया.
अलाउद्दीन के आक्रमण के 240 सालों बाद 'पद्मावत' की रचना होती है.
इसीलिए इसमें जितने चरित्र आते हैं वे पूरी तरह काल्पनिक हैं और सिर्फ़ अलाउद्दीन ख़िलजी का ही ऐसा चरित्र है जो वास्तविक है.
मलिक मोहम्मद जायसी अपने समय के विलक्षण कवि थे. उनके काल्पनिक चरित्र ऐतिहासिक चरित्रों को प्रभावित करते हैं.
जायसी अपने से क़रीब ढाई सौ साल पहले के एक चरित्र को उठाते हैं और अपने समय के एक चरित्र को पिरोकर मध्यकालीन भारत की भौगोलिक, सांस्कृतिक और सामाजिक स्थितियों का ऐसे वर्णन करते हैं कि वो वास्तविक लगने लगता है.
(डॉ महाकालेश्वर प्रसाद की बीबीसी हिंदी रेडियो एडिटर राजेश जोशी से बातचीत पर आधारित. डॉ प्रसाद 'जायसीकालीन भारत' के लेखक हैं.)
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