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'सेनाएं' तय करेंगी फ़िल्म की कहानी
- Author, शकील अख़्तर
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
राजस्थान के जयपुर में शुक्रवार को बॉलीवुड फ़िल्मकार संजय लीला भंसाली पर संस्कृति के कुछ कथित पहरेदारों ने हमला किया.
भंसाली जयपुर के जयगढ़ किले में अपनी नई फ़िल्म 'पद्मावती' की शूटिंग कर रहे थे, जब करणी सेना नाम के एक समूह के कार्यकर्ताओं ने उन पर हमला किया.
फ़िल्म 'पद्मावती' चितौड़गढ़ की रानी पद्ममिनी की कहानी है.
भंसाली ने शुक्रवार को कहा था कि उन पर हमला किया गया है. सेना के कार्यकर्ताओं ने सेट पर मौजूद कैमरा और अन्य चीज़ों को भी तोड़ा.
सेना का आरोप है कि फ़िल्म के एक दृश्य में दिल्ली सल्तनत के बादशाह अलाउद्दील खिलजी को अपने सपने में रानी पद्मिनी को प्रेम करते दिखाया गया है.
सेना का दावा है कि भंसाली ने अपनी फ़िल्म में इतिहास के तोड़ मरोड़ कर पेश किया है. सेना के अनुसार किले पर अलाउद्दीन के हमले की बात सुन कर रानी पद्मिनी ने जौहर किया था और किले की अन्य महिलाओं के साथ आग में कूद कर जान दे दी थी.
इससे पहले आशुतोष गोवारिकर की फ़िल्म 'जोधा अकबर' के ख़िलाफ़ भी प्रदर्शन किए गए थे. साल 2014 में सेना के कार्यकर्ताओं ने टेलीविज़न सीरियल के ख़िलाफ़ टीवी चैनल के दफ्तर पर हमला किया था.
इससे पहले भंसाली ने मराठा पेशवा की एक मुस्लिम राजकुमारी के प्रेम की कहानी 'बाजीराव मस्तानी' बनाई थी. इस फ़िल्म पर भी कुछ लोगों ने आपत्ति जताई थी और कहा था कि फ़िल्म में पेशवा बाजीराव को ग़लत तरीके से पेश किया गया है जिससे उनकी भावनाएं आहत हुई हैं.
फ़िल्म संस्कृति के कथित पहरेदारों के पूरी कहानी पढ़ने के बाद ही इसकी शूटिंग शुरू हो सकी थी.
फ़िल्मों की बात करें तो फ़िल्में कोई गहरी बात पेश नहीं करती हैं, लेकिन इनकी पहुंच अधिक लोगों तक होती है.
ये मूल रूप से मनोरंजन के लिए बनाई जाती हैं लेकिन इनमें प्यार की जीत होता दिखाया जाता है, सहिष्णु बनने का पैग़ाम दिया जाता है. फ़िल्में नफ़रतों के ख़िलाफ़ होती हैं और लोगों पर एक सकारात्मक छाप छोड़ती हैं.
संस्कृति के कथित पहरेदार या कट्टरपंथी, हिंदू हो या मुसलमान, वो फ़िल्मों की इस सकारात्मकता से डरते हैं और फ़िल्मों के ख़िलाफ़ बातें करते हैं. मुस्लिम उलेमाओं ने तो ये भी कह दिया था कि फ़िल्में नहीं देखनी चाहिए.
बीते कुछ सालों से भारत में प्रेम, सहिष्णुता, वैज्ञानिक सोच पर काफी दबाव पड़ा है. साहित्य, कला या मीडिया- अभिव्यक्ति के सभी ज़रियों को कड़े प्रतिरोध का सामना करना पड़ा है.
कभी कहानी के नाम, कभी इतिहास के नाम पर तो कभी कलाकारों के धर्म या देश के नाम पर- फ़िल्मों पर भी दबाव बढ़ा है.
कट्टरपंथी संगठन प्रेस कांफ्रेस कर सार्वजनिक तौर पर फ़िल्मों को बेन करने की बात करते हैं, थिएटरों को धमकियां देते हैं और ऐसा नहीं है कि उन्हें राजनीतिक समर्थन हासिल नहीं.
फिलहाल फ़िल्म एकमात्र ऐसा ज़रिया है जो इन सभी कट्टरपंथी विचारों के सामने डट कर खड़ा है. फ़िल्म कोई समाज में बदलाव के लिए नहीं बनाई जाती, ये तो व्यवसाय के लिए बनाई जाती हैं.
व्यवसाय का ठप होना कोई फ़िल्म बर्दाश्त नहीं कर सकती. अगर फ़िल्म के ख़िलाफ़ प्रदर्शन लंबे समय तक होते रहे तो इसका असर उसके व्यवसाय पर पड़ता है और फ़िल्मों का यह ज़रिया भी मज़बूत नहीं रह पाएगा.
बीते साल एक कांफ्रेंस में बॉलीवुड के नामी गीतकार जावेद अख़्तर से किसी ने सवाल पूछा था कि क्या देश में असहिष्णुता बढ़ रही है.
इसके जवाब में जावेद अख़्तर ने कहा था, "ये तो मुझे नहीं पता लेकिन 1983 में बनी फ़िल्म 'जाने भी दो यारों' आज कोई बना नहीं पाएगा."
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