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'पिता ने किया था यौन उत्पीड़न’ कहने के बाद बोलीं खुशबू सुंदर: उतर गया सालों का बोझ
- Author, दिव्या जयराज
- पदनाम, बीबीसी तमिल
दक्षिण भारतीय सिनेमा की जानी मानी अभिनेत्री और भारतीय जनता पार्टी की नेता खुशबू सुंदर ने एक कार्यक्रम में कहा कि जब वो आठ साल की थीं, तब उनके पिता ने उनका 'यौन उत्पीड़न किया' था और उस वक़्त वो उनके ख़िलाफ़ 'कुछ नहीं कर सकी थीं.'
इस बयान के बाद उन्होंने बीबीसी तमिल से कहा, "बचपन में झेले गए यौन उत्पीड़न के बारे में बोलने के बाद ऐसा लग रहा है कि मेरे दिमाग़ पर जो सालों से बोझ था, वह उतर गया है."
बीते 12 साल से राजनीति में सक्रिय खुशबू बीते साल ही बीजेपी में शामिल हुई हैं. हाल ही में उन्हें राष्ट्रीय महिला आयोग का सदस्य बनाया गया है.
खुशबू सुंदर ने यौन उत्पीड़न का ज़िक्र 'मोजो स्टोरी' के कार्यक्रम 'वी द वीमन' में वरिष्ठ पत्रकार बरखा दत्त के साथ एक इंटरव्यू में किया है.
बचपन में किया गया यौन उत्पीड़न
इस इंटरव्यू में खुशबू ने कहा, "बचपन में यौन उत्पीड़न का सामना करने वाले लड़के, लड़की पर इसका लंबे समय तक असर बना रहता है. जब मैं आठ साल की थी, तब मेरे पिता ने ही मेरा यौन उत्पीड़न किया था. उन्होंने इसके बारे में किसी को बताने पर मां और भाइयों को मारने की धमकी दी थी. मैं किसी को नहीं बता पाई थी."
इस इंटरव्यू में अपने पिता के बारे में उन्होंने कहा, "पत्नी और बच्चों की पिटाई को वो अपना अधिकार समझते थे. अपनी बेटी का यौन उत्पीड़न करना भी उन्हें अधिकार लगता था. मेरी मां की शादीशुदा ज़िंदगी भयावह थी."
साहस दिखा पाएं तो...
खुशबू के मुताबिक़, जब वो 15 साल की हुईं तब उन्होंने पहली बार इस यौन उत्पीड़न के ख़िलाफ़ बोला था.
उन्होंने बताया, "15 साल की उम्र में इतना साहस आया था. पहले तो मैं अपनी मां को इसके बारे में बताने से हिचक रही थी, क्योंकि यह सवाल था कि क्या वह यक़ीन करेंगी? क्योंकि वह एक पतिव्रता पत्नी थीं. लेकिन मैंने अपने पिता के रवैये का विरोध करना शुरू किया और कहा कि मैं इसे अब और नहीं झेल सकती."
खुशबू सुंदर ने यह भी कहा, "छोटी बच्ची के तौर पर मेरा आत्मविश्वास हिल गया था और जब मैं 15 साल की हुई तब जाकर विरोध कर सकी. लेकिन एक बात स्पष्ट है कि एक महिला के तौर पर अगर हम अपने घर के मर्दों के ख़िलाफ़ खड़े होने का साहस दिखा पाएं तो हम इस दुनिया में किसी भी मुश्किल का सामना आसानी से कर सकते हैं."
सदमे से उबरने में कई साल लगे
खुशबू सुंदर के यौन उत्पीड़न की बात सार्वजनिक होने के बाद से देश भर में बाल यौन उत्पीड़न को लेकर चर्चा भी शुरू हो गई है.
खुशबू ने बीबीसी तमिल से कहा, "जब आठ साल की उम्र में किसी बच्ची का यौन उत्पीड़न हो तो उस उम्र में हम क्या कर सकते थे. यह क्रूर होता है. लेकिन अगर मैं आज इस पर बोल रही हूं तो स्पष्ट है कि मैं अब इस सदमे से उबर चुकी हूं. लेकिन इसमें कई साल लगे. यौन उत्पीड़न के शिकार लोगों की मन स्थिति के बारे में समझा जा सकता है."
खुशबू कहती हैं, "जब किसी का यौन उत्पीड़न होता है तो भले ही वह इस सदमे से उबर जाए लेकिन इसका प्रभाव जीवन भर बना रहता है."
खुशबू यौन उत्पीड़न को लेकर समाज की मानसिकता पर भी सवाल उठाती हैं.
उन्होंने कहा, "हमारे समाज में समस्या है, अगर कोई महिला यौन उत्पीड़न के बारे में बोलती है तो उससे कई सवाल पूछे जाने लगते हैं. जैसे कि तुमने ऐसा क्या किया था जिसके चलते उसने यौन उत्पीड़न किया? तुमने कैसे कपड़े पहने थे? तुम उस वक्त वहां क्यों गई थी? तुमने उससे क्या कहा था? लोग यौन उत्पीड़न करने वाले पुरुष के बारे में कोई सवाल नहीं पूछते."
उन्होंने ये भी बताया कि जब से उन्होंने अपने पिता के यौन उत्पीड़न करने की बात कही है तब से उनसे सोशल मीडिया पर लगातार सवाल पूछे जा रहे हैं.
उन्होंने एक प्रोफेसर का ज़िक्र करते हुए कहा, "उन्होंने ट्विटर पर पूछा है कि आपकी बातों के बाद क्या आपके पिता की ख़राब इमेज नहीं बनेगी? क्या आपके बच्चे अपने नाना के बारे में बुरा नहीं सोचेंगे? वो अभी भी पुरुषों की छवि के प्रति चिंतित है. यह समाज के पढ़े लिखे लोगों की सोच है."
'शर्मसार होने की ज़रूरत नहीं है'
खुशबू ने बीबीसी तमिल से कहा, "एक बात स्पष्ट करना चाहती हूं कि किसी भी पीड़ित को अपने अनुभव शेयर करने पर शर्म महसूसस करने की ज़रूरत नहीं है. असली शर्मिंदगी तो यौन उत्पीड़न करने वाले पुरुषों को होनी चाहिए. इसी उद्देश्य के साथ मैंने अपने अनुभव साझा किए हैं."
खुशबू सवाल करती हैं कि जब तक यौन उत्पीड़न करने वाले लोगों के बारे सार्वजनिक तौर पर बोला नहीं जाएगा, तब तक उन्हें सजा कैसे मिलेगी.
उन्होंने कहा, "आम धारणा है कि अगर बच्चों के यौन उत्पीड़न के बारे में बोला तो बच्चों का भविष्य ख़राब हो जाएगा. मैं तो 15 साल की उम्र से बोल रही हूं. तब से मैं अपना ख़र्च खुद उठा रही हूं, काम कर रही हूं और आज समाज में एक सम्मानजनक स्थिति में हूं. पिता के अपराध और उनका विरोध करने से मेरी ज़िम्मेदारियां और मेरा जीवन बहुत प्रभावित नहीं हुआ."
खुशबू ने अपने पिता के अंतिम दिनों के बारे में बताते हुए कहा, "उन्हें अपने किए की सजा मिली. जब उनका निधन हुआ तो मेरे भाइयों ने उनके अंतिम संस्कार तक में हिस्सा नहीं लिया. वे लावारिस जैसे ही थे. इसी को कर्म का फल कहते हैं."
तमाम माता-पिता से खुशबू अपील करती हैं कि बच्चों के साथ यौन उत्पीड़न की जानकारी मिलने पर वो तुरंत पॉक्सो एक्ट के तहत मुक़दमा दर्ज कराएं. वो कहती हैं कि आजकल सोशल मीडिया से लेकर सिविल सोसायटी की संगठनों तक से मदद मिलती है.
उन्होंने कहा, "इतने सालों बाद मैं इतना साहस जुटा पायी कि यौन उत्पीड़न के ख़िलाफ़ बोल सकूं. मेरे बच्चों ने मुझे यह साहस दिया है. मेरे पति ने मेरी सहायता की है. मुझे जिस तरह की सहायता मिली है, वैसी सहायता सबको मिलेगी, ऐसा मैं नहीं कहती. लेकिन अब समय बदल रहा है, इसलिए समाज में भी ऐसे अपराध और उसको लेकर व्याप्त सोच में बदलाव होना चाहिए."
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