बिहार: रामचरितमानस विवाद क्या 'मंडल' बनाम कमंडल' की वापसी का संकेत है?

    • Author, चंदन कुमार जजवाड़े
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, पटना से

बिहार के शिक्षा मंत्री प्रोफ़ेसर चंद्रशेखर ने रामचरितमानस पर एक बार फिर से बयान दिया है. उनके बयान के बाद बिहार में रामचरितमानस पर दोबारा सियासी घमासान शुरू हो गया है.

बिहार के शिक्षा मंत्री चंद्रशेखर ने कहा है, "मैंने जो कह दिया उस पर किसी के मुंह में ज़ुबान नहीं थी."

चंद्रशेखर का कहना है कि कोई इस मुद्दे को विधानसभा में उठाए तो वो जवाब देने को तैयार हैं.

चंद्रशेखर ने बिहार विधानसभा के बजट सत्र के दूसरे दिन यानी मंगलवार को विधानसभा परिसर में पत्रकारों से बातचीत के दौरान कहा, 'शूद्र पहले पढ़ा लिखा नहीं था, उसे पढ़ने की मनाही थी.'

उनके मुताबिक़, 'शूद्र अब पढ़ लिख गया है तो आपत्तिजनक, अपमानजनक बातों को आशीर्वाद और अमृत कैसे मान लेगा.'

महागठबंधन में मतभेद

चंद्रशेखर का कहना है अभी उन्होंने रामचरितमानस के कुछ ही दोहों पर सवाल उठाए हैं.

उन्होंने कहा है, "मैं यह मानता हूं, जैसा डॉक्टर लोहिया ने कहा है कि कुछ कचरे हैं रामचरितमानस में मगर कचरा हटाने में मोती मत फेंकना."

चंद्रशेखर के ताज़ा बयान के बाद बिहार में महागठबंधन के अंदर ही बयानबाज़ी शुरू हो गई है. जेडीयू विधायक संजीव सिंह ने यहां तक कहा दिया है कि चंद्रशेखर को 'दिमाग़ का इलाज़ कराने की ज़रूरत' है.

उनका कहना है, "अगर चंद्रशेखर को इतनी ही तकलीफ़ है तो हिन्दू धर्म को छोड़कर दूसरा धर्म अपना लें. ये हमारी सहनशीलता को हमारी कमज़ोरी समझ रहे हैं. कोई भी मंत्री हमारे धर्म के बारे में अनाप शनाप बोलेंगे तो ये बर्दाश्त के बाहर होगा."

यानी बिहार सरकार के एक मंत्री के बयान के बाद महागठबंधन की प्रमुख साझेदार पार्टियों के बीच ही ज़ुबानी जंग एक बार फिर से तेज़ हो गई है. इसमें एक तरफ आरजेडी है, जिसके कोटे से चंद्रशेखर को मंत्री बनाया गया है तो दूसरी तरफ जेडीयू है.

वहीं बिहार में विपक्षी भारतीय जनता पार्टी ने भी इस मुद्दे पर चंद्रशेखर और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार दोनों पर निशाना साधा है.

जेडीयू भले ही अब बीजेपी से अलग होकर आरजेडी के साथ आ गई है लेकिन शिक्षा मंत्री के मुद्दे पर दोनों की राय एक जैसी है.

बिहार बीजेपी के अध्यक्ष संजय जायसवाल का कहना है, "चंद्रशेखर मानसिक रूप से असंतुलित व्यक्ति हैं. दरअसल जो जैसा होता है, वो (रामचरितमानस की) वैसी ही व्याख्या करता है."

'नीतीश को हटाने का दांव'

संजय जायसवाल का दावा है कि आरजेडी नीतीश कुमार की हालत ऐसी कर देना चाहती है कि वो उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव को सत्ता सौंपकर भाग जाएं.

उनका कहना है, "नीतीश कुमार ख़ुद तेजस्वी से बड़े चिपकू हैं. वो गालियां खाएंगे, बात सुनेंगे, पार्टी और बिहार की भद पिटवाएंगे लेकिन कुर्सी नहीं छोडेंगे."

इससे पहले जनवरी महीने में भी बिहार के शिक्षा मंत्री चंद्रशेखर के बयान के बाद बिहार में बड़ा सियासी बवाल खड़ा हो गया था. इस मुद्दे पर बिहार के महागठबंधन में भी दरार देखी गई थी.

जेडीयू ने उस वक़्त भी खुलेआम चंद्रशेखर के बयान का विरोध किया था. जेडीयू के प्रवक्ता नीरज कुमार ने राजधानी पटना एक मंदिर में मानस पाठ कर सार्वजनिक तौर पर चंद्रशेखर के बयान का विरोध किया था.

चंद्रशेखर ने उस वक़्त पटना में एक दीक्षांत समारोह में छात्रों को संबोधित करते हुए रामचरितमानस की कुछ चौपाइयों का हवाला देते हुए उसे नफ़रत फैलाने वाला ग्रंथ बताया था.

उनके इस बयान के बाद बिहार में विपक्षी बीजेपी और उससे जुड़े संगठनों ने कई शहरों में विरोध प्रदर्शन कर शिक्षा मंत्री को हटाने की मांग की थी.

वहीं जेडीयू के अध्यक्ष ललन सिंह ने भी कहा था कि शिक्षा मंत्री को हटाने की ज़िम्मेदारी आरजेडी की है. यानि जेडीयू के बड़े नेता भी शिक्षा मंत्री के बयान के विरोध में खड़े थे. उस समय मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को भी इस मुद्दे पर बयान देना पड़ा था.

नीतीश ने साफ़ शब्दों में कहा था, "हम लोगों का मानना है कि किसी भी धर्म के मामले में कोई विवाद नहीं करना चाहिए. लोग जिस तरह के धर्म का पालन करते हैं, धर्म का पालन करें. इस पर किसी तरह का हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए."

चंद्रशेखर लगातार तीसरी बार आरजेडी के टिकट पर मधेपुरा से विधानसभा पहुंचे हैं. वो बिहार में महागठबंधन की पिछली सरकार में आपदा प्रबंधन मंत्री भी बनाए गए थे.

मधेपुरा में अपने विधानसभा क्षेत्र में चंद्रशेखर इस तरह के बयान कई बार देते रहे हैं. सवाल यह भी है कि रामचरितमानस पर महागठबंधन में दरार दिखने का बाद भी शिक्षा मंत्री क्यों इस मुद्दे को बार बार उठाते हैं?

मंडल और कमंडल की राजनीति

वरिष्ठ पत्रकार कन्हैया भेलारी कहते हैं, "यह सब दिखाने के लिए है. मुझे लगता है कि नीतीश कुमार भी चाहते हैं कि बिहार में मंडल को कमंडल से बाहर निकाला जाए. बिहार में आगे की राजनीति 'मंडल' और 'कमंडल' पर ही होगी."

दरअसल बिहार की राजनीति में जातीय समीकरण एक अहम मुद्दा माना जाता है. यहां मंडल आयोग की सिफ़ारिशों के समर्थन और विरोध की राजनीति का पुराना इतिहास रहा है.

बिहार में आरजेडी के पास मुस्लिम-यादव का एक बड़ा वोट बैंक माना जाता है. आरजेडी अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव शुरू से ही मंडल और आरक्षण के समर्थन की राजनीति करते रहे हैं.

बीते शनिवार को लालू बिहार के पूर्णिया में हुई महागठबंधन की रैली में वीडियो कांफ्रेंसिंग के ज़रिए शामिल हुए थे. वहां लालू ने आरएसएस के एमएस गोलवरकर की किताब 'बंच ऑफ़ थॉट्स' का हवाला देते हुए कहा था कि इस पुस्तक में आरक्षण को ख़त्म करने की वकालत की गई है.

दूसरी तरफ नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू भी 'लव-कुश' समीकरण को साधने की कोशिश में होती है. नीतीश कुमार कुर्मी, कुशवाहा और अन्य पिछड़ी जातियों के वोटरों को ख़ास महत्व देते रहे हैं.

वहीं बीजेपी पर आमतौर पर सवर्ण जातियों की पार्टी होने का आरोप लगाया जाता है. जबकि बिहार में क़रीब 80 फ़ीसदी वोटर सवर्ण नहीं हैं. ऐसे में मंडल को लेकर किसी भी ध्रुवीकरण का फ़ायदा आरजेडी जैसी पार्टी को हो सकता है.

कन्हैया भेलारी का दावा है कि बिहार में भविष्य में आरजेडी और बीजेपी, दो ही पार्टियों के बीच राजनीति होगी और शायद 2025 तक यहां जेडीयू भी ख़त्म हो जाए. इसलिए शिक्षा मंत्री के ऐसे बयानों को अंदर से आरजेडी के बड़े नेताओं का समर्थन हो सकता है.

कन्हैया भेलारी के इन दावों को जनवरी महीने में प्रोफ़ेसर चंद्रशेखर के बयान के बाद मचे घमासान के बाद महसूस भी किया गया था.

दरअसल पिछले महीने रामचरितमानस पर चंद्रशेखर के बयान के बाद महागठबंधन ही नहीं आरजेडी में भी मतभेद दिखने लगा था.

आरजेडी के प्रदेश अध्यक्ष जगदानंद सिंह ने प्रोफेसर चंद्रशेखर का समर्थन किया था तो आरजेडी के ही नेता शिवानंद तिवारी ने उस वक़्त चंद्रशेखर और जगदानंद सिंह का ही विरोध किया था.

लेकिन बाद में आरजेडी नेता और उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव चंद्रशेखर के साथ खड़े हो गए थे. तेजस्वी यादव के समर्थन के बाद शिक्षा मंत्री ने कहा था कि वो अपने बयान पर कायम हैं.

पटना के एएन सिन्हा इंस्टीट्यूट के प्रोफ़ेसर विद्यार्थी विकास भी इसे 'मंडल' और 'कमंडल' की राजनीति से जोड़कर देखते हैं. उनका कहना है कि 1990 के दशक में मंडल की राजनीति को जैसा समर्थन मिला था, उसे आज धार्मिक उन्माद ने दबा दिया है.

विद्यार्थी विकास का मानना है कि भारत में वैज्ञानिक सोच पर धार्मिक सोच बहुत हावी है. लोगों को इस उन्माद में अपनी ग़रीबी और बेराज़गारी तक की चिंता नहीं है.

उनका कहना है कि चंद्रशेखर के बयान से लोग धर्म के नाम पर एकजुट हो सकते हैं, लेकिन इसके उलट लोग उन पुस्तकों को पढ़ें और ख़ुद सच्चाई जानने की कोशिश करें, ऐसा भी हो सकता है.

विद्यार्थी विकास कहते हैं, "पिछली बार बिहार के शिक्षा मंत्री के बयान के बाद सोशल मीडिया पर जिस तरह की बहस हुई थी, वो बताता है कि अब पिछड़ी जातियों के लोग भी पढ़ लिख रहे हैं."

उनके मुताबिक़ महागठबंधन को लगता होगा कि पिछड़े वर्ग की नई पीढ़ी विवादास्पद दोहों को ख़ुद पढ़ेगी और और देखेगी कि इसमें क्या कहा गया है तो 'कमंडल' के ख़िलाफ़ 'मंडल' की राजनीति करने वाले महागठबंधन को इसका फ़ायदा हो सकता है.

इस मुद्दे पर फ़िलहाल आरजेडी की तरफ से कोई बयान नहीं मिल पाया है. हालांकि पिछली बार चंद्रशेखर के बयान के बाद पार्टी चंद्रशेखर के साथ खड़ी नज़र आ रही थी.

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