2019 में मंडल-कमंडल महा-मुक़ाबला पार्ट-2 होगा?

    • Author, राजेश प्रियदर्शी
    • पदनाम, डिजिटल एडिटर, बीबीसी हिंदी

25 सितंबर 1990 को गुजरात के सोमनाथ मंदिर में पूजा करने के बाद विपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवाणी जिस 'राम रथ' को लेकर देश भर की यात्रा पर निकले थे, उस पर काली दाढ़ी वाले एक व्यक्ति भी सवार नज़र आते थे.

आडवाणी के रथ पर सवार वही स्वयंसेवक करीब 24 साल के सियासी सफ़र के बाद 2014 में भारत के प्रधानमंत्री बने.

नरेंद्र मोदी तब आडवाणी के रथ पर सवार थे, लेकिन अब वे सत्ता के शीर्ष पर हैं, इसलिए रथ पर सवारी की ज़िम्मेदारी अभिभावक संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने संतों-महंतों को सौंप दी है.

वैसे भी अयोध्या का आंदोलन विश्व हिंदू परिषद चलाती रही है. सिर्फ़ अगस्त 1990 से 6 दिसंबर 1992 तक आडवाणी ने इसकी कमान संभाली थी.

सितंबर 1990 में आडवाणी की रथ यात्रा शुरू होने से एक महीने पहले देश में एक और बड़ी घटना हुई थी, अगस्त महीने में तब के प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने अन्य पिछड़े वर्गों को आरक्षण देने की मंडल आयोग की सिफ़ारिशों को लागू करने का ऐलान किया था. दस साल धूल खा रही बीपी मंडल की रिपोर्ट ने राजनीति में भूचाल ला दिया.

वीपी सिंह की राष्ट्रीय मोर्चा सरकार दो बैसाखियों पर टिकी थी, एक ओर वामपंथी और दूसरी ओर, भारतीय जनता पार्टी, दोनों उनकी सरकार को बाहर से समर्थन दे रहे थे.

मंडल आयोग की सिफ़ारिशें लागू करने की वीपी सिंह की घोषणा ने बीजेपी को सकते में डाल दिया, लेकिन बीजेपी ने राजीव गांधी की तरह तत्काल प्रतिक्रिया नहीं दी.

बीजेपी के नेता देश की राजनीति में जाति की पेचीदगियों को समझते हैं, और तब भी समझते थे. राजीव गांधी ने तो वीपी सिंह की तुलना जिन्ना से करते हुए, मंडल आयोग की सिफ़ारिशों का ज़ोरदार विरोध किया.

लेकिन मंडल आयोग की सिफ़ारिशों के दूरगामी राजनीतिक असर की काट के लिए बीजेपी ने 'हिंदू एकता' का नारा देते हुए राम मंदिर का आंदोलन तेज़ कर दिया.

1990 के अंतिम चार महीनों में मंडल विरोध और मंदिर आंदोलन से पूरे देश का राजनीतिक माहौल गरम गया.

पांच हफ़्ते तक 'बाबर की औलादों' को धमकाते हुए, हर दिन अलग-अलग जगहों पर छह जनसभाएं करते हुए, तनावपूर्ण सांप्रदायिक माहौल में जब आडवाणी का रथ बिहार पहुंचा, तो सिर्फ़ 8 महीने पहले मुख्यमंत्री बने लालू यादव ने उन्हें सिंचाई विभाग के मसानजोर गेस्ट हाउस में बंद करा दिया.

जनता दल के नेता लालू यादव की इस कार्रवाई का असर ये हुआ कि बीजेपी ने वीपी सिंह की सरकार से समर्थन वापस ले लिया, बहुमत खोने के बाद नवंबर 1990 में उन्हें इस्तीफ़ा देना पड़ा.

नौ नवंबर 1990 को वीपी सिंह ने कहा कि वे सामाजिक न्याय के पक्ष में, और सांप्रदायिकता के ख़िलाफ़ लड़ाई में अपनी गद्दी कुर्बान कर रहे हैं.

मार्के की बात ये है कि बीजेपी ने मंडल आयोग की सिफ़ारिशों के विरोध में वीपी सिंह सरकार से समर्थन वापस लेने की बात तो दूर, कभी उसका खुलकर विरोध भी नहीं किया, बल्कि हमेशा ही जातियों में बंटे समुदायों को हिंदू धर्म के नाम पर जोड़ने की राजनीति की, जो मुसलमानों की बात किए बिना पूरी नहीं हो पाती.

इसी टकराव को मीडिया ने मंडल बनाम कमंडल का नाम दिया, कई सालों तक सतह के नीचे दबे रहने के बाद यह टकराव एक बार फिर उभरता दिख रहा है जो 2019 के चुनाव में ज़ोरदार ढंग से सामने आ सकता है.

इन दो धाराओं का टकराव ज़रूर होगा, भले मोदी अभी राम मंदिर के मुद्दे पर आक्रामक नहीं हैं लेकिन आगे-आगे देखिए होता है क्या. मंदिर के मामले को गरमाने का काम अभी संघ के दूसरे सिपाही कर रहे हैं.

मोदी अभी दूसरी 'दवाइयों' का असर परखेंगे उसके बाद ज़रूरत के हिसाब से अयोध्या अस्त्र का इस्तेमाल करेंगे.

वैसे इस चुनाव में नरेंद्र मोदी खुद अयोध्या से कम बड़ा मुद्दा नहीं हैं.

हिंदुत्व बनाम सामाजिक न्याय के टकराव के समानांतर, एक और टकराव साफ़ देखने को मिलेगा. वह होगा मोदी बचाओ बनाम मोदी हटाओ.

अयोध्या आंदोलन के दोबारा तेज़ होने के मायने

'हर हाथ को काम', 'किसानों को सही दाम', 'सबका साथ, सबका विकास', 'विश्वास है, हो रहा विकास है' से लेकर 'सच्ची नीयत, सही विकास'...जैसे कई नारों से गुज़रते हुए, इस वक्त बीजेपी का सबसे ज़ोरदार नारा है-'मंदिर वहीं बनाएंगे'.

यानी युवा देश कहे जाने वाले भारत में आज भी वही मुद्दे हैं जो 30 साल पहले थे, भ्रष्टाचार, बेरोज़गारी और ग़रीबी अल्पविराम की तरह आते-जाते रहे. शिक्षा, स्वास्थ्य और पानी जैसे अहम सवाल कभी मुद्दा ही नहीं बन पाए.

धर्म की राजनीति करने वाली बीजेपी दूसरे पक्ष को जातिवादी बताती है, जबकि दूसरा पक्ष खुद को सामाजिक न्याय का पक्षधर और बीजेपी को सांप्रदायिक बताता है.

मोटे तौर पर ये दो धाराएं हैं, एक धारा गांधी-आंबेडकर-जेपी-लोहिया से प्रेरणा लेने की बात करती है, तो दूसरी धारा शिवाजी, राणा प्रताप से होते हुए, भगवान राम की शरण में जाती है.

हिंदूवादी धारा का आग्रह है कि सब हिंदू हैं और सभी हिंदू अच्छे हैं, उन्हें एकजुट होना चाहिए, अपने हिंदू होने पर गर्व करना चाहिए, अतीत की ओर लौटना चाहिए जो गौरवशाली था, सारी गड़बड़ी की जड़ में विदेशी, और ख़ास तौर पर मुसलमान हैं, वे ग़ैर हैं, हम एक हैं.

इसी का विस्तार हिंदू राष्ट्र है, जिसे उसके विरोधी बहुसंख्यक वर्चस्ववादी हिंदू वोट बैंक बनाने की कोशिश कहते हैं.

दूसरी तरफ़, वे लोग हैं जो सामाजिक न्याय, बराबर हिस्सेदारी, आरक्षण, सामाजिक सशक्तीकरण और धर्मनिरपेक्षता की बात करते हैं.

इन पर जातिवादी, मुसलमान परस्त और हिंदू विरोधी होने के आरोप लगते हैं. भ्रष्टाचार और वंशवाद के मामले में भी उनका ट्रैक रिकॉर्ड काफ़ी बुरा है.

दोनों की अच्छाई-बुराई का फ़ैसला समय, इतिहास और जनता के हाथों में है लेकिन ये ऐसी परस्पर विरोधी धाराएं हैं जो भारतीय समाज के अनसुलझे सवालों का भावनात्मक दोहन करने के अलावा कुछ नहीं करतीं, और ये सवाल बने रहें, यह भी उनकी मंशा रहती है.

यही वजह है कि भारत 30 साल बाद मंडल बनाम कमंडल की फ़िल्म का सीक्वल देखने को मजबूर है.

मंदिर बनाने की बात करने वालों और पिछड़ों को न्याय दिलाने का नारा लगाने वालों, दोनों ने खांटी सत्ता की राजनीति की है, और कुछ नहीं.

2019 के चुनाव में मंडल-कमंडल

बीजेपी अयोध्या सहित सभी धार्मिक प्रतीकों को आगे करके, भजन-कीर्तन-हवन-पूजन के रास्ते चुनाव प्रचार करेगी और जनता को बताएगी कि हिंदू देश में राम मंदिर बनाने की वो कितनी ज़ोरदार कोशिश कर रही है, और इस महान कार्य में कौन-कौन से लोग, कैसी-कैसी बाधाएं उत्पन्न कर रहे हैं.

2019 के आम चुनाव में अभी समय है, और तब तक क्या-क्या होगा, यह कहना मुश्किल है, लेकिन अयोध्या में राम मंदिर का मुद्दा बीजेपी का सबसे बड़ा हथियार है, और मजबूरी भी.

मजबूरी इसलिए क्योंकि विकास और भ्रष्टाचार के विरोध की हवा निकल चुकी है. विकास का जवाब बेरोज़गारी के आंकड़े और भ्रष्टाचार रोकने के दावे का जवाब नीरव मोदी हैं.

सरकार के सामने एक और दिक्कत है कि आम लोगों को नोटबंदी, और व्यापारी वर्ग को जीएसटी जैसी दिक्कतें देने के बाद, अंतिम छह महीने की मामूली रियायतों से वोटरों का मन शायद नहीं बदलने वाला.

इन सबसे बड़ी बात ये है कि बीजेपी जातियों के समीकरण को अच्छी तरह समझने और भरसक पूरी तरह साधने के बाद भी, हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण पर ही सबसे ज़्यादा भरोसा करती है.

इसकी मिसाल, उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव हैं, जब दो-चार प्रतिशत वोट वाली जाति आधारित कई पार्टियों से गठबंधन करने के बावजूद, प्रचार के अंतिम दौर में श्मशान-कब्रिस्तान, ईद-दिवाली वाला कार्ड खेलना ज़रूरी समझा गया.

रामविलास पासवान, उपेंद्र कुशवाहा और अनुप्रिया पटेल जैसे जाति प्रतिनिधि नेताओं को इतनी अहमियत देने के पीछे बीजेपी की सोशल इंजीनियरिंग की नीति काम करती है लेकिन वह सपा-बसपा-आरजेडी की तरह उसका ट्रंप कार्ड नहीं है. उसका ट्रंप कार्ड तो उग्र हिंदुत्व ही है.

यही वजह है कि बिहार विधानसभा चुनाव में भी तमाम तरह के जतन के करने के बाद भी, चौथे चरण की वोटिंग से पहले अमित शाह को "हम हारे तो पाकिस्तान में पटाखे फूटेंगे" जैसे जुमले का ही सहारा लेना पड़ा.

बीजेपी ने एससी-एसटी ऐक्ट में सुप्रीम कोर्ट के संशोधन को संसद के ज़रिए बदलकर, सवर्ण समर्थकों की भारी नाराज़गी मोल लेकर, यही जताने की कोशिश की है कि वह दलितों-पिछड़ों की विरोधी पार्टी नहीं है, जैसा विपक्षी दल उसके बारे में कहते हैं.

2018 में, और ख़ास तौर पर अंतिम दो महीनों में जैसी चर्चाएं चल रही हैं, उससे यही लगता है कि 2019 के चुनाव में बीजेपी चाहेगी कि राम मंदिर, एनसीआर, मुसलमान और पाकिस्तान जैसे दूसरे कई मुद्दों पर ऐसा माहौल बन सके कि वोटर को अपना धर्म याद रहे और जाति भूल जाए.

लेकिन जैसा कि शरद यादव बार-बार कहते हैं, "कमंडल की काट सिर्फ़ मंडल है". लालू, मायावती, अखिलेश, ममता, चंद्रबाबू नायडू जैसे नेताओं की सामाजिक न्याय की अपील में कितना असर होगा यह देखने वाली बात होगी.

वैसे तो 30 सालों में कुछ खास नहीं बदला, लेकिन पिछले साढ़े चार साल में एक बात ज़रूर बदली है, वह यह है कि कांग्रेस सहित सभी पार्टियां मुसलमानों के हक और हितों की बात करने या सेक्युलर राजनीति का नाम लेने से घबराने लगी हैं. राहुल गांधी मंदिर जा रहे हैं और जनेऊ दिखा रहे हैं, ममता ब्राह्मण सम्मेलन करा रही हैं.

2019 के मंडल-कमंडल पार्ट-2 में यही एक नई बात होगी कि मंडल वाले सेकुलरिज़्म का नारा नहीं लगा रहे होंगे. इसे अच्छी बात या बुरी बात समझना, आपकी समझ पर है.

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