You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
ब्लॉग: धर्म की ढाल के पीछे खड़े 'विकास पुरुष' मोदी
- Author, राजेश प्रियदर्शी
- पदनाम, डिजिटल एडिटर, बीबीसी हिंदी
ललाट पर त्रिपुंड सजाए नरेंद्र मोदी ने 40 मिनट का राजनीतिक भाषण देने से पहले जयकारा लगवाया. उन्होंने माइक पर आते ही कहा, पूरी ताकत से बोलिए, "जय-जय केदार, जय-जय बाबा भोले."
केदारनाथ मंदिर के बाहर से उन्होंने बताया कि वे बाबा भोलेनाथ के बेटे हैं, बाबा ने उन्हें वहाँ बुलाया है, ठीक वैसे ही जैसे बनारस के चुनाव से ठीक पहले गंगा मैया ने बुलाया था.
नरेंद्र मोदी कोई संन्यासी नहीं हैं, वे एक महत्वाकांक्षी राजनीतिक नेता हैं.
मोदी ने अपने भाषण में याद दिलाया कि गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर उन्होंने जून 2013 में प्राकृतिक आपदा के बाद केदारनाथ मंदिर के मरम्मत की पेशकश की थी लेकिन तब कांग्रेस सरकार ने उन्हें ऐसा करने से रोक दिया था.
उन्होंने कहा, "भोले बाबा चाहते हैं कि यह काम उनके इसी बेटे को हाथों हो" यानी गुजरात के सीएम को उत्तराखंड में सेवा करने से रोका गया तो भोले बाबा ने उन्हें पीएम बना दिया.
हिंदू धर्म के प्रधान-रक्षक
पहले विकास के वादों और अब उसके दावों में उलझे प्रधानमंत्री, ख़ुद को हिंदू धर्म के प्रधान-रक्षक और शीर्ष-सेवक के रूप में पेश करने का कोई मौक़ा नहीं चूक रहे.
वे इस बात का भरपूर ध्यान रखते हैं कि उनकी हर भाव-भंगिमा, पहनावे और भाषण में हिंदू पवित्रता की सुगंधि व्याप्त हो.
उनके कार्यकाल के पहले दो सालों में 'मेक इन इंडिया', 'स्मार्ट सिटी', 'डिजिटल इंडिया' और 'स्किल इंडिया' की जैसी धूम थी, वैसा ही उत्साह अब चारधाम यात्रा, शंकराचार्य प्रकटोत्सव, नर्मदा सेवा यात्रा और मंजूनाथ स्वामी के दर्शन करने में दिख रहा है.
इसकी वजह समझना आसान है, विकास की कहानी को आंकड़ों का सामना करना पड़ता है जबकि धार्मिक प्रवचन में तर्क-तथ्य विघ्न नहीं डाल सकते.
धर्म और राजनीति का घालमेल
ऐसा नहीं है कि राजनीति में धर्म के घालमेल का फॉर्मूला नरेंद्र मोदी का आविष्कार हो, यहाँ तक कि महात्मा गांधी ने अपनी अपील का दायरा बड़ा रखने के लिए धार्मिक कथाओं और प्रेरक प्रसंगों का सहारा लिया, अँगरेज़ों के ख़िलाफ़ लड़ाई में मुसलमानों को साथ रखने के लिए उन्होंने ख़िलाफ़त आंदोलन का समर्थन किया जिसके लिए आज तक उनकी आलोचना होती है.
नेहरू ने धर्म और राजनीति को भरसक अलग रखा लेकिन उनकी बेटी इंदिरा गांधी कभी जनसंघ के दबाव में और कभी जनभावनाओं का दोहन करने के लिए, बाबाओं के चरण छूतीं या रूद्राक्ष की माला पहने काशी विश्वनाथ के ड्योढ़ी पर फोटो खिंचवाती नज़र आईं.
अयोध्या में राम जन्मभूमि का ताला खुलवाने, कट्टरपंथी नेताओं के दबाव में विधवा मुसलमान औरतों को अदालत से मिले इंसाफ़ को पलटने और बनारस में नाव पर तिलक लगाकर गंगा मैया की जय-जयकार करने वाले राजीव गांधी ही थे.
लेकिन नरेंद्र मोदी का दौर अलग है जिसमें सोशल मीडिया है, बीसियों टीवी चैनल हैं जो सीधा प्रसारण दिखाते हैं और वे उस संस्था से जुड़े हैं जिसका घोषित लक्ष्य भारत को हिंदू राष्ट्र बनाना है इसलिए दूसरे नेताओं के मुक़ाबले भारतीय लोकतंत्र को भगवा रंगना उनके लिए वैचारिक प्रतिबद्धता भी है, दूसरों के लिए ये केवल अवसरवादिता थी.
हिंदू पहचान की राजनीति
ज़ाहिर है, बहुत सारे लोगों को यह सब सुहावना लग रहा है, पीएम और उनके रणनीतिकारों का आकलन है कि इस देश की बहुसंख्यक हिंदू आबादी से 'हर हर महादेव' के साथ-साथ 'हर हर मोदी' का जयघोष करवाना संभव है, बस इसके लिए मोदी की हिंदू पहचान को लगातार पुख्ता करते रहना ज़रूरी है.
इसका सबसे बड़ा फ़ायदा ये है कि जो उनकी इस राजनीतिक शैली से असहमति प्रकट करेंगे उन्हें हिंदू-विरोधी साबित करने में कोई दिक्कत नहीं होगी. मोदी अपनी हार को हिंदू धर्म की हार और अपनी जीत को हिंदू धर्म की जीत में तब्दील करने में जुटे हैं.
पीएम मोदी को भी पूजा करने का अधिकार
मंदिर से राजनीतिक भाषण दे रहे मोदी को टोकने का सियासी जोखिम कोई नहीं उठाना चाहता, बल्कि राहुल गांधी भी मंदिरों के दर्शन करने के मौक़े खोज रहे हैं.
अखिलेश यादव हवन की तस्वीरें ट्वीट कर रहे हैं और लालू यादव के बेटे राजनीतिक रैली में शंख बजा रहे हैं.
किसी को कोई पूजा-पाठ, भजन-कीर्तन, दान-हवन करने से नहीं रोक सकता, किसी आम नागरिक की तरह पीएम मोदी को भी भारत का संविधान अपने धर्म का पालन करने का मौलिक अधिकार देता है, लेकिन ये सारी गतिविधियाँ क्या वे व्यक्तिगत श्रद्धा-आस्था के वशीभूत होकर कर रहे हैं? भोले बाबा के बेटे इतने भोले तो नहीं हैं.
उनके मंदिरों में माथा टेकने और आरती उतारने का टीवी पर लाइव प्रसारण व्यक्तिगत आस्था का मामला नहीं, बल्कि छवि और माहौल बनाने, विरोध की गुंजाइश ख़त्म करने का प्रयास है. जब तक अखंड पाठ चलता रहेगा, आरती होती रहेगी तब तक कोई दूसरी बात कैसे छेड़ पाएगा. मसलन, रोज़गार और विकास की बात.
देश का माहौल इतना बदल चुका है कि अब संविधान का हवाला देते हुए यह याद दिलाना फिज़ूल है कि 'सेकुलर डेमोक्रेटिक रिपब्लिक' के पीएम का ऐसा करना ठीक नहीं है क्योंकि इस देश में दूसरे धर्मों को मानने वाले करोड़ों लोग रहते हैं. ऐसे कहने वाले व्यक्ति को 'सिकुलर' या हिंदू विरोधी या वामपंथी कहकर तुरंत ख़ारिज कर दिया जाएगा.
और इसके लिए बहुत हद तक ज़िम्मेदार हैं सेकुलरिज्म के झंडाबरदार ज़िम्मेदार हैं, वामपंथियों को छोड़कर लालू, मुलायम और ममता जैसे हर नेता पर भ्रष्टाचार या जातिवाद या फिर दोनों के पक्के दाग़ हैं.
अब इस मासूम सवाल का जवाब देने की कोशिश कि इसमें आख़िर ग़लत क्या है?
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शीर्ष नेता मोहन भागवत ने एक बार फिर दोहराया है कि 'हिंदुस्तान' हिंदुओं का देश है, जैसे जर्मनी जर्मनों का और ब्रिटेन ब्रितानियों का. हालाँकि, इसके साथ उन्होंने जोड़ा है कि उसमें ग़ैर-हिंदुओं के लिए भी जगह है. इस 'भी' में निहित है कि हिंदुओं के बाद, उनके बराबर नहीं.
आरएसएस के नेता अक्सर कहते हैं कि जो भी भारत में रहता है वह हिंदू ही है, फिर वे ये भी कहते हैं कि भारत की पहचान हिंदू संस्कृति से है इसलिए इस देश को हिंदू रीति-नीति से चलाया जाना चाहिए, और ये भी कि सेकुलर डेमोक्रेसी एक विदेशी अवधारणा है जिसे बदला जाना चाहिए.
अगर पीएम मोदी 'जय जय केदार, जय जय भोलेनाथ' के उद्घोष कर रहे हैं तो मुसलमानों को भी पूरे उत्साह के साथ इसमें शामिल होना चाहिए. अगर वे पीएम के इस रवैए की वजह से एलिनियेटेड या किनारे कर दिया गया महसूस करते हैं तो यह उनकी ग़लती है, ये देश हिंदुओं का है और उन्हें भारतीय (हिंदू) संस्कृति को अपनाकर यहाँ रहना चाहिए वर्ना उनका भारतीय होने का दावा ही झूठा है, उनकी आस्था इस देश में है ही नहीं.
पिछले दिनों किसी ने फ़ेसबुक पर लिखा कि एक थाने के आधिकारिक फ़ोन का रिंगटोन है--'जय जय अंबे दुखहरनी...', एक व्यक्ति जो हिंदू नहीं है उसे ये रिंगटोन सुनकर भक्ति भाव से झूम उठना चाहिए और आश्वस्त हो जाना चाहिए थानेदार जी उसका कल्याण करेंगे?
पाकिस्तानी खिलाड़ियों के नेट प्रैक्टिस के दौरान नमाज़ पढ़ने और राष्ट्रपति के हर भाषण की शुरुआत बिस्मिल्लाह-ए-रहमान-ए-रहीम से होने पर उन्हें कट्टरपंथी समझने वाले भारतीय लोगों को अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में सियासी मिशन के तहत धर्म घोले जाने में कोई बुराई नहीं दिख रही है?
बात केवल मुसलमानों की नहीं
उसकी वजह ये विश्वास है कि हिंदू धर्म उदार, शांतिपूर्ण, सहिष्णु और महान है, वे शायद ये नहीं समझ रहे कि पाकिस्तानी मुसलमानों ने भी अपने धर्म के बारे में ऐसा ही सोचा था. दरअसल, ये किसी धर्म के अच्छे या बुरे होने का मामला है ही नहीं, ये उसकी हद तय करने का मामला है.
बात केवल तकरीबन 17 करोड़ मुसलमानों की नहीं है. दक्षिण और पूर्वोत्तर भारत के लोग, आदिवासी, ईसाई और हाशिये पर पड़े करोड़ों दूसरे लोग जो हिंदू नहीं हैं वे भी 'न्यू इंडिया' में बराबर के भागीदार होंगे ये जताने के लिए पीएम या सरकार ने अब तक क्या किया है? अगर कुछ नहीं किया है, और इसमें आपको कोई बुराई नहीं दिख रही तो यह चिंताजनक है.
मंच पर कैमरे के सामने जालीदार टोपी पहनने से इनकार करना, परंपरागत रूप से चले आ रहे प्रधानमंत्री निवास के इफ़्तार को बंद करना, राष्ट्रपति की इफ़्तार की दावत का बहिष्कार करना और मुसलमानों के ख़िलाफ़ छोटे-मोटे सिपहसालारों की लगातार बयानबाज़ी को चलते रहने देना अनायास नहीं है. सरकार का कहना है कि तुष्टीकरण की नीति अब बंद कर दी गई है.
बहुत अच्छी बात है कि मुसलमानों के तुष्टीकरण की नीति बंद कर दी गई है, उससे वैसे भी मुसलमानों का कोई फ़ायदा नहीं हो रहा था और थ्योरी ये है कि हिंदुओं का तुष्टीकरण नहीं हो सकता, ये तो उनका अधिकार है.
सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों के सार्वजनिक भजन-आरती करने से भारत के हिंदुओं को उतना ही फ़ायदा होगा, जितना पाकिस्तानी नेताओं के पाँचों वक़्त नमाज़ पढ़ने से हुआ है.
( ये लेखक के निजी विचार हैं.)
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)