बीजेपी की मेघालय में ‘एकला चलो’ की नीति, ईसाई बहुल राज्य में कितना चलेगा दांव

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- Author, मयूरेश कोन्नूर
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
पूर्वोत्तर भारत के मेघालय और नागालैंड में सोमवार को नई विधानसभा के लिए वोट डाले जाएंगे.
जबकि त्रिपुरा के मतदाताओं ने बीते सप्ताह ही नई विधानसभा के लिए मतदान किया है. 'सेवन सिस्टर्स' के नाम से मशहूर पूर्वोत्तर के सभी राज्य अपेक्षाकृत छोटे हैं, लेकिन अगर हम इन राज्यों से लोकसभा सीटों की कुल संख्या को देखें, तो हम समझ सकते हैं कि यहां के प्रत्येक राज्य के विधानसभा चुनाव राष्ट्रीय स्तर पर क्यों महत्वपूर्ण माने जाते हैं.
केंद्र में बीते नौ साल से शासन कर रही भारतीय जनता पार्टी की उपस्थिति यहां काफ़ी समय तक नगण्य रही लेकिन 2014 से ही पूर्वोत्तर भारत में बीजेपी का उभार दिखा है.
आज असम, अरुणाचल प्रदेश, त्रिपुरा और मणिपुर में बीजेपी की अपनी सरकारें हैं. मेघालय और नागालैंड में बीजेपी गठबंधन के साथ सत्ता में है. मिजोरम की स्थिति तो बेहद दिलचस्प है, वहां बीजेपी का इकलौता विधायक भले विपक्ष में बैठता हो लेकिन केंद्र में बीजेपी और जोरामथंगा की पार्टी एक साथ है.
वास्तविकता यही है कि बीजेपी ने यहां पांव जमा लिया है. यह पांव किस तरह जमा है इसका अंदाज़ा मेघालय के चुनाव से लगाया जा सकता है. 70 प्रतिशत से अधिक ईसाईयों की आबादी वाले राज्य की सभी 60 सीटों पर बीजेपी चुनाव लड़ रही है. इस नज़रिए से देखें तो यह चुनाव ऐतिहासिक माना जा रहा है.
अगर इतिहास पर नज़र डालें तो यहां की स्थानीय पार्टियों के अलावा कांग्रेस की सत्ता रही है. लेकिन हाल के सालों में बीजेपी ने उन समीकरणों को ध्वस्त किया, नए राजनीतिक समीकरणों के साथ पार्टी राज्य में सरकार में शामिल होने में कामयाब रही है.
इस बार बीजेपी का इरादा राज्य में अपने दम पर सरकार बनाने का है. यही वजह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कई चुनावी बैठकों को संबोधित कर रहे हैं. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह भी लगातार राज्य का दौरा कर रहे हैं. पूर्वोत्तर भारत में बीजेपी की कामयाबी का चेहरा माने जाने वाले हिमंत बिस्वा सरमा को राज्य की चुनावी कमान थमाई गई है.

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चुनाव में नये गठबंधन और समीकरण
चुनाव से पहले मेघालय में नेशनलिस्ट पीपल्स पार्टी (एनपीपी) के नेतृत्व वाली सरकार थी. जिसमें स्थानीय यूडीपी और बीजेपी के साथ अन्य दल शामिल हैं.
कोनराड संगमा, पुराने कांग्रेसी और शरद पवार के साथ कांग्रेस से अलग होने वाले पीए संगमा के बेटे हैं और इस समय राज्य के मुख्यमंत्री हैं. एनपीपी, यूडीपी और बीजेपी- बीते पांच सालों से राज्य की राजनीति में एक साथ थे, लेकिन इस चुनाव में तीनों एक साथ नहीं हैं.
2018 में राज्य के चुनाव में कांग्रेस सबसे बड़े दल के तौर पर उभरी थी. 60 सीटों में से कांग्रेस को 21 सीटें हासिल हुई थीं, जबकि एनपीपी को 19 सीटें मिली थीं. बीजेपी को केवल दो सीटें हासिल हुई थीं. जब तक कांग्रेस अपनी रणनीति बनाती तब तक बीजेपी ने एनपीपी और यूडीपी के साथ मिलकर सरकार बना ली और पांच साल तक सरकार चलायी भी.
लेकिन इस बार तीनों दल एक साथ चुनाव मैदान में नहीं हैं. बीजेपी राज्य की सभी 60 सीटों पर चुनाव लड़ रही है और पिछली राज्य सरकार पर भ्रष्टाचार का आरोप लगा रही है.
बीजेपी के इन आरोपों पर यहां के नागरिक और राजनीतिक विश्लेषक हैरान हैं लेकिन लोगों का मानना है कि ये चुनाव से पहले की बीजेपी की रणनीति है और चुनाव के बाद बीजेपी की रणनीति दूसरी होगी.
इधर, अमित शाह ने चुनाव प्रचार अभियान के दौरान आक्रामक अंदाज़ में 'मेघालय को सबसे भ्रष्ट राज्य' बताया है. बीजेपी ने यहां परिवारवाद की राजनीति का मुद्दा उठाते हुए आरोप लगाया है कि 'अब तक केवल दो संगमा परिवारों ने सब कुछ चुराया है.'
बीजेपी जिस दूसरे संगमा की बात कर रही है वो हैं डॉ. मुकुल संगमा. मेघालय की मौजूदा राजनीति में मुकुल सबसे बड़े नाम के तौर पर दिखाई देते हैं.
मुकुल संगमा 2018 से पहले लगातार आठ साल मुख्यमंत्री रहे और कांग्रेस के सबसे वरिष्ठ नेता थे. उनके नेतृत्व में ही 2018 में पार्टी को 21 सीटें भी मिली थीं लेकिन 2017 में जिस तरह पार्टी गोवा में सरकार नहीं बना पायी थी, उसी तरह 2018 में मेघालय में सरकार बनाने में चूक गई थी.
इसके बाद मुकुल संगमा नेता प्रतिपक्ष बने और इस पद पर 2021 तक बने रहे, लेकिन कांग्रेस नेतृत्व से उनकी नाराज़गी के किस्से छिपे नहीं थे और दिल्ली में कांग्रेस के नेतृत्व ने उनके साथ कैसा व्यवहार किया, इसको लेकर यहां बहुत कुछ देखने को मिला.
2021 में जब ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ने अपना ध्यान मेघालय की ओर लगाया और यहां पार्टी को बढ़ाना शुरू किया. तो मुकुल संगमा कांग्रेस छोड़कर अपने 12 सहयोगियों के साथ तृणमूल कांग्रेस में आ गए.
इसके बाद रातों-रात तृणमूल मेघालय में मुख्य विपक्षी पार्टी बन गई. अब मुकुल संगमा के नेतृत्व में 'तृणमूल' भी यहां बहुमत हासिल करने का दावा कर रही है.
इसलिए इस साल का मेघालय चुनाव मुख्य रूप से त्रिकोणीय है. कोनराड और मुकुल संगमा के दो कोण हैं और भाजपा तीसरी है. बेशक, चूंकि कांग्रेस के यहां परंपरागत वोटर हैं, इसलिए वे भी अहम हो सकते हैं. वहीं 'यूडीपी' 40 से ज़्यादा सीटों पर चुनाव लड़ रही है.

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'ईसाई-विरोधी' होने का आरोप
एक तरफ बीजेपी मोदी के चेहरे के ज़रिए 'भ्रष्टाचार-विरोधी शासन' को मुख्य मुद्दा बनाने की कोशिश कर रही है, वहीं उसके विरोधी बीजेपी को 'ईसाई-विरोधी' कह कर धार्मिकता को राजनीतिक मुद्दा बनाने की कोशिश कर रहे हैं.
देश भर में बीजेपी को जीत दिलाने वाली हिंदुत्व की छवि यहां पार्टी के लिए विपक्ष की भूमिका निभा रही है और यह एक तरह से चुनाव का सबसे अहम साइलेंट फैक्टर बन गया है.
जब पार्टी सभी सीटों पर जीत हासिल कर बहुमत पाने का दावा कर रही है तो दूसरी ओर विपक्ष ईसाई विरोध के नाम पर बीजेपी को घेरने की कोशिश कर रही है. बीजेपी को लगातार इस नैरेटिव का जवाब देना पड़ रहा है.
इस नैरेटिव का काउंटर असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने एक पत्रकार कांफ्रेंस में कुछ इस तरह से किया है, "बीजेपी सभी धर्मों का सम्मान करने वाली पार्टी है. आपने पोप और हमारे प्रधानमंत्री के बीच व्यक्तिगत संबंध देखा है."
"तो ईसाई धर्म के विरोध के लिए कोई जगह कहां है? प्रधानमंत्री खुद कई बार पोप से मिल चुके हैं. उन्हें भारत आमंत्रित किया है. तो फिर ईसाई विरोधी होने का सवाल ही कहां है?"
फिर भी, मेघालय में कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस भाजपा की हिंदुत्व राजनीति को सबसे बड़ा मुद्दा बना रहे हैं. उनका कहना है कि देश के दूसरे हिस्सों में बीजेपी की कामयाबी में अहम भूमिका निभाने वाली हिंदुत्व राजनीति का मेघालय में विपरीत प्रभाव होगा.
जॉर्ज लिंगदोह उमरोई से तृणमूल कांग्रेस के विधायक हैं. वे पिछले कुछ दिनों से इस मुद्दे पर और भी आक्रामक हो गए हैं. वह स्थानीय मीडिया के ज़रिए भी इस मुद्दे पर बात कर रहे हैं.
उन्होंने कहा, "अभी पिछले हफ्ते एक ख़बर आई थी कि 'आरएसएस' के किसी प्रचारक ने कहा है कि ईसाइयों को अनुसूचित जनजाति की श्रेणी से हटा दिया जाना चाहिए. बीजेपी ने सबसे पहले राजनीति के लिए धर्म को कार्ड के रूप में इस्तेमाल करना शुरू किया है. बीजेपी ने पूरे देश में इस नैरेटिव को बनाना शुरू कर दिया है."
जॉर्ज लिंगदोह बीबीसी मराठी से कहते हैं, "अब दूसरी पार्टियां भी उसी रास्ते पर चल रही हैं. लेकिन यहां बीजेपी को इसका फ़ायदा नहीं मिलेगा. अगर चुनाव में ईसाइयों का मुद्दा उठ रहा है तो सवाल यह है कि यह सब किसने शुरू किया?"
जाहिर है कि 'तृणमूल' और कांग्रेस यहां कयास लगा रही हैं कि उसे चुनाव में धार्मिक ध्रुवीकरण का वही फ़ायदा मिलेगा जो दूसरे राज्यों में हिंदुत्व की राजनीति के नाम पर बीजेपी को मिलता रहा है.

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बीजेपी क्या दावे कर रही है
बीजेपी भी इस ईसाई विरोधी नैरेटिव का लगातार जवाब दे रही है. उसके चुनाव प्रचारक आक्रामकता में भी पीछे नहीं हैं.
एलेक्जेंडर हेक शिलांग से पांच बार से बीजेपी विधायक हैं. वे भाजपा के ख़िलाफ़ ऐसे प्रचार पर कहते हैं, "अन्य राजनीतिक दल कह रहे हैं कि बीजेपी केवल हिंदुओं की पार्टी है. मैं खुद एक ईसाई हूं. मैं 1996 से बीजेपी में हूं. मैं 1998 से बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ रहा हूं और पांच बार जीता हूं. मैं बीजेपी में रहा, मैं बीजेपी में जीता. बीजेपी में मैं ईसाई हूं और मैं ईसाई रहूंगा."
हालांकि वे मानते हैं कि बीजेपी को लेकर ईसाई विरोधी का नैरेटिव चुनाव में मुश्किलें खड़ी कर सकता है. इसलिए वे चुनाव प्रचार के लिए लगातार चर्च का दौर कर रहे हैं और चर्च के पदाधिकारियों को भी भरोसे में लेने की कोशिश कर रहे हैं. वे सोशल मीडिया में भी लगातार लिख और बोल रहे हैं कि बीजेपी यहां के ईसाईयों की भी पार्टी है.
हालांकि सच्चाई भी यही है कि मेघालय में बीजेपी के विधायक ईसाई भी रहे हैं. एलेक्जेंडर हेक ही लगातार पांच बार से विधायक रहे हैं.
हेक कहते हैं, "अगर बीजेपी ईसाई विरोधी होती, तो मुझे टिकट नहीं मिलता. मेघालय में बीजेपी के सभी उम्मीदवारों में 90 फ़ीसद ईसाई हैं. नागालैंड में 95 फ़ीसद ईसाई हैं."
दूसरी ओर मेघालय में बीजेपी ने नरेंद्र मोदी को अपना चेहरा बनाया है. खासी जनजाति समुदाय के ख़ास पहनावे वाली मोदी की तस्वीर वाले पोस्टर राजधानी शिलांग सहित राज्य भर की सभी सड़कों पर लगाए गए हैं. बीजेपी 'सबका साथ सबका विकास' का दावा करने की कोशिश कर रही है.

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ईसाई संगठनों की चिंता और भूमिका
चुनावी राजनीति से इतर मेघालय और पूर्वोत्तर भारत में ईसाई विरोधी मुद्दे का एक आयाम चर्च और ईसाई संगठन भी हैं.
पिछले कुछ वर्षों में मेघालय में उत्तर पूर्व सहित देश में ईसाई समुदाय पर हमले की घटनाएं और उसको लेकर प्रतिक्रियात्मक घटनाएं भी हुई हैं. असम में भी ऐसी घटनाएं देखने को मिली हैं और इसका असर पड़ोसी राज्यों पर दिख रहा है.
कुछ दिन पहले असम पुलिस की ओर से एक सर्कुलर जारी किया गया था और उसमें धार्मिक स्थलों, उनकी जानकारी, नए धर्मांतरित लोगों की जानकारी इकट्ठा करने की बात कही गई थी. हालांकि वहां के मुख्यमंत्री ने इसके नफ़ा नुकसान को समझते हुए तुरंत कहा कि उनकी सरकार का उनसे कोई लेना-देना नहीं है. लेकिन इस सर्कुलर को लेकर विपक्ष की ओर प्रतिक्रियाएं भी आयीं.
इससे पहले, संघ से जुड़े एक संगठन ने भी पूर्वोत्तर में धर्मांतरण करके ईसाई बनने वालों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिए जाने पर आपत्ति जताई थी. कुछ संगठनों का कहना है कि इन तमाम घटनाओं से ईसाई समुदाय में चिंता का माहौल है.
खासी-जैंतिया चर्च लीडर्स फोरम के सचिव रेवरेंड एडविन खारकोंगोर कहते हैं, "चर्च कभी भी किसी राजनीतिक दल का समर्थन नहीं करता है."
लेकिन, वे कहते हैं, "अभी हाल ही में उत्तर-पूर्व भारत में असम में एक परिपत्र जारी किया गया था जिसमें नए चर्चों और नए धर्मान्तरित ईसाईयों के बारे में जानकारी एकत्र करने का आदेश दिया गया था. इसने सभी को चौंकाया है और गंभीर चिंता पैदा कर दी."
इसलिए, ईसाई प्रतिनिधियों के इस संगठन ने आम चुनाव के लिए एक पर्चा निकाला है और अपनी चिंता की घोषणा की है. जिसकी चर्चा राजनीतिक गलियारों में है.
उन्होंने कहा, "ये घटनाएं मेघालय के पड़ोसी राज्य असम में हुई हैं और वहां बीजेपी सत्ता में है. बीजेपी इन घटनाओं के ख़िलाफ़ नहीं बोलती है, तो हम इससे खुश नहीं हैं. हमें लगता है कि जब ऐसी चीजें जनजाति समुदायों और अल्पसंख्यकों के साथ हो तो सत्ता में बैठे लोगों को चुप नहीं रहना चाहिए. चुप रहना हिंसा का समर्थन करने जैसा ही है."

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अब सवाल यह है कि क्या ईसाई संगठनों की इस भूमिका का यहां के चुनाव पर कोई असर पड़ता है या मतदाता कुछ और ही सोचते हैं.
हालांकि चुनावी समीकरणों को देखते हुए ही बीजेपी ने हाल ही में असम में जारी विवादास्पद सर्कुलर से खुद को दूर रखने की कोशिश की है. धर्मांतरण करके ईसाई बने लोगों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा के अलावा गोमांस की खपत, धर्मांतरण निषेध अधिनियम, सीएए, मॉब लिंचिंग और यूनिवर्सल सिविल कोड जैसे संवेदनशील मुद्दे से बीजेपी दूरी बरतती दिखी है.
'द शिलॉन्ग टाइम्स' की संपादक और लेखिका पेट्रीसिया मुखिम को लगता है कि आरएसएस और बीजेपी कई सालों से पूर्वोत्तर भारत में सक्रिय है और पार्टी के 'ईसाई-विरोधी' होने की धारणा अब यहाँ काफी 'कमजोर' हो चुकी है.
उन्होंने बताया, "हमें यह भी याद रखना होगा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इस क्षेत्र में लंबे समय से काम कर रहा है. कई लोगों को यह भी पता नहीं है कि वे दो दशक से अधिक समय से चुपचाप यहां काम कर रहे हैं. कई संघ कार्यकर्ता यहां रहते हैं, स्थानीय भाषा बोलते हैं, ख़ासकर ग्रामीण इलाकों में जनजातीय समुदाय के लोगों की मदद करते हैं. इसलिए मुझे लगता है कि भाजपा ईसाइयों के ख़िलाफ़ है, यह धारणा कमजोर हो चुकी है."
उत्तर पूर्व भारत के इन चुनावों में सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा इस क्षेत्र को देश की आर्थिक मुख्यधारा में लाना है. लेकिन चुनावी राजनीति में धार्मिक पहचान और धार्मिक आस्था का प्रभाव यहां साफ़ नज़र आता है.
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