क्या भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल समझौता टिकेगा?

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- Author, शुभज्योति घोष
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़ बांग्ला,दिल्ली
सिंधु घाटी की नदियों के पानी के बंटवारे पर दक्षिण एशिया के सबसे पुराने और सबसे लंबे समय से चल रहे अंतरराष्ट्रीय समझौते के भविष्य पर गंभीर सवाल खड़ा हो गया है. इसकी वजह यह है कि भारत ने उस समझौते की शर्तों में बड़े बदलाव की मांग उठाई है.
भारत और पाकिस्तान ने वर्ष 1960 में इंडस वाटर ट्रीटी (सिंधु जल समझौता) नामक उस समझौते पर हस्ताक्षर किए थे. इस समझौते पर दोनों देशों के बीच बातचीत में विश्व बैंक ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई थी और तीसरे पक्ष के तौर पर समझौते पर उसने भी हस्ताक्षर किए थे.
उस समझौते का प्रमुख मकसद सिंधु घाटी की नदियों के पानी को दोनों देशों के बीच निष्पक्षता के साथ बंटवारा करना था.
द्विपक्षीय स्तर पर गठित स्थायी सिंधु आयोग में भारत ने बीते 25 जनवरी को अपने आयुक्त के जरिए पत्र भेज कर कहा था कि समझौते के उल्लंघन के आरोपों पर आगामी 90 दिनों के भीतर दोनों देश आपस में बातचीत करें.
भारत की दलील थी कि समझौते को लागू करने में किसी विवाद की स्थिति में लगातार बातचीत या ग्रेडेड एप्रोच के जरिए उसका निपटारा करना होगा. दूसरी ओर, पाकिस्तान मध्यस्थता अदालत और उससे पहले किसी तीसरे देश के तटस्थ विशेषज्ञ को नियुक्त करने के पक्ष में था.
पाकिस्तान ने हेग स्थित अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता न्यायालय में जो अपील की थी उसपर दो दिनों बाद (27 जनवरी को) ही सुनवाई होनी थी. लेकिन भारत ने उस सुनवाई का बायकाट किया.
पाकिस्तान के अटॉर्नी जनरल दफ्तर की ओर से जारी एक बयान में कहा गया है कि भारत एकतरफा तरीके से सिंधु जल समझौते को बदलना चाहता है जो किसी भी हालत में स्वीकार्य नहीं है.
इस बीच, भारतीय विदेश मंत्रालय ने बीते सप्ताह इस विवाद में विश्व बैंक की भूमिका पर कटाक्ष करते हुए कहा है, ''हमारी ओर से इस समझौते की व्याख्या करने की जिम्मेदारी किसी ने विश्व बैंक को नहीं दी है. कुल मिला कर इस समझौते की व्याख्या के मुद्दे पर विवाद इतनी जटिल स्थिति में पहुंच गया है कि कई पर्यवेक्षक इसके भविष्य पर ही आशंका जता रहे हैं.
किस मुद्दे पर है विरोध

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सिंधु जल समझौते के मुताबिक, इस घाटी के पूरब में स्थित तीन नदियों- ब्यास, रावी और शतद्रु का पानी भारत के हिस्से में है और पश्चिम की तीन नदियों-चंद्रभागा, सिंधु और झेलम के पानी में पाकिस्तान को हिस्सा मिला है.
लेकिन समझौते में दोनों देशों को कुछ खास मकसद से एक-दूसरे के हिस्से की नदियों के इस्तेमाल का अधिकार दिया गया है. मिसाल के तौर पर छोटे स्तर की पनबिजली परियोजनाओं, जिनमें या तो पानी जमा रखने की जरूरत नहीं होती या फिर बहुत कम जरूरत होती है, को बनाने में कोई दिक्कत नहीं है.
इन तमाम शर्तो के साथ ही बीते छह दशक से भी ज्यादा समय से यह समझौता चल रहा था. लेकिन भारत प्रशासित कश्मीर में किशनगंगा और रतले नामक दो परियोजनाओं पर हाल में काफी विवाद देखने को मिला है.
इसमें से बांदीपोरा जिले में किशनगंगा नदी (जो झेलम की सहायक नदी है) पर बनी किशनगंगा पनबिजली परियोजना का भारत सरकार ने वर्ष 2018 में उद्घाटन किया था. किशतवार जिले में चंद्रभागा पर बनने वाली रतले पनबिजली परियोजना का काम अभी पूरा नहीं हुआ है. उसका निर्माण कार्य चल रहा है.
पाकिस्तान का कहना है कि इन दोनों परियोजनाओं में बिजली उत्पादन के लिए भारत ने जिस तरह बांध या जलाशय पेश किया है उससे नदियों का स्वाभाविक प्रवाह बाधित होगा.

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पाकिस्तान का आरोप है कि चूंकि इन नदियों से ही पाकिस्तान के 80 फीसदी किसानों को सिंचाई के पानी की सप्लाई की जाती है, इसलिए किशनगंगा और रतेल जैसी परियोजनाओं के निर्माण के जरिए भारत सिंधु समझौते का उल्लंघन कर रहा है.
इस विवाद के समाधान के लिए ही पाकिस्तान ने पहले विश्व बैंक के किसी तटस्थ विशेषज्ञ की नियुक्ति कि मांग उठाई थी. उसके बाद वर्ष 2016 में उसने हेग स्थित अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता अदालत की शरण ली.

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भारत जो बदलाव चाहता है
किशनगंगा और रतेल परियोजनाओं पर विवाद के समाधान के लिए मूल रूप से दो समानांतर प्रक्रिया चल रही थी. पहली, भारत के अनुरोध के मुताबिक तटस्थ विशेषज्ञ की नियुक्ति के जरिए और दूसरी, पाकिस्तान के अनुरोध के मुताबिक अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता अदालत में चेयरमैन की नियुक्ति के जरिए.
वर्ष 2016 में विश्व बैंक ने इन दोनों समानांतर प्रक्रिया को स्थगित करने की घोषणा की. उसकी दलील थी कि इन दोनों प्रक्रिया के जरिए परस्पर विरोधी फैसला आने की स्थिति में समझौते का भविष्य ही खतरे में पड़ जाएगा.
लेकिन इस साल तीन फरवरी को विश्व बैंक ने कहा कि वह इन दोनों प्रक्रिया को फिर से एक साथ चलाने के पक्ष में है.
भारत ने विश्व बैंक के इस प्रस्ताव पर कड़ी आपत्ति जताई है. भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची ने विश्व बैंक पर कटाक्ष करते हुए कहा है, "मैं तो जानता था कि सिंधु जल समझौता दो देशों के बीच है!"
मूल समझौते में जिस गार्डेड मेकेनिज्म या चरणबद्ध तरीके से बातचीत के जरिए विवाद निपटाने की बात कही गई है, भारत उसी स्थिति पर लौटना चाहता है. दिल्ली ने यह बात भी साफ कर दी है.
पाकिस्तान के पास भारत के इस प्रस्ताव पर जवाब देने के लिए तीन महीने का समय है. सरकारी सूत्रों ने संकेत दिया है कि इस समय सीमा के भीतर पाकिस्तान की ओर से सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिलने की स्थिति में भारत समझौते को रद्द करने पर भी विचार करेगा.
भारत की पहली कतार के थिंक टैंक ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन की एक रिपोर्ट (8 फरवरी) में टिप्पणी की गई है कि स्थायी सिंधु आयोग के दायरे में बीते कुछ दशकों से हाइड्रो-कूटनीति के जरिए जो कामयाबी मिली थी, इस मुद्दे के राजनीतिकरण के जरिए अब वह खत्म होने की कगार पर है. अविश्वास का एक जहरीला माहौल तैयार हो गया है.
इस रिपोर्ट को तैयार करने वाले सायनांशु मोदक और नीलांजन घोष ने यह भी याद दिलाया है कि अपस्ट्रीम यानी नदियों के ऊपरी इलाके के देश के तौर पर भारत के पास जो सुविधा या इंडस लीवरेज है, देश के कई विशेषज्ञ अब उसका इस्तेमाल करने की वकालत कर रहे हैं.

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पाकिस्तान की प्रतिक्रिया
पाकिस्तान सरकार ने कहा है कि भारत जिस तरह एकतरफा तरीके से सिंधु जल समझौता बदलना चाहता है, वह एक भ्रामक प्रयास है.
भारत की ओर से स्थायी सिंधु आयोग को पत्र भेजने के बाद पाकिस्तान के अटॉर्नी जनरल शहजाद अता इलाही के दफ्तर से एक कड़ा बयान जारी किया गया. उसमें कहा गया है, "पाकिस्तान की ओर से आपत्ति के बाद भारत ने जिस तरह इतनी देरी से विवाद सुलझाने के तरीके पर सवाल खड़ा किया है, उससे उसकी अनिच्छा का पता चलता है." बयान में इस बात की ओर भी ध्यान दिलाया गया है कि सिंधु घाटी की नदियों पर बनी विभिन्न पनबिजली परियोजनाओं पर दोनों देशों के बीच बरसों से वाद-विवाद चल रहा है.
इधर, जलवायु परिवर्तन और विकास के मुद्दे पर पाकिस्तान के जाने-माने विशेषज्ञ अली तौकीर शेख ने 'द डॉन' पत्रिका ( 9 फरवरी) को इस मुद्दे पर एक लेख लिखा है. उन्होंने उसमें कहा है, "अपेक्षाकृत कमजोर देश के तौर पर पाकिस्तान यही सोचता है कि किसी भी द्विपक्षीय मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय रंग देने में सक्षम होने पर बातचीत की मेज पर उसकी स्थिति काफी मजबूत होगी."
उनकी राय में पाकिस्तान की ओर से सिंधु समझौते पर विवाद को अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता अदालत तक ले जाने के पीछे यही असली वजह है.

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शेख का कहना है कि इस समझौते में तटस्थ विशेषज्ञ की नियुक्ति, मध्यस्थता अदालत में अपील का प्रावधान या विश्व बैंक की ओर से 'ऑनसेट ब्रोकर' की भूमिका के पालन जैसी जो विशेषताएं हैं, वह सब दूसरे किसी क्षेत्रीय नदी समझौते में नहीं हैं.
उधर,पाकिस्तान के अटॉर्नी जनरल दफ्तर ने यह भी कहा है, "इस समझौते को एकतरफा तरीके से नहीं बदला जा सकता. हमें लगता है कि यह मध्यस्थता अदालत में जारी सुनवाई से ध्यान हटाने की एक कोशिश है."
अली तौकीर शेख भी मानते हैं, "भारत इस समझौते में जिस तरह के बदलाव लाना चाहता है उससे सिर्फ सिंधु ही नहीं, दक्षिण एशिया में तमाम अंतरराष्ट्रीय जल संबंध खतरे में पड़ जाएंगे."
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