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सबरीमाला आंदोलन के चार साल, मंदिर में घुसने वाली महिलाओं का क्या हाल है?
- Author, इमरान क़ुरैशी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
चार साल पहले यही महीना था, जब दो महिलाओं ने केरल में, स्वामी अयप्पा के सबरीमाला मंदिर में दाख़िल होकर इतिहास रचा था. इन दोनों महिलाओं को अयप्पा के मंदिर में पूजा करने का साहस, भारत के सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश से मिला था.
बिंदु अम्मिनी और कनकदुर्गा ने सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 साल उम्र की महिलाओं के प्रवेश न करने की सदियों से चली आ रही परंपरा को धता बताकर वहां पूजा की थी. इस परंपरा की वजह ये है कि स्वामी अयप्पा को 'चिर ब्रह्मचारी' माना जाता है. इसलिए रजस्वला महिलाएं मंदिर में उनके दर्शन नहीं कर सकतीं. उस वक़्त बिंदु की उम्र 40 बरस थी, तो कनकदुर्गा उनसे एक साल छोटी थीं.
उस दिन सीधी चढ़ाई वाली पहाड़ी से सबरीमाला मंदिर जाने वाले पूरे रास्ते पर हिंदू संगठनों के कार्यकर्ता जमा थे. वो सदियों पुरानी परंपरा को तोड़ने से रोकने के लिए खड़े थे. यहां तक कि, वहां जमा कार्यकर्ताओं ने 50 साल से ज़्यादा उम्र की कई महिलाओं को भी घेरकर रोक लिया था और उनसे बड़ी रुख़ाई से सवाल जवाब किए थे.
इसके बाद पुलिस ने दख़ल दिया और महिलाओं को शनिधानम जाने की इजाज़त दी, जहां मंदिर स्थित है. फिर, दोनों महिलाएं ख़ामोशी से उस झुंड के बीच से निकल गईं.
बिंदु और कनकदुर्गा ने ये परखने का साहस किया था कि क्या देश की सबसे बड़ी अदालत का आदेश आस्था के मामले में लागू किया जा सकता है. जब बीबीसी ने उनसे पूछा कि उस घटना के चार साल बाद कितना बदलाव आया है, तो बिंदु ने बहुत निराशाजनक जवाब दिया.
उन्होंने कहा कि, 'चार साल बाद कुछ भी नहीं बदला है. ऐसा लगता है कि लोग और रूढ़िवादी हो गए हैं. यहां तक कि वामपंथियों की अगुआई वाली वाम लोकतांत्रिक मोर्चे (LDF) की सरकार ने भी कट्टरपंथियों से समझौता कर लिया है.'
हालांकि, वामपंथी गठबंधन की अगुआई करने वाली सीपीएम के वरिष्ठ नेता प्रोफ़ेसर एम. ए. बेबी ने इन आरोपों को ख़ारिज करते हुए बीबीसी से कहा,'' जब सुप्रीम कोर्ट ने अपने पहले के फ़ैसले पर पुनर्विचार करने का फ़ैसला किया, तो उससे पहले के सारे आदेश निरस्त हो गए.''
वहीं, कनकदुर्गा ने कहा ,''महिलाओं के प्रति समाज की सोच बिल्कुल नहीं बदली है.''
सुप्रीम कोर्ट के आदेश भी हालात जस के तस
बिंदु का इशारा, वाम मोर्चे की सरकार के उस आदेश की तरफ़ था, जिसके तहत सबरीमाला मंदिर के पास ड्यूटी पर तैनात पुलिसवालों को दी गई हैंडबुक वापस ले ली गई.
इस निर्देशिका में पुलिसवालों से ख़ास तौर से ये कहा गया था कि सभी श्रद्धालुओं को मंदिर में दाख़िल होने की इजाज़त दी जाए, फिर चाहे वो किसी भी उम्र की हों. ये निर्देश 28 अक्टूबर 2018 को दिए गए सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर आधारित थे.
सुप्रीम कोर्ट ने 4:1 के बहुमत से फ़ैसला सुनाया था कि माहवारी वाली महिलाओं को मंदिर में दाख़िल होने से रोकना, संविधान की धारा 25 के ख़िलाफ़ है. अदालत ने अपने फ़ैसले में किसी इंसान के अपने धर्म की इबादत करने के बुनियादी अधिकार को पारंपरिक आस्था के ऊपर तरज़ीह दी थी.
एक वीडियो रिकॉर्डिंग के ज़रिये जब बिंदु और कनकदुर्गा ने मंदिर में अपने दाख़िल होने का राज़ खोला था तो पूरे राज्य में बीजेपी और हिंदू संगठनों ने विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिए थे. इनमें दो लोगों की जान भी चली गई थी. हिंदू संगठनों के विरोध के चलते, बिंदु और कनकदुर्गा को पुलिस की निगरानी में एक 'सुरक्षित ठिकाने' पर रखा गया था.
2019 के बाद से, कोविड महामारी के बाद ये पहला मौक़ा था, जब लाखों श्रद्धालु सबरीमाला मंदिर में पूजा करने के लिए पहुंचे थे. त्रावणकोर देवासोम बोर्ड के नियंत्रण वाले इस मंदिर ने पिछले महीने ही तय किया था कि एक दिन में केवल 90 हज़ार श्रद्धालुओं को भगवान के दर्शन करने की इजाज़त होगी.
सबरीमाला मंदिर में पूजा-अर्चना का ये काल गुरुवार को समाप्त हो गया. बोर्ड ने बताया कि इस सीज़न में मंदिर को 350 करोड़ रुपए का चढ़ावा मिला है, और उस वक़्त भी मंदिर के 480 कर्मचारी, चढ़ावे में दिए गए रुपए गिन रहे थे.
दोनों महिलाओं के मंदिर प्रवेश के बाद क्या हुआ?
बिंदु कहती हैं, ''संघ परिवार के कार्यकर्ताओं ने हमले की धमकी दी. इसके डर से कोई भी मंदिर में जाने को तैयार नहीं है. वो लोग इस बार भी वहां भारी तादाद में मौजूद थे.''.
दिव्या दिवाकर एक अध्यापिका भी हैं और महिला अधिकार कार्यकर्ता भी. वो कहती हैं,''सरकार महिलाओं को सुरक्षा देने को तैयार नहीं है. बिंदु और कनकदुर्गा को जिस तरह से निशाना बनाया गया, उसके बाद ज़ाहिर है कि दूसरी महिलाओं को वहां जाने में डर लगता है.''
उस साल बिंदु और कनकदुर्गा के साथ दिव्या और एक दूसरी महिला भी मंदिर में दर्शन के लिए जाने वाली थीं. लेकिन उन्हें इससे पीछे हटना पड़ा क्योंकि उनके साथ जाने वाली महिला की माहवारी शुरू हो गई थी. दिव्या कहती हैं,''हमें लगा कि अक़्लमंदी इसी बात में होगी कि वो दोनों ही मंदिर जाएं. बेवजह विवाद बढ़ाने से क्या फ़ायदा.''
बिंदु कहती हैं,'' हाल ये था कि जिन संगठनों ने कहा था कि वो हमारा समर्थन करेंगे, वो भी विरोध को देखकर पीछे हट गए. हमारा पूरा आंदोलन ही ठप हो गया.''
बात इतने पर ही नहीं रुकी. बिंदु और कनकदुर्गा को अपनी निजी ज़िंदगी में भी काफ़ी नुक़सान उठाने पड़े.
बिंदु पर कम से कम तीन बार हमला किया गया. आरोप है कि इस हमले के पीछे संघ परिवार के सदस्यों का हाथ था. बिंदु पर पहला हमला 26 नवंबर 2019 को दक्षिणपंथी हिंदूवादी संगठन के कार्यकर्ताओं ने किया था.
बिंदु उस घटना के बारे में बताती हैं,''जब मैं कोच्चि के पुलिस कमिश्नर के दफ़्तर के पास थी, तो उन्होंने मेरे ऊपर मिर्च पाउडर फेंक दिया और उसके बाद मेरे चेहरे पर कोई केमिकल डाल दिया.''
इस हमले के आरोप में एक आदमी को गिरफ़्तार किया गया था. लेकिन बिंदु का आरोप है कि आरोपी के ख़िलाफ़ कोई कड़ी कार्रवाई नहीं की गई. बिंदु कहती हैं,'' संघ परिवार के लोगों ने तो उस हमलावर का सम्मान किया था. वो एक हीरो बन गया था.''
दिसंबर 2021 में एक ऑटोरिक्शा ने उन्हें टक्कर मार दी थी. बिंदु के दांतों में गहरी चोट लग गई थी और उन्हें होठों पर टांके भी लगवाने पड़े थे. बिंदु ने बताया,''अंधेरे में मैं ऑटो के ड्राइवर को पहचान नहीं पाई. लेकिन, मैंने उसका नंबर नोट कर लिया था. फिर भी पुलिस ने किसी को गिरफ़्तार नहीं किया.''
अभी पिछले साल जनवरी में भी कोझिकोड में समुद्र के किनारे एक आदमी ने बिंदु पर उस वक़्त हमला कर दिया था, जब वो अपने वकील से मिलकर लौट रही थीं.
2018 में बिंदु को जो पुलिस सुरक्षा दी गई थी, वो भी अचानक वापस ले ली गई. सुप्रीम कोर्ट की सीनियर वकील इंदिरा जयसिंह ने केरल सरकार को चिट्टी लिखी. बिंदु को दोबारा सुरक्षा देने की मांग की. फिर भी बिंदु की पुलिस सुरक्षा बहाल नहीं की गई.
हमलों का ये सिलसिला अब भी क्यों जारी है?
बिंदु कहती हैं,'' मुझे इसलिए निशाना बनाया जा रहा है, क्योंकि मैं एक दलित हूं. मुझे और कोई वजह तो समझ में नहीं आती.''
बिंदु बताती हैं कि वो तो बड़ी मुश्किल में पड़ गई हैं. वो कहती हैं, ''मेरे ऊपर जो हमले हुए उन मामलों की जांच करना तो सरकार की ज़िम्मेदारी है. क़ानूनी तौर पर असली शिकायतकर्ता तो सरकार है. भले ही वास्तविक शिकायत मैंने की. मैं एक लॉ कॉलेज में गेस्ट लेक्चरर हूं. मेरा घर उसी से चलता है. मैं उसे गंवाने का जोखिम नहीं मोल ले सकती. मुझे तो अपना घर चलाने के लिए ये नौकरी चाहिए ही. इस चक्कर में मैं अपने केस के लिए दौड़-भाग नहीं कर पाती.''
आज बिंदु ऐसे मुकाम पर पहुंच गई हैं, जहां वो कहती हैं, ''मुझे कहीं भी आने-जाने की कोई आज़ादी नहीं है. मुझे दिन भर के अपने कार्यक्रम उन दो महिला पुलिसकर्मियों को बताने पड़ते हैं, जो मेरी हिफ़ाज़त के लिए तैनात की गई हैं. ऐसे में अपने आपको बचाकर चलना बेहद मुश्किल हो गया है. मैं अपना कार्यक्रम तक नहीं बदल सकती. मैं तो पिंजरे में क़ैद एक परिंदा बन गई हूं.''
उन्होंने कहा ,''अब तो केरल में रहना बेहद मुश्किल हो गया है.''
जो संगठन दूसरे सामाजिक मुद्दों पर पहले बिंदु के साथ काम करते थे उन्होंने भी बिंदु से दूरी बना ली है. बिंदु कहती हैं,''जब संघ परिवार के कार्यकर्ता आप पर हमला करते हैं, तो आप दूसरों से कुछ मदद की उम्मीद करते हैं. लेकिन उन लोगों ने अब मुझसे दूरी बना ली है.''
जहां तक कनकदुर्गा की बात है, तो उनके पारिवारिक जीवन में भी उथल पुथल मची हुई है. सबरीमाला मंदिर में घुसने के बाद क़रीब दस दिन तक पुलिस सुरक्षा में रहने के बाद जब कनकदुर्गा अपने घर लौटी थीं, तो उनकी सास ने ही उन पर हमला कर दिया था. सास के हमले से उनके सिर और कंधे में चोट आई थी.
कनकदुर्गा को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा था. जब वो अस्पताल से लौटीं, तो उनके पति ने कह दिया वो घर में न घुसें.
इसके बाद कनकदुर्गा ने अदालत का दरवाज़ा खटखटाया. कोर्ट ने कनकदुर्गा को उनके घर जाने की इजाज़त तो दे दी. मगर जब कनकदुर्गा अपने घर पहुंचीं, तो उनका घर ख़ाली था. उनके पति अपनी मां और 12 साल के जुड़वां बच्चों को लेकर अलग रहने चले गए थे.
इतने बुरे बर्ताव के बाद भी कनकदुर्गा अपने पति के साथ रहने को तैयार थीं. लेकिन अब उन्होंने अदालत में तलाक़ की अर्ज़ी दे दी है.
नवंबर 2019 में बीबीसी के साथ एक इंटरव्यू के दौरान कनकदुर्गा के सब्र का बांध टूट पड़ा था. जब उनके बच्चों के बारे में सवाल किया गया, तो वो कैमरे पर ही रोने लगी थीं. वो कहती हैं,''मैं उनके बग़ैर रहने का तसव्वुर भी नहीं कर सकती हूं.''
कनकदुर्गा एक सरकारी विभाग में नौकरी करती हैं. अदालत ने उनके बच्चों को मां से मिलने की इजाज़त दे दी थी. फिर भी उन्हें अपने बच्चों की परवरिश का हक़ हासिल नहीं हुआ है. वो कहती हैं,''मैं फिर से अदालत नहीं जाना चाहती क्योंकि मैं अपने किशोर उम्र के लड़कों को ज़ज़्बाती तौर पर ठेस नहीं पहुंचाना चाहती हूं.''
हाल ही में कनकदुर्गा ने अपने जैसे एक अधिकार कार्यकर्ता से शादी की है.
मुक़दमे का क्या हाल है?
सुप्रीम कोर्ट के उस फ़ैसले के बाद उस पर पुनर्विचार के लिए कई संगठनों ने याचिकाएं दाख़िल की थीं. नवंबर 2020 में सुप्रीम कोर्ट ने 3:2 के बहुमत से ये मामला नौ जजों की बेंच को सौंपने की अर्ज़ी ख़ारिज कर दी थी.
सुप्रीम कोर्ट की बेंच को लगा कि इस मुक़दमे के फ़ैसले का असर दरगाहों और मस्जिदों में मुस्लिम महिलाओं के प्रवेश के मुद्दे पर भी पड़ेगा. इसका असर किसी ग़ैर पारसी से शादी करने वाली पारसी महिला के पूजा के पवित्र अग्निस्थल अग्यारी में दाख़िल होने के मसले पर भी होगा.
सुप्रीम कोर्ट की पीठ को लगा कि इस केस पर उसके फ़ैसले से दाऊदी बोहरा मुस्लिम फ़िरक़े में महिलाओं के जननांग के खतने के रिवाज का मुद्दा भी प्रभावित होगा.
सुप्रीम कोर्ट के वकील प्रेशांत पद्मनाभम ने बीबीसी को बताया,''उसके बाद ये मामला देख रहे मुख्य न्यायाधीश और कई जज रिटायर हो चुके हैं. अब उस बेंच को नए सिरे से गठित किए जाने की ज़रूरत है.''
सियासी तौर पर वाम मोर्चे की सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का आदेश लागू करने का फ़ैसला किया था. लेकिन कांग्रेस की अगुआई वाले विपक्षी संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चे (UDF) ने महिलाओं का समर्थन हासिल करने के लिए पारंपरिक आस्था को तरज़ीह दी. जबकि बीजेपी तो खुलकर सुप्रीम कोर्ट के आदेश का विरोध कर रही थी.
2021 में केरल की जनता ने राज्य में एक के बाद दूसरे मोर्चे को सरकार चलाने का मौक़ा देने की रवायत तोड़ते हुए, लगातार दूसरी बार वामपंथी लोकतांत्रिक गठबंधन की सरकार को चुना था.
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