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ईसाई आदिवासियों को क्या यहां बनाया जा रहा है जबरन हिंदू? - प्रेस रिव्यू
छत्तीसगढ़ में बस्तर के कुछ इलाकों में ईसाई आदिवासियों को जबरन हिंदू बनाने का संगठित अभियान चलाया जा रहा है. एक फैक्ट-फाइडिंग टीम की रिपोर्ट में ये दावा किया गया है.
'द टेलीग्राफ' की ख़बर में कहा गया है कि फैक्ट फाइंडिंग टीम एक सप्ताह पहले प्रभावित इलाकों में दौरा कर 18 गांवों में आदिवासी ईसाइयों पर हमले के मामले की जांच के लिए पहुंची थी. बस्तर के नारायणपुर जिले के 18 गांव और कोंडागांव जिले के 15 गांवों में 9 और 18 दिसंबर के बीच ईसाई आदिवासियों पर हमले हुए थे.
अख़बार के मुताबिक फैक्ट फाइंडिंग टीम ने कहा, ''ईसाई आदिवासियों के ख़िलाफ़ जो अपराध हुए हैं उसकी जांच के लिए सुप्रीम या हाई कोर्ट की निगरानी में एक विशेष जांच दल गठित किया जाना चाहिए. ''
ईसाई आदिवासियों पर हमले के बाद सेंटर फॉर स्टडी ऑफ़ सोसाइटी एंड सेक्यूलरिज्म (सीएसएसएस) ने ऑल इंडिया पीपुल्स फोरम, ऑल इंडिया लॉयर्स एसोसिएशन फॉर जस्टिस और यूनाइटेड क्रिश्चिचयन फोरम के साथ मिलकर एक फैक्ट फाइंडिंग टीम बनाई थी, जिसने 22 से 24 दिसंबर तक प्रभावित इलाकों का दौरा किया था.
टीम में सीएसएसएस के डायरेक्टर इरफान इंजीनियर, वरिष्ठ पत्रकार अशोक वर्मा, कैथोलिक बिशप कॉन्फ्रेंस ऑफ इंडिया, छत्तीसगढ़ के एआईपीएफ के संयोजक बृजेंद्र तिवारी ने उन गांवों का दौरा किया और अनुसूचित जाति, जनजाति और ओबीसी समुदाय के लोगों से बातचीत की. इसके अलावा टीम ने जिलाधिकारियों और पुलिस से भी बातचीत की.
अख़बार के मुताबिक रिपोर्ट में कहा गया है, ''ईसाई आदिवासियों से कहा है कि वे अपना धर्म छोड़ कर हिंदुत्व अपना लें. ऐसा न करने पर उन्हें अपना गांव छोड़ना होगा और नतीजे भुगतने होंगे.''
रिपोर्ट में कहा गया है कि इनमें से कइयों को बुरी तरह पीटा गया. कम से कम 24 लोगों को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा.
हमलों की वजह से कई ईसाई आदिवासी परिवारों को शेल्टर कैंपों में शरण लेनी पड़ी है. कुछ लोग बेघर हो गए हैं और उन्हें खुले आसमान के नीचे वक्त बिताना पड़ रहा है.
रिपोर्ट में जबरदस्ती धर्मांतरण के कुछ मामलों का जिक्र किया गया है. मदमनार गांव के मंगलू कोराम ने टीम को बताया कि उन्हें 21 अन्य ईसाई आदिवासी परिवारों के साथ तिहाड़ मंदिर ले जाया गया, जहां पुरोहित ने कुछ कर्मकांड के बाद उन्हें हिंदू घोषित कर दिया. इसी तरह उदिदगांव, फलहादगांव और पुतनचंदागांव के तीन-तीन परिवारों का धर्म परिवर्तन कराया गया.
गांग होंगे चीन के नए विदेश मंत्री, भारत को लेकर क्या रहेगा नजरिया?
क्यूइन गांग चीन के नए विदेश मंत्री होंगे. फिलहाल वो अमेरिका में चीन के राजदूत हैं. चीन में अगले कुछ महीनों में कई राजनयिकों को बदला जाना है. गांग की नियुक्ति इसी अभियान का एक हिस्सा है.
'द हिंदू' के मुताबिक 56 साल के गांग वरिष्ठ राजनयिक रहे हैं और वो राष्ट्रपति शी जिनपिंग के चीफ प्रोटोकॉल अफसर रह चुके हैं. 2021 में उन्हें खुद जिनपिंग ने अमेरिका में चीन के राजदूत का पद संभालने के लिए चुना था.
अख़बार लिखता है कि अमेरिका में गांग ने अपने पूर्ववर्तियों की तुलना में अमेरिका के प्रति नरम रुख बनाए रखा. अमेरिकी टीवी के कई शो में गांग अमेरिका के लिए नरम रुख में बात करते दिखे हैं. शी जिनपिंग के वक्त चीन के जिन आक्रामक राजनयिकों के दल 'वुल्फ वॉरियर' की चर्चा होती है, उसकी तुलना में गांग का रुख काफी नरम रहा.
अक्टूबर में चीन में कम्युनिस्ट पार्टी की कांग्रेस के बाद चीन अपनी विदेश नीति की मैसेजिंग को लेकर सतर्क रहा है. पिछले कुछ समय से उसने विदेश नीति को लेकर जो रुख कायम किया हुआ था उसे उसने गांग की नियुक्त के जरिये थोड़ा सुधारने की कोशिश की है. हालांकि कोर मुद्दों जैसे कि भारत के साथ सीमा विवाद पर उसका कड़ा रवैया जारी रहने की उम्मीद है.
गांग 69 साल के वांग यी की जगह लेंगे. उन्हें पोलित ब्यूरो में भेज दिया गया है. अख़बार के मुताबिक़ क्यूइन भारत-चीन के बीच सीमा वार्ता में वांग की जगह ले सकते हैं. एलएसी में दोनों देशों के बीच तनाव की वजह से फिलहाल ये बंद है.
चीन में दूसरे मंत्रालयों के भी मंत्री बदले जा सकते हैं. अगले कुछ महीनों में जब चीन में नेशनल पीपुल्स कांग्रेस या संसद का सम्मेलन होगा तो कुछ और नए मंत्रियों को बदले जाने का ऐलान हो सकता है. संसद 5 मार्च को खुलने की उम्मीद है.
क्या पंजाब में फिर सुनाई पड़ने लगी है खालिस्तान आंदोलन की आहट?
'अमर उजाला' ने पंजाब में खालिस्तान आंदोलन के दोबारा उभरने से आशंकित सरकार की एजेंसियों की रणनीति पर रिपोर्ट छापी है. अखबार लिखता है कि पंजाब को लेकर केंद्र सरकार की जांच एजेंसियां बहुत सतर्क हैं. कई तरह के अच्छे-बुरे इनपुट आ रहे हैं. ऐसे में ये सवाल उठना लाजमी है कि क्या पंजाब में दोबारा से मिलिटेंसी के दौर जैसी कोई आहट सुनाई पड़ रही है.
अख़बार लिखता है, ''खालिस्तान की लपटों को कहां से समर्थन मिल रहा है. उस वक्त वह जोखिम कई गुना ज्यादा बढ़ जाता है, जब ऐसे मामलों पर सियासत की तरफ से 'मौन' धारण करने जैसा कुछ दिखाई पड़ता है.''
ऐसी संभावना भी है कि आने वाले समय में केंद्रीय सुरक्षा एवं जांच एजेंसियों की कार्रवाई, पंजाब में बढ़ सकती है. केंद्र सरकार के विश्वस्त सूत्रों ने अख़बार को बताया है कि खालिस्तान अलगाववाद या आतंकवादी घटना, ये तभी फल फूल सकती हैं, जब इन्हें किसी भी तरह से कम या ज्यादा राजनीतिक समर्थन हासिल होता है.
अख़बार लिखता है, ''सूत्रों के मुताबिक, पंजाब में इस साल सीमा पार से लगभग 250 ड्रोन आ चुके हैं. इनमें से दो दर्जन ड्रोन भी नहीं पकड़े जा सके. मौजूदा संसाधनों में बीएसएफ अपना काम पूरी मुस्तैदी से कर रही है, लेकिन हर थाना क्षेत्र में सीमा सुरक्षा बल नहीं है.''
राज्य के विभिन्न इलाकों में खालिस्तान के पोस्टर बैनर टंगे हुए देखे गए हैं. अब नववर्ष पर केंद्रीय एजेंसी का अलर्ट जारी हुआ है कि पंजाब में थानों पर आरपीजी से हमला हो सकता है.
अख़बार लिखता है, ''सूत्रों का कहना है, केंद्रीय एजेंसियों को कथित तौर पर पंजाब सरकार की ओर से उतना सहयोग नहीं मिलता, जितना कानून व्यवस्था को बनाए रखने के लिए जरूरी होता है. एनआईए को खुद से आतंकवाद से जुड़े किसी केस में घुसना पड़ता है."
सरकार की ओर से उस बाबत कोई मांग नहीं की जाती. हालांकि अब एनआईए को किसी केस की जांच करने के लिए स्वत: संज्ञान लेने का अधिकार मिल गया है.
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