तमिलनाडु का बेटा और मलेशिया में पिता की क़ब्र, कैसे पूरी हुई तलाश?

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- Author, प्रभुराव आनंदन
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
तिरुमारन छह महीने के थे, जब उनके पिता का देहांत हुआ था. होश संभालने के साथ उनके ज़ेहन में ये सवाल बड़ा होता गया कि उनके पिता को आख़िर कहां दफ़नाया गया था?
पिता के कब्र की तलाश में वो किस तरह तमिलनाडु से मलेशिया पहुंचे, इसकी कहानी बता रहे हैं तमिलनाडु के एक पत्रकार प्रभुराव आनंदन.
तिरुमारन अपने नाम के पीछे कोई सरनेम नहीं लगाते. उनकी उम्र 55 साल के क़रीब है. अगर उनसे उनके पिता से जुड़ी बचपन की यादों के बारे में पूछें तो उनके पास बताने को कुछ नहीं है. उन्हें ये भी याद नहीं कि उनके पिता कैसे दिखते थे.
उनके पिता के. रामासुंदरम मलेशिया के एक स्कूल में टीचर थे. वो अपनी पत्नी के साथ वहीं रहते थे. तिरुमारन का जन्म 1967 में वहीं मलेशिया में हुआ. उनके जन्म के छह महीने बाद रामासुंदरम को निमोनिया हुआ और इसकी वजह से उनकी मौत हो गई.
पति की मौत के बाद तिरुमारन की मां उन्हें लेकर तमिलनाडु लौट आईं. 1987 में जब तिरुमारन 20 साल के थे, उनकी मां भी चल बसीं. इसके बाद के कई बरस तिरुमारन अकेलेपन में गुज़रे.
निधन से पहले तिरुमारन की मां ने उन्हें पिता की लिखी कुछ चिट्ठियां दी थी. अब उनके पास पिता की यही यादगार बची थी. इसके साथ उके पास पिता के बारे में मां की बताई कुछ कहानियां थी. पिता को याद करते हुए मां कहती थी वो बेहतरीन इंसान थे और बहुत अच्छे गायक थे.
देहांत से पहले तिरुमारन की मां ने उनको पिता के बारे में एक और बात बताई थी. ये जानकारी थी मलेशिया में उस जगह के बारे में जहां वो रहा करते थे और जहां देहांत के बाद उनके पिता को दफ़नाया गया. इस जगह का नाम केरलिंग था जो मलेशिया में था.
तिरुमारन को ये बात उनकी मां ने 35 साल पहले बताई थी. अब वो 55 साल के हैं और तमिलनाडु के तिरुनेलवेली ज़िले में स्कूल चलाते हैं. तिरुमारन ये स्कूल बंधुआ मज़दूरी से छुड़ाए गए बच्चों के लिए चलाते हैं. वो इस इलाक़े में एक समाजिक कार्यकर्ता के रूप में मशहूर हैं.
इस साल नवंबर में उन्होंने मलेशिया जाकर उस जगह को ढूंढने का फ़ैसला किया जहां उनके उनके पिता का अंतिम संस्कार किया गया था. इस फ़ैसले के बारे में तिरुमारन बताते हैं "मैं अक्सर अपने पिता की क़ब्र पर जाने के बारे में सोचता था. लेकिन इससे पहले मैंने इस दिशा में गंभीरता से प्रयास नहीं किया."
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गूगल सर्च के साथ हुई तलाश की शुरुआत

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तिरुमारन ने गूगल सर्च के ज़रिए सबसे पहले उस जगह को लोकेट किया जिसके बारे में उन्होंने अपनी मां से सुना था. लेकिन नाम के अलावा उस स्कूल के बारे में उन्हें कुछ भी पता नहीं था.
मलेशिया के केरलिंग टाउन में जहां उनके पिता के रामासुंदरम अंग्रेजी पढ़ाते थे, उस स्कूल का नाम था 'थोटा थेसिया वकाई तमिल पल्ली'. ये स्कूल वहां बसे तमिल समुदाय के लोग चलाते थे. तिरुमारन ने अपने छात्रों से इस स्कूल के बारे में और ज़्यादा जानकारी जुटाने को कहा.
तिरुमारन बताते हैं, "मुझे कंप्यूटर का इस्तेमाल करना ज़्यादा नहीं आता. इसलिए मैंने अपने छात्रों से मदद मांगी. उन्होंने उस स्कूल की एक तस्वीर ढूंढ ली. मैं वो देखकर हैरान रह गया."
इस दौरान तिरुमारन को ये भी पता चला कि केरलिंग का वो स्कूल अब पहले वाली जगह पर नहीं है, बल्कि इसे किसी दूसरी जगह पर ले जाया गया है. तब उन्होंने स्कूल के प्रिंसिपल को ईमेल कर उनसे मदद मांगी.
स्कूल प्रशासन की मदद से तिरुमारन अपने पिता के कुछ छात्रों तक पहुंचने में क़ामयाब हुए. इनमें से कई अब भी मलेशिया में रहते हैं. इनमें से कुछ लोगों ने तिरुमारन के ईमेल का जवाब दिया और पिता की क़ब्र ढूंढने में उनकी मदद करने का भरोसा भी दिया.
तिरुमारन के मुताबिक़ उनके पिता ने जिन लोगों को पढ़ाया था वो अब 80 साल के हो चुके हैं. लेकिन वो हैरान थे कि उनके पिता के छात्र अब भी उनके पिता को प्यार से याद कर रहे थे.
वो कहते हैं, "एक शख़्स ने बताया कि मेरे पिता ने किस तरह उन्हें स्कूल आनेजाने के लिए एक साइकिल ख़रीद कर दी थी. दूसरे शख़्स ने बताया कि जब वो पढ़ाई में पिछड़ रहे थे तो मेरे पिता ने कैसे बेहतर प्रदर्शन के लिए उन्हें प्रेरित किया था. "
तिरुमारन बताते हैं "जब मैंने अपने पिता के बारे में ये सब सुना, तब मुझे एहसास हुआ मैंने अपनी ज़िंदगी में क्या कुछ खो दिया था"
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झाड़ियों के नज़दीक मिली पिता की क़ब्र

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कब्र की तलाश मलेशिया में रह रहे उनके पिता के एक पुराने स्टूडेंट्स ने की. क़ब्र की लोकेशन पता करने के बाद उन्होंने तिरुमारन को इसकी सूचना दी. इसके बार तिरुमारन आठ नवंबर को मलेशिया पहुंचे.
केरलिंग में वो एक उमस भरी सुबह थी जब तिरुमारन शहर के किनारे घने पेड़ों के बीच एक पुराने कब्रिस्तान पहुंचे थे. यहां आने के बाद वो कई क़ब्रों पर गए और उन पर लिखी तख़्तियों को पढ़ा. आख़िर में झाड़ियों के बीच उन्हें एक क़ब्र मिली जो उनके पिता रामासुंदरम की थी.
तिरुमारन बताते हैं, "क़ब्र की दीवारें ढह गई थीं. उसके आसपास जंगली घास उग आई थी. मैंने वहां लगी तख़्ती से कब्र को पहचाना, जिस पर उनका नाम, जन्म की तारीख़ के साथ उनकी तस्वीर भी लगी थी."
तिरुमारन ने इससे पहले अपने पिता की तस्वीर नहीं देखी थी. उन्हें नहीं पता था वो कैसे दिखते हैं. पिता की मौत के बाद जब उनकी मां मलेशिया से तमिलनाडु लौटी थीं तो अपने साथ उनकी क़ब्र की मिट्टी लाई थीं. जब उनका देहांत हुआ तो वही मिट्टी उन्होंने अपनी मां की क़ब्र के ऊपर छिड़क दी थी.
ये बताते हुए तिरुमारन भावुक हो जाते हैं. वो कहते हैं, "इस बार मैं अपने साथ अपनी मां की क़ब्र से कुछ मिट्टी वहां ले गया था. इसे मैंने अपनी पिता की क़ब्र पर छिड़का. ऐसा करते हुए महसूस हुआ कि मौत के बाद मेरे ज़रिए दोनों का मिलन हो रहा है."
इसके बाद अगले कुछ दिनों तक तिरुमारन अपने पिता के पुराने छात्र के साथ मिलकर क़ब्र की साफ़-सफ़ाई करते रहे. 16 नवंबर को वापस लौटने से पहले उन्होंने अपने पिता की कब्र पर मोमबत्ती जलाकर प्रार्थना की.
तिरुमारन बताते हैं मलेशिया जाकर उन्हें जो मिला वो उनकी कल्पना से भी ज़्यादा था. इनमें पिता से जुड़ी कई बातों और यादों के साथ उनकी कुछ पुरानी तस्वीरें भी शामिल हैं. वो बताते हैं, "पिता के कुछ स्टूडेंट्स ने मुझे बताया मैं बिल्कुल अपने पिता की तरह दिखता हूं. ये सुनना ऐसा था जैसे एक ऐसे बेटे का जीवनचक्र पूरा हो रहा हो, जो अपने पिता के बगैर बड़ा हुआ."
तिरुमारन की इस मार्मिक कहानी ने तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन का भी ध्यान खींचा. स्टालिन ने अपने ट्विटर के ज़रिए तिरुमारन के पूरे सफ़र के बारे में बताया.
उन्होंने अपने पोस्ट में ये बताया कि किस तरह मलेशिया में तमिल समुदाय ने तिरुमारन की मदद की. स्टालिन ने कहा कि "ये तमिल लोगों की अनूठी संस्कृति है."
स्टालिन ने अपने ट्वीट में लिखा, "मुझे लगता है पिता की क़ब्र के साथ तिरुमारन की अपनी ज़िंदगी की तलाश पूरी हुई."
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