डबल एक्सएलः भारत में मोटे लोगों को शर्मिंदा करना इतना आम क्यों हैं?

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- Author, गीता पांडे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
हाल ही में भारत के दक्षिणी राज्य केरल की एक मंत्री ने फ़ेसबुक पोस्ट करके मोटे लोगों को शर्मिंदा किए जाने की प्रवृति की शिकायत की.
मलयालम भाषा में की गई इस पोस्ट में शिक्षा मंत्री वी सिवानकुट्टी ने बताया कि कैसे उन्हें भी मोटे होने की वजह से शर्मिंदा किया गया.
उन्होंने लिखा कि कुछ दिन पहले जब उन्होंने अपने साथ सेल्फ़ी ले रहे बच्चों की एक तस्वीर साझा की, तो किसी ने कमेंट किया, "तुम्हें अपनी तोंद कुछ कम करनी चाहिए."
उस टिप्पणी पर प्रतिक्रिया देते हुए मंत्री ने कहा कि किसी को "शरीर की बनावट की वजह से शर्मिंदा करना जघन्य प्रवृति है."
उन्होंने लिखा, "भले ही स्पष्टीकरण कुछ भी हो, बॉडी शेमिंग बेहद ख़राब है. हमारे समाज में ये कई स्तर पर हो रहा है. हमारे बीच में बहुत से लोग ऐसे हैं जो बॉडी शेमिंग का शिकार हुए हैं और इसकी वजह से मानसिक पीड़ा भी झेली है."
उन्होंने लिखा, "हमें बॉडी शेमिंग को ख़त्म करना ही होगा. हमें आधुनिक बनना होगा. "
सिवानकुट्टी कहते हैं कि इस घटना के बाद उन्होंने ये महसूस किया कि बॉडी शेमिंग कितनी टॉक्सिक (ज़हरीली) हो सकती है.
उन्होंने कहा कि केरल में राज्य सरकार इस बारे में छात्रों और शिक्षकों में जागरूकता लाएगी और इसे स्कूल के पाठ्यक्रम का हिस्सा भी बनाएगी.

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बहस
मंत्री की टिप्पणी और बॉलीवुड की नई फ़िल्म डबल एक्सएल ने भारत में मोटे लोगों को शर्मिंदा किए जाने की प्रवृति पर बहस से शुरू की है.
भारत में शारीरिक बनावट को लेकर लोगों का मज़ाक बनाया जाना आम बात है.
फ़िल्म में अभिनेत्री हुमा क़ुरैशी और सोनाक्षी सिन्हा ने अभिनय किया है. ये दोनों ही अभिनेत्रियां बॉडी शेमिंग को लेकर पहले भी बात कर चुकी हैं.
सिन्हा को उनके वज़न को लेकर सोशल मीडिया पर ट्रोल किया गया था और हुमा क़ुरैशी जब फ़िल्मों में आईं थीं, तब आलोचकों ने उन्हें यह कहकर ख़ारिज कर दिया था कि उनका वज़न पाँच किलो ज़्यादा है और वो हीरोइन बनने लायक़ नहीं हैं
फ़िल्म के निर्देशक सतराम रमानी ने बीबीसी को बताया कि ये फ़िल्म ऐसी दो महिला किरदारों के बारे में है, जो 'प्लस साइज़' हैं और जिन्हें लगता है कि उनका वज़न उनके सपनों के रास्ते में आ रहा है. ये फ़िल्म उनके इस रुकावट को पार करने की कहानी कहती है.
वो कहते हैं, "मैंने देखे है कि बहुत से महत्वाकांक्षी लोग, जिनमें ज़बरदस्त टैलेंट होता है, उन्हें सिर्फ़ वज़न की वजह से नीचा करके देखा जाता है. ये किसी भी हालत में स्वीकार्य नहीं हो सकता है."
आलोचकों का कहना है कि भारत का फ़िल्म उद्योग लोगों की पसंद और राय को प्रभावित करता है और इस धारणा के लिए कि मोटा होना बुरा है और स्लिम होना अच्छा है, कहीं ना कहीं फ़िल्म उद्योग भी ज़िम्मेदार है.

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संदेश
अधिकतर कामयाब अभिनेत्रियां लंबी और स्लिम हैं और कुछ साल पहले ही अभिनेत्री करीना कपूर 'ज़ीरो फ़ीगर' बनाकर चर्चा में आ गईं थीं.
रमानी कहते हैं, "अगर कुछ लोग साइज़ ज़ीरो दिखना चाहते हैं तो ये सही है क्योंकि वो एक ख़ास तरीके से दिखना चाहते हैं लेकिन ये कोई ऐसा विचार नहीं है जिसे दूसरों पर भी थोपा जाना चाहिए."
वो कहते हैं कि अपनी फ़िल्म के ज़रिए वो ये संदेश देना चाहते हैं कि "आप जैसे भी हैं, ख़ूबसूरत हैं, इसे स्वीकार करिए. आपका वज़न या त्वचा का रंग मायने नहीं रखता."
ये फ़िल्म संदेश देती हैं कि "कामयाब होने के लिए आपको किसी ख़ास साँचे में फ़िट होने की ज़रूरत नहीं है."
डबल एक्सएल एक आम बॉलीवुड फ़िल्म है, जिसमें गीत संगीत और नृत्य है. फ़िल्म बॉक्स ऑफ़िस पर भी बहुत कामयाब नहीं रही, लेकिन रमानी कहते हैं कि उन्हें इस बात की ख़ुशी है कि लोग बॉडी शेमिंग के बारे में बात कर रहे हैं.
वो कहते हैं, "ये एक ऐसा विषय है, जो पूरी दुनिया में प्रासंगिक है."

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दायरा
इस विषय पर प्लस साइज़ कवि और लेखिका हरनिद्ध कौर एक भारतीय यूनीकॉर्न कंपनी में काम करती हैं. वे सोशल मीडिया में और अपने कॉलम में लगातार लिखती हैं.
वो कहती हैं, "मोटे लोगों को शर्मिंदा किया जाना आम बात है क्योंकि अधिकतर भारतीयों को नहीं पता होता है कि निजी दायरे की सीमा क्या है और हर कोई हर किसी के दिखावे पर टिप्पणी करता है."
वो ये भी कहती हैं कि हालाँकि पुरुष और महिला दोनों ही इसका शिकार होते हैं लेकिन महिलाओं पर इसका अधिक असर होता है क्योंकि "महिलाओं को इस आधार पर जज किया जाता है कि वो शादी करने के कितना लायक़ हैं और मोटी महिलाएँ इसमें सबसे नीचे चली जाती हैं."
हरनिद्ध कौर को 12 साल की उम्र में पीसीओएस (पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम) हो गया था, जब वो बड़ी हो रहीं थीं तब उन्हें मोटापे की वजह से तानें सुनने पड़ते थे. पीसीओएस की वजह से वज़न बढ़ जाता है, पीरियड्स अनियमित हो जाते हैं और बाल टूटने लगते हैं.
"बॉडी शेमिंग हमेशा ऐच्छिक और नकारत्मक नहीं होती है और अकसर ये बुरी जगह से भी नहीं आती है- उदाहरण के लिए, जब परिजन आपके वज़न के बारे में बात करते हैं, ये ऐसी जगह से आती है जहाँ आपको लेकर डर और चिंता है. लेकिन पूर्वाग्रह अक्सर वास्तविक जिंदगी पर हावी हो जाते हैं."
वो बताती हैं कि एक बार एक दुकान में सेल्समैन ने उनके पास आकर कहा कि क्या कभी उन्होंने वज़न कम करके के प्रॉडक्ट आज़माए हैं.
या ऐसा भी हुआ है जब फ़ूड कोर्ट में बगल में बैठी महिला ने अपनी बेटी से कहा है कि "बिस्कुट खाना बंद करो नहीं तो तुम भी ऐसी ही हो जाओगी." या डेटिंग ऐप पर पुरुषों ने साथ में एक्सरसाइज़ करने का निमंत्रण दिया क्योंकि "एक बार पतली हो जाने के बाद मैं बहुत अच्छी दिखूँगी."

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समस्या
वो कहती हैं कि वास्तविक समस्या ये नहीं है कि "बिना मांगे पतले होने का सलाह मिलती है" या "मोहल्ले की कोई आंटी मुझे मोटा कहती हैं."
वो कहती हैं, "मोटो लोगो को आलसी और मैला समझा जाता है और उन्हें नौकरी हासिल करने में भी भेदभाव का सामना करना पड़ सकता है. "
वो कहती हैं कि मोटापे को लेकर अधिकतर बातचीत मोटे लोगों का मज़ाक बनाए जाने तक ही केंद्रित रहती है, जबकि इसका मेडिको-सोशल और राजनीतिक पहलू भी है.
"जब मैं एक बार बहुत बुरी एलर्जी का शिकार होने के बाद डॉक्टर के पास गई तो डॉक्टर का कहना था कि मुझे सांस लेने में दिक्कत हो रही है क्योंकि मैं बहुत मोटी हूँ. एक बार मेरा घुटना टूट गया था तो डॉक्टर ने कहा कि अगर मैं इतनी मोटी ना होती तो अपना घुटना ना तोड़ती."
एंडोक्राइनोलॉजिस्ट चित्रा सेल्वन कहती हैं कि "डॉक्टर संवाद की कला में बहुत प्रशिक्षित नहीं होते हैं" और जब आप फैट शेमिंग की बात करते हैं तो बहुत से लोगों को लगता है कि ये विकसित दुनिया की समस्या है.
"लेकिन फैट शेमिंग के गंभीर सामाजिक और मनोवैज्ञानिक प्रभाव हो सकते हैं. रोज़ाना लोगों के लांछन का सामना करने से आत्मसम्मान और मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित हो सकता है. इससे खाने से जुड़ी बीमारियाँ पैदा हो सकती हैं और लोग अपने आपको पूरी तरह समाज से अलग कर सकते हैं."

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शोध
अपने शोध 'द वेट ऑफ़ वर्ड्स' के लिए 900 डॉक्टरों पर सर्वे करनी वाली डॉक्टर सेल्वन कहती हैं कि अधिकतर डॉक्टरों को ये लगता है कि मरीज़ को शर्मिंदा करने से उन्हें क़दम उठाने के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है.
वो कहती हैं, "लेकिन ये तरीक़ा काम नहीं करता है बल्कि वो डर की वजह से मदद लेना ही बंद कर देते हैं."
और ये हालात और भी ख़राब हो सकते हैं.
भारत सरकार और विश्व स्वास्थ्य संगठन के डेटा के मुताबिक भारत में 13.5 करोड़ लोगों का वज़न अधिक है और ये संख्या लगातार बढ़ रही है. डॉक्टर चेतावनी दे रहे हैं कि भारत 'मोटापा महामारी' की तरफ़ बढ़ रहा है.
डॉ. सेल्व कहती हैं, "एक संबंध भी है. जितना अधिक वज़न होगा उतनी अधिक डायबिटीज़ की आशंका होगी."
"लेकिन वज़न बढ़ने की वजह हमेशा ही ख़राब लाइफ़स्टाइल नहीं है- ये एक बहुत कांप्लेक्स डिसऑर्डर है जिसकी कई अलग-अलग वजहें हो सकती हैं, इनमें हार्मोन और तनाव भी शामिल है."
और डॉक्टरों को मरीज़ों को शर्मिंदा नहीं करना चाहिए.
"हम उन मरीज़ों को शर्मिंदा नहीं करते हैं जो मोटे नहीं होते हैं, लेकिन जब मैंने डायबिटीज़ के शिकार एक ग्रुप से चिकित्सीय परामर्श के दौरान उनके अनुभवों को लेकर बात की तो उनमें से अधिकतर का कहना था कि उन्हें शर्मिंदा किया गया और इस वजह से उनका तनाव बढ़ा."
"कुटिल मुस्कान और उभरी हुई भौंहों वाला एक डॉक्टर मरीज़ को थैरेपिस्ट के पास भगा सकता है."
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